कांपती नहीं...अब पर्दे पर दहाड़ रही हैं ये हीरोइनें, बॉलीवुड में एक्शन 'क्वीन' बनकर उभरीं ये एक्ट्रेसेस
बॉलीवुड में एक्शन फिल्मों का क्रेज काफी बढ़ा है और उसके साथ ही महिलाओ ने भी अपना दायरा बढ़ाया है। इंडियन सिनेमा में कई ऐसी एक्ट्रेसेस हैं, जो एक्शन क्वी ...और पढ़ें

पर्दे पर एक्शन क्वीन बनकर एक्ट्रेसेस ने मचाया धमाल/ फोटो- Instagram
HighLights
आलिया, दीपिका, सामंथा जैसी अभिनेत्रियां एक्शन में आगे
एक्शन जेंडर नहीं, कहानी और किरदार पर निर्भर करता है
महिला एक्शन फिल्मों के लिए बॉक्स ऑफिस बेहतर हुआ
एंटरटेनमेंट डेस्क, मुंबई। इस बार सीता लंका खुद जलाने आई है। ऐल्फा के एक दृश्य में सीता (आलिया भट्ट) का यह संवाद हिंदी सिनेमा में महिला एक्शन किरदारों के बदलते तेवर का ऐलान है। आगामी दिनों में दीपिका पादुकोण फिल्म राका, तापसी पन्नू फिल्म गांधारी में जबरदस्त एक्शन करती दिखेंगी। वहीं प्रियंका चोपड़ा हालीवुड फिल्म द ब्लफ, हेड्स आफ द स्टेट समेत कई बालीवुड प्रोजेक्ट में एक्शन कर चुकी हैं।
ऐसे में भारतीय सिनेमा में महिला एक्शन फिल्मों का दायरा पहले से अधिक व्यापक हो गया है। हालिया रिलीज तेलुगु एक्शन कॉमेडी मां इंटी बंगारम में सामंथा रूद्र प्रभु का एक्शन अवतार सुर्खियों में रहा। इससे पहले वह वेब सीरीज सिटाडेल हनी बनी और द फैमिली मैन सीजन 2 में अपने एक्शन से दर्शकों को प्रभावित कर चुकी हैं। सामंथा का कहना है कि यह बहुत मुश्किल काम है, खासकर मुझ जैसी कमजोर-सी दिखने वाली महिला के लिए। हालांकि मुझे डांस से ज्यादा मजा एक्शन करने में आता है। इस फिल्म में सारे स्टंट उन्होंने खुद ही किया है।
किरदारों को देखते हुए तय होता है एक्शन
महिला किरदारों के लिए एक्शन डिजाइन करने को लेकर एक्शन डायरेक्टर शाम कौशल का मानना है कि एक्शन का संबंध लिंग से नहीं, बल्कि कहानी से होता है। वह कहते हैं कि यह कहानी की परिस्थितियां और किरदार निर्धारित करते हैं कि एक्शन कैसा होगा। उसके आधार पर तय होता है बंदूकें चलेंगी, तलवार या फिर हाथों से लड़ाई होगी।
हां, एक बात जरूर है कि कभी-कभी महिला पात्रों की वेशभूषा को ध्यान में रखते हुए उनके कुछ एक्शन मूव्स में मामूली बदलाव करने पड़ते हैं ताकि वो विश्वसनीय दिखे। इसके अलावा कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं होता।
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एक्शन डिजाइन के हिसाब से खर्च होता है पैसा
एक्शन आधारित फिल्मों में बजट सबसे अहम पहलुओं में से एक होता है। कंगना रनौत अभिनीत फिल्म धाकड़ के निर्देशक रजनीश घई बताते हैं, हमारा एक्शन इंटरनेशनल स्तर का था। हमारी पूरी एक्शन टीम विदेश से आई थी और उनके वर्क एथिक्स (कार्य संस्कृति) हमारे यहां से थोड़े अलग हैं। विदेशी एक्शन कोरियोग्राफर टीम का भुगतान मासिक नहीं वीकली होता है।
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उनके दिन के काम करने के घंटे तय होते हैं। हमारी तरह नहीं है जो हम 12 घंटे के शिफ्ट में कभी-कभी हम 16 घंटे भी कर लेते हैं। उनका ओवरटाइम महंगा पड़ता है क्योंकि उनके नियम तय हैं। हमारी इंडस्ट्री का नियम है अगर टीम विदेश से आ रही है तो उतने ही स्वदेशी एक्शन टीम से होंगे। तो एक्शन डिजाइन जितना बड़ा होता है, उसका खर्च भी उतना ही बढ़ जाता है।

