बंगाल की महिलाओं का असली मुद्दा: सुरक्षा, सम्मान और अवसर
बंगाल में महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद बेटियां सुरक्षा, सम्मान और अवसर के लिए संघर्ष कर रही हैं। लेख राज्य सरकार की विफलता और केंद्र की योजनाओं तथ ...और पढ़ें

बंगाल विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं पर नजर
HighLights
बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, अवसर मुख्य चुनावी मुद्दे।
ममता सरकार पर महिला अपराधों में व्यवस्थागत विफलता का आरोप।
भाजपा ने महिला-केंद्रित योजनाओं, आरक्षण का वादा किया।
अणिमा सोनकर : बंगाल वह राज्य है जहाँ एक महिला मुख्यमंत्री पिछले पंद्रह वर्षों से सत्ता में हैं, पर उसी राज्य में बेटियों को अपनी सुरक्षा माँगने के लिए बार-बार सड़क पर उतरना पड़ता है। एक महिला नेतृत्व वाली सरकार के तले महिलाओं का इस तरह असुरक्षित होना केवल विडंबना नहीं, यह राज्य शासन की पहचान बन चुका है। बंगाल की जिस भूमि ने राजा राम मोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर के ज़रिए देश को स्त्री-मुक्ति की पहली रोशनी दी थी, वहीं की बेटियाँ आज मशालें थामे न्याय माँग रही हैं।
बंगाल 2026 का असली चुनावी प्रश्न नारों का मुक़ाबला नहीं है। असली प्रश्न यह है कि कौन-सी सरकार महिला को केवल मतदाता समझती है, और कौन-सी उसे नागरिक मानती है। तृणमूल कांग्रेस वर्षों से कन्याश्री, रूपश्री और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं की दुहाई देकर अपनी ‘महिला-हितैषी’ छवि बनाती रही है। मगर असली परीक्षा सरकार के विज्ञापनों में नहीं, संकट की घड़ी में होती है। कल्याणकारी नीतियों के बहीखाते कितने भी मोटे क्यों ना हों, पर अगर बेटी रात को घर लौटते डरती है तो वह कल्याण अधूरा है। बंगाल की बहनों और बेटियों को आज तीन चीज़ों की दरकार है - सुरक्षा, सम्मान और अवसर। यही त्रिकोण इस विधानसभा चुनाव की असली कसौटी है।
ममता राज का असली रिकॉर्ड
बंगाल का दिल झकझोरने वाली घटनाओं का सिलसिला पिछले कई वर्षों से बेरुख़ी से चलता आ रहा है। 2012 के पार्क स्ट्रीट कांड में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीड़िता के बयान को “मनगढ़ंत घटना” कहकर ख़ारिज कर दिया था; उस एक टिप्पणी ने हर महिला तक यह संदेश पहुँचा दिया कि राज्य सत्ता केवल पीड़िता पर ही सवाल उठाती है। 2013 में कमदुनी कांड हुआ, जहाँ कॉलेज छात्रा के सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद गाँव की महिलाएँ सड़क पर उतरीं, और मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया ने पीड़िता-परिवार के घावों पर नमक छिड़का। उसी वर्ष मध्यमग्राम में एक किशोरी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, उसे बार-बार प्रताड़ित किया गया।
2022 में बीरभूम के बोगटुई में महिलाओं और बच्चों समेत दस लोगों को घरों में जिंदा जलाकर मार डाला गया। उसी वर्ष नदिया के हंसखाली में नाबालिग के साथ हुए बलात्कार के अपराध के बाद शव-दहन की जल्दबाज़ी और चिकित्सकीय रिकॉर्ड में हेरफेर के आरोप लगे, और कलकत्ता उच्च न्यायालय को सीबीआई जाँच का आदेश देना पड़ा।
खबरें और भी
