संपादकीय: वोट चोरी का शिगूफा
भाजपा ने विपक्षी दलों के 'वोट चोरी' के दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा है, जिसमें चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप है
HighLights
भाजपा ने वोट चोरी के विपक्षी दुष्प्रचार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा।
विपक्ष चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप लगा रहा।
मतदाता सूची से नाम हटाने के आरोप निराधार, बीएलओ को नहीं पता दल।
वोट चोरी के विपक्षी दलों के दुष्प्रचार की काट के लिए भाजपा ने राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ने का जो निर्णय लिया, वह उचित ही है, क्योंकि इस दुष्प्रचार के तहत यह भी अफवाह फैलाई जा रही है कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहा है और उसे चुनावी लाभ प्रदान कर रहा है।
अच्छा होता कि भाजपा की ओर से ऐसा कोई अभियान पहले ही छेड़ा जाता। चूंकि इस काम में देर हुई, इसलिए अब उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके साथ संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को संकीर्ण राजनीतिक कारणों से बदनाम करने के विपक्षी दलों के दुष्प्रचार का प्रतिकार प्रभावी तरीके से हो। उसे अपनी बात पुष्ट प्रमाणों और अकाट्य तर्कों के साथ रखनी होगी। इस क्रम में उन झूठे आरोपों की पोल भी खोलनी होगी, जिनकी आड़ में यह माहौल बनाया जा रहा है कि विपक्षी दलों के समर्थकों के नाम वोटरलिस्ट से जानबूझकर बाहर किए जा रहे हैं।
हालांकि बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के समय ही यह स्पष्ट हो गया था कि विपक्षी दलों के आरोपों में कोई दम नहीं, लेकिन खीझ में आकर वे इस उक्ति को चरितार्थ करने में जुट गए कि किसी झूठ को सौ बार दोहराया जाए तो वह सच लगने लगता है। वास्तव में वोट चोरी के शिगूफे के पीछे विपक्ष ने इसी उक्ति को अपना हथियार बना लिया है।
एक ओर जहां एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा को अपने हिस्से का काम करना होगा, वहीं चुनाव आयोग को भी सक्रिय होना होगा, क्योंकि एसआईआर के समय उसकी ओर से नोटिस जारी कर लोगों से जो आवश्यक जानकारी या प्रमाणपत्र मांगे जाते हैं, उसके आधार पर ही यह शोर मचाया जा रहा है कि वोट चोरी हो रही है। इस नोटिस में केवल यह लिखा होता है, 'आपने गणना प्रपत्र में अपने या स्वजनों के बारे में वांछित जानकारी नहीं भरी या फिर उसका मिलान नहीं हो पा रहा है।
आपका नाम वोटर लिस्ट में दर्ज हो सके, इसके लिए इस तिथि तक अमुक दस्तावेज भेज दें। किसी कठिनाई पर बीएलओ से संपर्क करें।' अनेक लोगों को ऐसे नोटिस मिले और उन्होंने आवश्यक दस्तावेज जमाकर अपने नाम वोटर लिस्ट में शामिल कराए। जिन्होंने ऐसा नहीं किया, बीएलओ ने उनसे खुद संपर्क किया। इसके बाद भी लोगों को वोटरलिस्ट में नाम जुड़वाने का अवसर दिया जाता है।
विपक्ष इसी नोटिस के आधार पर वोट चोरी का शोर मचाकर मुख्य चुनाव आयुक्त का त्यागपत्र तो मांग रहा, लेकिन यह नहीं बता रहा कि आखिर राज्य सरकारों के अधीन काम करने वाले बीएलओ यह कैसे जान सकते हैं कि कौन वोटर किस दल को वोट देता है? जब ऐसा संभव ही नहीं तो फिर इसे कोरे झूठ के अलावा और क्या कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग विपक्ष को वोट देने वालों के नाम काट रहा है?







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