महिला प्रधान फिल्मों का दर्शक सीमित है
महिला-केंद्रित एक्शन फिल्मों में रानी मुखर्जी अभिनीत मर्दानी हिंदी सिनेमा की एकमात्र सफल फ्रेंचाइजी हैं। गोपी पुथरन जिन्होंने मर्दानी 2 का लेखन और निर्देशन किया था उन्होंने ही पहली मर्दानी लिखी थी। महिला केंद्रित फिल्मों में सामाजिक संदेश शामिल करने को लेकर गोपी कहते हैं कि यह 'सिंघम' जैसी फिल्म नहीं थी, जिसमें एक्शन के साथ कॉमेडी और मनोरंजन के दूसरे तत्व भी हों। दरअसल, यह एक वास्तविक घटना पर आधारित कहानी थी, इसलिए सामाजिक संदेश कहानी के डीएनए में स्वाभाविक रुप से मौजूद था।
हालांकि आम धारणा है कि महिला-प्रधान फिल्मों का दर्शक वर्ग सीमित होता है। इस बाबत गोपी कहते हैं कि ऐल्फा की पोजिशनिंग काफी दिलचस्प है, क्योंकि यह एक सफल स्पाई फ्रेंचाइजी का हिस्सा है और इसमें आलिया जैसी सुपरस्टार मुख्य भूमिका में हैं। अगर ऐल्फा को मजबूत पटकथा और प्रभावी ढंग से पेश किया गया, तो मेरा मानना है कि यह महिला प्रधान फिल्मों के लिए एक नया और मजबूत बाजार तैयार कर सकती है।
अभिनेत्रियों को इसलिए नहीं मिला एक्शन हीरोइन का तमगा
हिंदी सिनेमा में अक्षय कुमार, अजय देवगन, टाइगर श्रॉफ, विद्युत जामवाल एक्शन हीरो के तौर पर भी विख्यात है। अभिनेत्रियों को यह तमगा देने को लेकर गोपी कहते हैं कि पुरुष कलाकारों ने कई एक्शन प्रधान फिल्में की हैं। अभिनेत्रियों को फिल्म में थोड़ा या एकाध फिल्म करने को मिलती है। उससे तो कोई एक्शन स्टार नहीं बनता। आपको करीब पांच एक्शन जॉनर की फिल्में करनी पड़ती है तब कह सकते हैं एक्शन स्टार। अगर अभिनेत्रियों को इतनी सारा एक्शन करने को मिले, तो उन में से भी कोई आएगा एक्शन स्टार।

बेहतर हुआ है बॉक्स ऑफिस
ट्रेड एनालिस्ट गिरीश जौहर का मानना है कि पहले के मुकाबले महिला एक्शन फिल्मों के लिए बॉक्स ऑफिस की स्थिति बेहतर हुई है। वह कहते हैं पहले ऐसी फिल्में बहुत कम बनती थीं। उस दौर में विजयशांति या रेखा जैसी अभिनेत्रियां एक्शन फिल्में करती थीं। खून भरी मांग को एक्शन फिल्म कह सकते हैं या रिवेंज ड्रामा। आज सबसे बड़ा बदलाव स्टोरीटेलिंग में आया है। पहले दर्शक महिला-प्रधान फिल्मों को देखने में उतने सहज नहीं थे और अक्सर ऐसी फिल्मों में बदले की कहानी जैसा मजबूत कारण होना जरूरी माना जाता था, लेकिन अब संभावनाओं के कई नए दरवाजे खुल चुके हैं।
दर्शक पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व हो गए हैं और वे लगातार ग्लोबल कंटेंट देख रहे हैं। सुपरगर्ल, वंडरवूमन जैसी फिल्मों ने दुनिया भर में दर्शकों की सोच को बदला है और उसका असर भारत में भी, खासकर मेट्रो शहरों में, साफ दिखाई देता है। हॉलीवुड फिल्मों को देखने की बढ़ती आदत ने भी दर्शकों को इस तरह के कंटेंट को स्वीकार करने के लिए तैयार किया है। इसलिए अगर कंटेंट दमदार होगा, तो महिला एक्शन फिल्मों को भी बाक्स आफिस पर अपनी मजबूत जगह जरूर मिलेगी।