'कोयले की तरह अंदर से जल रहा था', Glory के लिए कई संघर्षों से गुजरे पुलकित- दिव्येंदु, खोले कई गहरे राज
नेटफ्लिक्स सीरीज 'ग्लोरी' 1 मई को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी है। हाल ही में एक बॉक्सर की भूमिका में ढलने के लिए पुलकित-दिव्येंदु ने क्या-क्या झेला, इ ...और पढ़ें
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ग्लोरी नेटफ्लिक्स पर हुई रिलीज/ फोटो- Instagram

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण न्यूजनेटवर्क, मुंबई। 'मिर्जापुर' में मुन्ना भैया बने दिव्येंदु शर्मा और फिल्म 'बैंगिस्तान' में प्रवीन चौधरी की भूमिका निभाने वाले पुलकित सम्राट को निर्देशक और निर्माता करण अंशुमान एक साथ लाए हैं नेटफ्लिक्स पर रिलीज वेब सीरीज 'ग्लोरी' में। दरअसल 'मिर्ज़ापुर' और 'बैंगिस्तान' दोनों के निर्देशक करण ही हैं। इस सीरीज का अहम हिस्सा बॉक्सिंग है। शो में पुलकित और दिव्येंदु भाई के रोल में हैं...
ग्लोरी से जुड़ने की क्या कहानी रही?
दिव्येंदु: 'मिर्जापुर' हमारा सफल प्रोजेक्ट रहा था। मैंने एक बार करण को बोला था, "यार साथ काम करते हैं?" उन्होंने कहा कि हां, मैं कुछ लिख रहा हूं, बताऊंगा। फिर कुछ समय बाद करण ने कहा कि लिख लिया है और अब टाइम आ गया है सुनाने का। मैं खुश था कि कुछ मजेदार आने वाला है। इसमें बॉक्सिंग, फैमिली, इमोशन और थ्रिलर सब कुछ है। यह दोबारा साथ आने का बेहतरीन मौका लगा।
पुलकित: जब हमने 'ग्लोरी' की बात की थी, तो करण ने बताया था कि इसमें दिव्येंदु आपके बड़े भाई के रोल में होंगे। तब तक नेटफ्लिक्स भी जुड़ा नहीं था। पूरी कास्टिंग भी तय नहीं हुई थी, लेखन चल रहा था, लेकिन मैंने किरदार पर काम करना शुरू कर दिया था। करण के साथ सीखने को भी बहुत मिलता है और पिछले दस साल में हम दोनों का अपना सफर रहा है। हमने एक-दूसरे की ग्रोथ और गलतियां भी देखी हैं। एक-दूसरे के प्लस पॉइंट्स भी समझे हैं।
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यह पात्र निभाना आप दोनों के लिए आसान नहीं था...
पुलकित: मेहनत और ट्रेनिंग बहुत लगी। फिजिकल ट्रेनिंग करनी पड़ी, क्योंकि बॉक्सर का किरदार निभाना था। बॉक्सर का किरदार आप सिर्फ निभा नहीं सकते, उसे जीना पड़ता है, क्योंकि आपको एक एथलीट की तरह ट्रेन करना पड़ता है। एक बॉक्सर की तरह रहना होता है। तकनीक सीखनी पड़ती है। यह सब एक भारी फिजिकल मेहनत थी। उसके साथ ही मेरे पात्र 'रवि' की अपनी इमोशनल जर्नी भी है।
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दिव्येंदु: करण हमेशा मुझे ऐसे ही पात्र देते हैं, जिसमें बहुत अंदर तक जाना पड़ता है। 'देव' में जैसे... मैं कैसे बोलूं... जैसे एक ज्वालामुखी होता है ना, वो बिल्कुल उस तरीके का किरदार है। उसके अंदर कुछ-कुछ जल रहा है। कोयले की तरह धधक रहा है। उसका खुद का ट्रॉमा बहुत है... अपने पिता के साथ, अपने परिवार के साथ। वह किसी खास वजह से शक्तिगढ़ लौटा है। वो आसान तो नहीं था बिल्कुल भी, तो उसे निभाना, दिन-प्रतिदिन उस डार्कनेस को लेना, वो कहीं न कहीं आपको थोड़ा सा प्रभावित करता है। जब हमारी शूटिंग खत्म हुई, तो मैं बहुत खुश हुआ। मुझे लगा कि अब मैं उस गर्म कोयले पर थोड़ा पानी डाल सकता हूं, थोड़ा ठंडा हो सकता हूं, क्योंकि हर दिन मैं भीतर से जल रहा था। तो हां, बहुत मजा आया, लेकिन वो तपस्या, वो बलिदान... वो सब रहा।

पुरानी कड़वी यादें भी ताजा करनी पड़ीं?
