राजनाथ सिंह। एक कहावत है कि युद्ध में अक्सर सबसे पहली बलि सत्य की चढ़ती है। अब यही बात धीरे-धीरे राजनीतिक परिदृश्य एवं प्रतिस्पर्धा पर भी लागू होती दिख रही है। इस संदर्भ में ‘पोस्ट-ट्रुथ’ सार्वजनिक विमर्श का एक बड़ा आयाम बनता जा रहा है। ‘पोस्ट-ट्रुथ’ उस स्थिति को कहते हैं, जिसमें सत्य और तथ्य की जगह मनगढ़ंत नैरेटिव ले लेते हैं। एक समय ‘पोस्ट-ट्रुथ’ अकादमिक बहस तक ही सीमित था, पर आज यह आम राजनीति का हिस्सा बनता जा रहा है। भ्रामक सूचनाओं और फर्जी नैरेटिव के जरिये सिर्फ जनमत को ही प्रभावित नहीं किया जा रहा, बल्कि शक और संदेह के बीज बोकर उन संस्थाओं को भी बदनाम किया जा रहा है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद होती हैं। ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के प्रभाव में कपोल-कल्पित बातों को तब तक दोहराया जाता है, जब तक वे सच जैसी प्रतीत न होने लगें। ऐसी स्थिति में सत्य केवल कमजोर और धुंधला ही नहीं पड़ता, बल्कि धीरे-धीरे झूठ ही सच का रूप लेने लगता है।

आज जब कांग्रेस और विपक्ष के कुछ नेता जानबूझकर विवाद खड़े करने, दुष्प्रचार और झूठे दावों के जरिये अराजकता का माहौल बनाने में जुटे हैं, तो यह साफ दिखाई देता है कि भारत का राजनीतिक विमर्श भी ‘पोस्ट-ट्रुथ’ की इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं। ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाएं आलोचना से परे होती हैं। वैचारिक मतभिन्नता के कारण लोकतंत्र में असहमति और मतभेद स्वाभाविक भी हैं और आवश्यक भी, परंतु इसके साथ ही एक ‘सोशल कांट्रैक्ट’ भी जुड़ा होता है कि व्यक्तिगत, राजनीतिक या दलगत हितों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को रखा जाए। आज जब इस अनुबंध पर ही प्रहार किया जा रहा है तब सच्चाई को सामने लाना आवश्यक है।

पिछले कुछ समय से विपक्षी दल कभी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन-ईवीएम में गड़बड़ी तो कभी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर को लेकर निर्वाचन आयोग की छवि को धूमिल करने में लगे हैं। वर्ष 2024 में ‘एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स बनाम भारतीय चुनाव आयोग’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम से जुड़ी सभी आशंकाओं को विराम देते हुए बैलेट पेपर की व्यवस्था पर लौटने की मांग को खारिज कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि ठोस तथ्यों या आंकड़ों के बिना केवल संदेह के आधार पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर बार-बार संदेह जताना निंदनीय और अवांछनीय है। इसके बावजूद आज तक ईवीएम पर संदेह पैदा करने का काम बंद नहीं किया गया है।

इस सत्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अतीत में अलग-अलग सरकारों के दौरान भी एसआइआर की प्रक्रिया जारी रही। सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 के निर्णय में साफ कहा है कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की एक बुनियादी शर्त मतदाता सूचियों की शुद्धता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची की सटीकता, पूर्णता और अखंडता सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है, पर ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के इस दौर में इस सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया को भी राजनीतिक विरोध का हथियार बनाकर लोगों के मन में संदेह पैदा करने का काम किया जा रहा है। विपक्ष के इस दुष्प्रचार के तहत न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी विश्वसनीय और निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की साख को भी क्षति पहुंचाई जा रही है।

यह सब तब किया जा रहा है जब मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में नेता-प्रतिपक्ष भी शामिल होते हैं। याद रहे कि कांग्रेस की सरकारों के समय में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति मनमाने ढंग से की जाती थी और उसमें किसी की राय तक नहीं ली जाती थी। कांग्रेस द्वारा संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और स्वतंत्रता का अपमान करने का एक लंबा इतिहास रहा है। जब देश में पहला आम चुनाव भी नहीं हुआ था कि तत्कालीन सरकार ने संविधान संशोधन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले को पलट कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियां बढ़ा दी थीं।

आपातकाल का कलंकित अध्याय और उसमें नागरिकों के निर्ममता से दमन तो कभी भूले नहीं भुलाया जा सकता। कांग्रेस का रवैया एकदम स्पष्ट है कि जब-जब संस्थाएं उसकी मर्जी के अनुसार काम नहीं करेंगी, तब-तब वह उनकी वैधता को ही कठघरे में खड़ा कर देगी। कांग्रेस की ‘पोस्ट-ट्रुथ’ की राजनीति का शिकार राष्ट्रीय सुरक्षा भी हुई है। 2019 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का गलत हवाला दिया था, जिसके लिए उन्हें बिना शर्त माफी भी मांगनी पड़ी थी। राहुल गांधी ने यह भ्रामक दावा भी किया था कि भारत की जमीन पर दूसरे देश ने कब्जा कर लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर उन्हें फटकार लगाते हुए कहा था कि एक सच्चा भारतीय कभी ऐसा नहीं कहेगा।

लोकतंत्र में किसी फैसले पर असहमति तो व्यक्त की जा सकती है, लेकिन उस असहमति का आधार झूठ नहीं हो सकता न ही उसका लक्ष्य अराजकता फैलाना हो सकता है। बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर की यह सीख इस संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाती है, जिसमें उन्होंने चेताया था कि असंवैधानिक तरीकों के प्रयोग से पैदा होने वाले खतरे बहुत विध्वंसक हो सकते हैं। विपक्ष के नेताओं को डा. आंबेडकर के 'ग्रामर आफ अनार्की' पर केंद्रित उस ऐतिहासिक भाषण का निश्चित ही संज्ञान लेना चाहिए और लोकतंत्र में असहमति तथा अराजकता के बीच के अंतर को समझना चाहिए।

हमारे अनुसार एक जीवंत लोकतंत्र का आधार सिर्फ राजनीतिक समानता नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक न्याय भी है। यही हमारी सरकार के सभी फैसलों का आधार भी है। एक मजबूत एवं परिपक्व लोकतंत्र के लिए यह भी आवश्यक है कि असहमति और चिंताओं को वैध एवं लोकतांत्रिक माध्यमों से व्यक्त किया जाए और उनका समाधान संवाद एवं सौहार्दपूर्ण तरीके से निकाला जाए, न कि अराजकता के जरिये। आज समय की मांग है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ-साथ भारत के उदय को किसी की राजनीतिक हार से पैदा हुई हताशा का बंधक न बनने दिया जाए।

(लेखक रक्षा मंत्री हैं)