विचार: बदलते भारत के अनुरूप बने यूपीएससी
परीक्षा में वैकल्पिक विषय को खत्म करके और उम्र सीमा को घटाकर यूपीएससी को कुछ सुधार तुरंत करने की जरूरत है।
HighLights
प्रारंभिक परीक्षा और सी-सेट पर लगातार उठ रहे सवाल।
फर्जी प्रमाण पत्रों (ईडब्ल्यूएस, ओबीसी) से चयन प्रक्रिया प्रभावित।
अधिकतम उम्र सीमा और कोचिंग निर्भरता पर पुनर्विचार आवश्यक।
प्रेमपाल शर्मा। देश के शासन-प्रशासन में युवाओं की मेरिट के आधार पर और निष्पक्ष भर्ती के लिए एक अक्टूबर, 1926 को शुरू हुई संस्था संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। सरदार वल्लभ भाई पटेल के सपनों के अनुरूप 1950 में इसका नाम संघ लोक सेवा आयोग रखा गया था। यह तसल्ली की बात है कि इस संस्था पर अब तक कोई बड़ा दाग नहीं लगा है। हाल में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस पक्ष की सराहना की और सिक्के एवं टिकट भी जारी किए, लेकिन बदलते भारत और 21वीं सदी में क्या इतना ही पर्याप्त है? यूपीएससी में सुधार के लिए कई पक्षों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
इस साल मई में हुई यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में ज्यादातर प्रश्न ऐसे थे, जिनका हमारे विश्वविद्यालयों की शिक्षा से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। प्रारंभिक परीक्षा और सी-सेट पर पिछले दस वर्षों में लगातार अंगुली उठती रही है। इस बात का सुबूत यह भी है कि अंतिम परिणाम में टाप करने वाले ज्यादातर उम्मीदवार प्रारंभिक परीक्षा में लगातार फेल होते रहे और फिर अचानक अंतिम परिणाम में टापर्स बन गए। इसकी गंभीरता को देखते हुए संसदीय समिति ने भी यूपीएससी से प्रारंभिक परीक्षा में सुधार की तुरंत सिफारिश की है। प्रारंभिक परीक्षा पर संदेह होने की वजह से मुख्य परीक्षा तक देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं नहीं जा पा रही हैं। आरक्षित वर्ग के प्रमाण-पत्र का मुद्दा भी बड़ा है।
ईडब्ल्यूएस, ओबीसी आदि के फर्जी प्रमाण-पत्र की बाढ़ आई हुई है। दो साल पहले पूजा खेडकर का मामला कई हफ्तों तक सुर्खियों में रहा था। तब कई गड़बड़ियां सामने आईं। ओबीसी का नकली सर्टिफिकेट, दिव्यांग का सर्टिफिकेट, नाम में परिवर्तन क्या बिना अधिकारियों की मिलीभगत के संभव था? ओबीसी और क्रीमी लेयर का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि 2025 की परीक्षा में सफल हुए आईएएस, आईपीएस और दूसरे अधिकारी अभी तक मसूरी में ज्वाइन नहीं कर पाए हैं। पहले मसूरी में हर वर्ष एक सितंबर से ये अधिकारी नौकरी-प्रशिक्षण शुरू करते थे। यूपीएससी और नौकरशाही को इस पर ध्यान देने की जरूरत है। प्रश्न संस्थान की साख का है। आखिर 25 लाख युवा आयोग की तरफ एक यकीन से देख रहे हैं। इसलिए जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए, जिससे यूपीएससी की विश्वसनीयता पर दाग लगे।
लगभग 15 साल पहले मुख्य परीक्षा में एथिक्स का पेपर शुरू किया गया था। क्या उसके वांछित परिणाम आ रहे हैं? ऐसा लगता तो नहीं, क्योंकि दर्जनों अधिकारी अपनी ट्रेनिंग के दौरान ही या शुरू के पांच वर्षों में भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं। कुछ सख्त कदम और समीक्षा की जरूरत है। वैसे भी यूपीएससी हर 10 साल में अपनी परीक्षा प्रणाली को रिव्यू करता है। उम्मीदवारों की अधिकतम उम्मीद उम्र भी 21वीं सदी के नौजवानों की प्रतिभा को देखते हुए गले नहीं उतरती। अभी सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए अधिकतम उम्र 32 वर्ष और आरक्षित वर्ग के लिए 37 वर्ष है। जब सिविल सेवाओं में भर्ती शुरू हुई थी तो न्यूनतम आयु 18 और 23 थी। फिर 24 और 26 साल हुई। वर्ष 1979 में कोठारी कमेटी ने अधिकतम उम्र 28 वर्ष किया, क्योंकि तब तक शिक्षा देश के दूर-दराज के गांवों में उतनी नहीं फैली थी।
पिछले 50 वर्षों में तो साक्षरता में सुधार हुआ है, लेकिन उम्र 28 से बढ़कर 32 और 37 कर दी गई। जब आईआईटी से निकले नौजवान 21 साल की उम्र में बड़े से बड़े स्टार्टअप और तकनीकी ऊंचाइयां छू रहे हैं, तब नौकरशाही में इतनी अधिक उम्र के अभ्यर्थियों को लेना सरकार के हित में नहीं लगता। कोचिंग पर युवाओं की बढ़ती निर्भरता को कम करने का मामला भी देश के बार-बार सामने आता है, लेकिन कोई बड़ा सुधार अभी तक सामने नहीं आया है। कोचिंग संस्थानों की फीस बहुत महंगी होती है और कई बार हजारों छात्र 10 साल तक बड़े-बड़े शहरों में तैयारी करते रहते हैं। यह इस गरीब देश के अंतिम आदमी के लिए बहुत घातक है। इसलिए वैकल्पिक विषय को खत्म करके और उम्र सीमा को घटकर कुछ सुधार तुरंत करने की जरूरत है। अन्य बड़े सुधारों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोठारी आयोग जैसा आयोग बनाया जाए, जिसमें अकादमिक और तकनीकी क्षेत्र के विद्वान शामिल हों।
यूपीएससी एक परीक्षा संस्था है। इसके साथ न केवल एनटीए, बल्कि राज्यों के सभी आयोगों को भी जोड़ा जाना चाहिए। यूपीएससी का अनुभव इनके काम आना चाहिए। अभी हाल में कर्नाटक लोक सेवा आयोग में भी तमाम गड़बड़ियां सामने आई हैं। एनटीए की परीक्षा प्रणाली पर भी लगातार अंगुली उठ रही है। सिर्फ पुलिस राज से कोई समाज या राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। देश के हर क्षेत्र और जीवन में भी नैतिकता एवं ईमानदारी की जरूरत है। सरदार पटेल ने जब भारतीय सिविल सेवा की पैरवी की थी तो उन्होंने इस देश को जोड़ने और मजबूत बनाने के हथियार के रूप में देखा था। उम्मीद है यूपीएससी आने वाले वर्षों में बिना किसी बड़े आंदोलन का इंतजार किए अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप तुरंत सुधार की तरफ बढ़ेगा। यही सुधार देश को विकसित भारत बनाएगा। यूपीएससी के सामने 100 वर्ष के बाद यह बड़ी चुनौती है।
(शिक्षाविद् लेखक भारत सरकार में संयुक्त सचिव रहे हैं)




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