2024 में संदेशखाली की महिलाओं ने स्थानीय तृणमूल नेताओं पर यौन उत्पीड़न और भूमि-हड़पने के संगीन आरोप लगाए; शिकायत करने आई औरतों पर भी राजनीतिक दबाव पड़ा। और उसी वर्ष आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ हुए जघन्य अपराध ने पूरे देश को हिला दिया। ‘नो सेफ्टी, नो ड्यूटी’ के आह्वान पर देशभर के डॉक्टर सड़क पर आए, और कोलकाता की लाखों महिलाएँ ‘रिक्लेम द नाइट’ आंदोलन में आधी रात सड़कों पर निकलीं। अलग ज़िले। अलग वर्ष। एक ही पैटर्न। यह इत्तिफ़ाक़ नहीं, यह व्यवस्थागत विफलता का दस्तावेज़ है। बाबासाहेब अंबेडकर ने संविधान सभा में चेताया था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिक सकता है जब सामाजिक लोकतंत्र उसकी आधारशिला हो। बंगाल में जिस तरह दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग की बेटियों के साथ हुए अपराध सबसे पहले दबा दिए जाते हैं, वह ममता बनर्जी के शासन काल में बाबासाहेब के उस सामाजिक लोकतंत्र की परिकल्पना के पराजय का संकेत है।
सत्ता-संरक्षित दबंगई का तंत्र
इन घटनाओं में शासन का बेरहम चरित्र उभरता है। अपराध होता है, परिवार न्याय माँगता है, समाज सड़क पर उतरता है, और सरकार बचाव की मुद्रा में आ जाती है। फिर शुरू होती है लीपा-पोती। सबूत मिटाने के आरोप, गवाहों पर दबाव, और प्रदर्शनकारियों पर ही पुलिसिया कार्रवाई। हुगली, बारासात, बशीरहाट, मेदिनीपुर, बंगाल के कई इलाक़ों में स्थानीय दबंगई को राजनीतिक संरक्षण मिलने की ख़बरें वर्षों से सुर्ख़ियाँ बनती रही हैं। यह कानून-व्यवस्था का संकट नहीं, यह उस शासन-दर्शन का संकट है जो विरोध को षड्यंत्र समझता है। आँकड़े स्वयं गवाह हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के प्रतिवेदनों में पश्चिम बंगाल वर्षों से महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में शीर्ष राज्यों की सूची में रहा है। यह सरकारी आँकड़ों की कड़वी सच्चाई है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो पीड़िता महिलाएं किसकी शरण में जाए?
मोदी सरकार ने बंगाल को क्या दिया
केंद्र सरकार की महिला-केंद्रित योजनाएँ पिछले एक दशक में बंगाल की लाखों माताओं और बहनों तक पहुँची हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने चूल्हे के धुएँ से माताओं और बहनों को मुक्ति दी। जल जीवन मिशन ने लाखों घरों तक जल पहुँचाने का वचन सच कर दिखाया। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने लाखों घर महिलाओं के नाम पर पंजीकृत हुए, और संपत्ति स्त्री की गरिमा बनी। मुद्रा योजना ने महिला उद्यमियों को बिना गारंटी ऋण देकर ‘लखपति दीदी’ बनाने का रास्ता खोला। जन धन योजना ने बहनों के नाम बैंक खाते खुलवाए, और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने बिचौलियों की दुकानें बंद कर दीं। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ने प्रसव के समय आर्थिक सहारा दिया, और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ ने सामाजिक मानसिकता को बदलने की नींव रखी। मिशन शक्ति के तहत वन-स्टॉप सेंटर और सखी निवास पीड़ित महिलाओं को संस्थागत सहारा दे रहे हैं। यह कल्याणकारी सूची भर नहीं, बल्कि मोदी सरकार द्वारा बंगाल में स्त्री को शासन के केंद्र में बिठाने की सोच है।
भाजपा का बंगाल संकल्प 2026
