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    92.43 प्रतिशत मतदान: बंगाल के मतदाताओं ने कर दिखाया कमाल, त्रिपुरा का 13 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा

    Updated: Thu, 30 Apr 2026 12:10 AM (IST)

    चुनाव आयोग के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, दूसरे चरण में रात दस बजे तक 92.43 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जिसने 13 वर्षों से अटूट त्रिपुरा के रिकार् ...और पढ़ें

    बंगाल के मतदान से त्रिपुरा का 13 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा (फोटो- एएनआई)

    बंगाल के मतदान से त्रिपुरा का 13 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा (फोटो- एएनआई)

    HighLights

    1. बंगाल के मतदान से त्रिपुरा का 13 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा

    2. विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक मतदान का रिकॉर्ड त्रिपुरा के नाम था

    3. 2013 के चुनाव में त्रिपुरा में 91.82 प्रतिशत वोटिंग हुई थी

    4. बंगाल में 92.43 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया 

    राज्य ब्यूरो, कोलकाता। भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे व अंतिम चरण के समापन के साथ ही राज्य ने मतदान प्रतिशत के मामले में अब तक के सारे राष्ट्रीय कीर्तिमानों को पीछे छोड़ दिया है।

    चुनाव आयोग के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, दूसरे चरण में रात दस बजे तक 92.43 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जिसने 13 वर्षों से अटूट त्रिपुरा के रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया।

    आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पहले और दूसरे चरण को मिलाकर बंगाल में औसत मतदान 92.85 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इससे पहले, विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक मतदान का रिकॉर्ड त्रिपुरा (2013) के नाम था, जहां 91.82 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।

    उत्तर-पूर्वी राज्यों में मतदान का स्तर हमेशा ऊंचा रहता है—जैसे नगालैंड (1993) में 91.53 प्रतिशत और मणिपुर (1995) में 91.41 प्रतिशत लेकिन बंगाल की इस 'वोट क्रांति' ने सांख्यिकी के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं।

    जहां बंगाल और दक्षिण भारतीय राज्य (जैसे पुडुचेरी- 89.83 प्रतिशथ) लोकतंत्र के उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, वहीं उत्तर भारत के राज्य अब भी पिछड़े नजर आते हैं।

    उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों का प्रदर्शन बंगाल की तुलना में काफी फीका है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद बंगाल में जनता की यह भागीदारी अभूतपूर्व है।

    यह आंकड़ा न केवल राजनीतिक जागरूकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि देश के मतदाता अब व्यवस्था में निर्णायक बदलाव के लिए पूरी तरह तत्पर हैं। यह ऐतिहासिक वृद्धि आने वाले समय में चुनावी रणनीतियों और लोकतंत्र की दिशा को नई परिभाषा देगी।