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चुनाव में तृणमूल पर भारी पड़ी भाजपा की कारगर रणनीति, फेल हो गया ममता का 'बंगाली अस्मिता' का दांव

By Rajeev Kumar JhaEdited By: Jeet Kumar
Published: Mon, 04 May 2026 10:35 PM (GMT+05:30)Updated: Tue, 05 May 2026 12:29 AM (GMT+05:30)

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस जहां अपनी कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर भरोसा जता ...और पढ़ें

चुनाव में तृणमूल पर भारी पड़ी भाजपा की कारगर रणनीति (फोटो- जागरण)

चुनाव में तृणमूल पर भारी पड़ी भाजपा की कारगर रणनीति (फोटो- जागरण)

HighLights

  1. भाजपा ने हर मोर्चे पर किया तृणमूल का काउंटर

  2. तृणमूल की बंगाली अस्मिता का हथियार भी नहीं आया काम 

राजीव कुमार झा, कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि रणनीति, वादों और नैरेटिव की लड़ाई का भी था।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस जहां अपनी कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर भरोसा जता रही थी और चुनाव में इसे भुनाने की पूरी कोशिश की, वहीं मुख्य विपक्षी भाजपा ने इन दोनों मोर्चों पर आक्रामक और योजनाबद्ध तरीके से जवाबी काट पेश किया।

भाजपा न सिर्फ सबका काट लेकर सामने आई बल्कि हर मोर्चे पर उसकी कारगर रणनीति तृणमूल पर भारी पड़ी और मैदान मार ले गई। सबसे बड़ा दांव भाजपा ने महिलाओं और युवाओं पर खेला।

ममता सरकार की लोकप्रिय लक्ष्मी भंडार योजना, जिसके तहत महिलाओं को मासिक 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता मिलती है, उसके मुकाबले भाजपा ने अपने चुनावी संकल्प पत्र (भरोसा शपथ) में दोगुना राशि यानी मासिक 3,000 रुपये देने का वादा किया।

साथ ही महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त बस यात्रा, सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण, महिला पुलिस बटालियन का गठन और हर ब्लॉक में महिला थाना खोलने जैसे वादों ने महिला मतदाताओं को खासा आकर्षित किया। पांच वर्षों में एक करोड़ रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर देने का भाजपा का दावा, बेरोजगार युवाओं के बीच असरदार साबित हुआ।

बंगाली अस्मिता के कार्ड को किया निष्प्रभावी

भाजपा ने तृणमूल के सबसे मजबूत हथियार-बंगाली अस्मिता के ट्रंप कार्ड को भी निष्प्रभावी कर दिया, जिसे सत्तारूढ़ दल ने 2021 के विधानसभा चुनाव में खूब भुनाया था। टीएमसी ने इस बार भी मुद्दे को जोर-शोर से उठाया।

ममता ने अपनी प्रत्येक चुनावी रैलियों में यह आरोप लगाया कि भाजपा सत्ता में आने पर बंगाल की खान-पान संस्कृति पर असर डालेगी, खासकर बंगालियों के प्रिय मांस- मछली खाने पर प्रतिबंध लगा देगी। पूरे चुनाव में मछली का मुद्दा छाया रहा।

भाजपा ने इस आरोप का जवाब प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर दिया। भाजपा के कई उम्मीदवारों ने खुले तौर पर मछली के साथ चुनाव प्रचार किया।

वहीं, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर मछली खाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के खिलाफ नहीं है।

जय मां काली और जय मां दुर्गा का लिया सहारा

नैरेटिव की लड़ाई में भाजपा ने अपने पारंपरिक जय श्रीराम के नारे की जगह बंगाल में लोकप्रिय जय मां काली और जय मां दुर्गा जैसे स्थानीय और भावनात्मक रूप से जुड़े नारों को आगे बढ़ाया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने अपनी प्रत्येक चुनावी रैलियों में स्थानीय मंदिरों, धार्मिक स्थलों व मनीषियों का नाम लेकर ही अपना भाषण शुरू किया और क्षेत्रीय जुड़ाव को मजबूत करने की कोशिश की।

भाजपा ने चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहने दिया, बल्कि इसे योजनाओं की प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक भरोसे की लड़ाई में बदल दिया। नतीजों से साफ हो गया कि बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत की सबसे बड़ी वजह पार्टी की आक्रामक और बहुस्तरीय रणनीति रही।

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