बंगाल के लिए भारतीय जनता पार्टी का घोषणा-पत्र महिला-केंद्रित शासन का एक साफ़ ख़ाका प्रस्तुत करता है। हर महिला के खाते में 3,000 रुपए प्रति माह की आर्थिक सहायता, ताकि स्त्री की आर्थिक स्वायत्तता मज़बूत हो। राज्य सरकार की नौकरियों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण, ताकि सरकारी तंत्र की हर परत पर बेटियाँ निर्णायक भूमिका में हों। पश्चिम बंगाल पुलिस भर्ती में 33 प्रतिशत महिला हिस्सेदारी की प्रतिज्ञा, ताकि थाने पहुँची फ़रियादी को सुनने वाली महिला अधिकारी हो। हर सब-डिवीज़न में महिला पुलिस थाना और हर थाने में ‘नारी सहायता डेस्क’। 75 लाख महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य। राज्य की बसों में महिलाओं के लिए नि:शुल्क यात्रा। हर ज़िले में कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल। आँगनवाड़ी, आशा और प्राणि मित्र कार्यकर्ताओं के मानदेय में संशोधन, ताकि सेवा करने वाली बहनों को भी गरिमा मिले।
भाजपा द्वारा अपने संकल्प पत्र में किए गए यह सारे वादे ढाँचा सहायता राशि और संस्थागत उपस्थिति तक सीमित नहीं है। महिला अपराधों पर ज़ीरो-टॉलरेंस की नीति। शहरी क्षेत्रों, शिक्षण संस्थानों, हॉस्टलों और सार्वजनिक स्थलों पर सख़्त क़ानून के ज़रिए महिला सुरक्षा। स्नातक में दाख़िला लेने वाली छात्राओं को 50,000 रुपए की एकमुश्त सहायता, ताकि उच्च शिक्षा का दरवाज़ा हर बेटी के लिए खुला रहे। और सबसे ज़रूरी, अत्याचार के उन मामलों को भाजपा द्वारा फिर से खोलने की प्रतिज्ञा जहाँ अब तक न्याय अधूरा है, साथ ही त्वरित अनुग्रह राशि और कानूनी सहायता। यह केवल चुनावी वायदा नहीं, यह भाजपा की उस सोच का प्रतिबिंब है जो महिला को आँकड़ा नहीं, आत्मा मानती है। ममता सरकार ने भत्ता दिया, भाजपा भरोसा देगी।
मोदी की बंगाल गारंटी
प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार में अपने भाषणों में बंगाल की बेटियों के लिए जिन गारंटियों की बात की है, वे केवल वायदे नहीं, ज़मीनी प्रतिबद्धताएँ हैं। हर बहन को सुरक्षा का भरोसा। हर बेटी को शिक्षा की गारंटी। हर माँ को आवास और स्वास्थ्य का अधिकार। हर महिला उद्यमी को ऋण की पहुँच। हर ग़रीब परिवार को पोषण और स्वच्छ ईंधन। हर युवती को अवसर का खुला आसमान। प्रधानमंत्री की भाषा में बंगाल केंद्र में है, परिधि पर नहीं। जब वे बंगाल की माताओं और बहनों को संबोधित करते हैं, तो उनकी भाषा करुणा की नहीं, इरादे की होती है। उज्ज्वला के सिलेंडर, जल जीवन के नल, आवास के पट्टे, मुद्रा का ऋण - ये सब उसी गारंटी की भौतिक अभिव्यक्ति हैं। घोषणा काग़ज़ पर होती है, पर मोदी की गारंटी ज़मीन पर उतरती है।
अब निर्णय बंगाल का है
बंगाल में चल रहा विधानसभा का यह चुनाव योजनाओं के नामों का नहीं, शासन के चरित्र का है। यह राज्य में सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि भय बनाम भरोसे का चुनाव है। बंगाल को आज तसल्ली नहीं, समाधान चाहिए। दया नहीं, गरिमा चाहिए। चुप्पी नहीं, उत्तर चाहिए। जिस राज्य ने माँ दुर्गा को पूजा है, वह अपनी बेटियों को भयभीत नहीं रख सकता। 4 मई को आने वाला जनादेश अब पुरानी असुरक्षा को विदा कह सकता है। सुरक्षा, सम्मान और अवसर: यही बंगाल की महिला का संकल्प है, और यही 2026 का असली जनादेश होगा।
(अणिमा सोनकर दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की सहायक प्रोफेसर हैं तथा भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा की राष्ट्रीय सोशल मीडिया संयोजक हैं)