पुलकित: मैं बहुत ज्यादा सोचता नहीं हूं, लेकिन इस किरदार ने मुझे जिंदगी की जितनी भी बुरी बातें थीं या मेरे अंदर के जो 'डार्क थॉट्स' थे, उन्हें मेरे सामने एक आईने की तरह रख दिया। जब तक मैं उन डार्क थॉट्स से बात नहीं करूंगा, तब तक मैं 'रवि' को नहीं निभा पाऊंगा। रवि का अपना अतीत है। पिता ही कोच हैं। मुझे अपनी लाइफ से ऐसी-ऐसी चीजें खुरच-खुरच के निकालनी पड़ीं, जिनसे मैं शायद पहले भागता था।
शो में 'ग्लोरी' का मतलब है त्याग, बलिदान और कष्ट, लेकिन असल जिंदगी में आप लोगों के लिए 'ग्लोरी' का मतलब क्या है?
दिव्येंदु: मेरे लिए ग्लोरी है अपनी शर्तों पर काम करना। वो रास्ता आसान नहीं होता, जब आप कुछ अलग करना चाहते हैं। इंडस्ट्री में चाहे वो एक कैरेक्टर से निकलकर दूसरा कैरेक्टर प्ले करना हो, या एक इमेज से निकलकर दूसरी इमेज में जाना हो। अगर कहीं ना कहीं आप वो करने में सफल होते हैं, उसे मैं निजी तौर पर ग्लोरी बोलूंगा।
पुलकित: यह सच है कि त्याग, बलिदान और कष्ट से ही आपको ग्लोरी प्राप्त होती है, क्योंकि सब लोग सिर्फ परिश्रम देखते हैं। वो त्याग, बलिदान और कष्ट नहीं देखते। मेरे लिए ग्लोरी एक ऐसा मुकाम है, जहां लोग मेरी तुलना दूसरों से करना छोड़कर, दूसरों की तुलना मुझसे करना शुरू कर दें।
सेट पर एक-दूसरे की क्या चीजें खास लगीं?
दिव्येंदु: मैंने पुलकित के बारे में जाना कि वो दूसरों के बारे में बहुत सोचता है। चाहे खाने की बात हो या अपने सह-कलाकार के लिए भावनात्मक रूप से मौजूद रहना हो। वो बात मुझे बहुत अच्छी लगी कि इस मामले में वो संवेदनशील है। बहुत जरूरी था उनकी तरफ से वो चीज मिलना, ताकि मैं 'देव' बनकर अपने आपको पूरे तरीके से एक्सप्रेस कर पाऊं।
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पुलकित: दिव्येंदु का काम बहुत अच्छा है, सीखने को मिला। बहुत ही सुलझे इंसान हैं। फालतू की 'भसड़' में नहीं पड़ते हैं। स्पष्टवादी और मुंहफट हैं। ऐसा होना बहुत ही मुश्किल होता है। जो दिल में है, वही ज़ुबान से निकलेगा। अगर बुरी बात आ रही होगी, वो आपके लिए क्रिएटिव आलोचना के लिए आ रही होगी, आपको नीचा दिखाने के लिए नहीं आ रही होगी। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है, जिसका इस्तेमाल करके वो आपको गाइड करके सही जगह ला सकते हैं।