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    Raj Kapoor के चलते बनी Rajesh Khanna की ये ब्लॉकबस्टर, मौत की आहट के बीच जिंदगी का जश्न मनाती है फिल्म

    Updated: Sun, 08 Mar 2026 07:00 AM (IST)

    राजेश खन्ना की एक ब्लॉकबस्टर फिल्म राज कपूर से प्रेरित थी जिसे उनके सबसे करीबी दोस्त ने बनाया था। इस ब्लॉकबस्टर फिल्म पर पढ़ें आर्टिकल। ...और पढ़ें

    राज कपूर से प्रेरित थी राजेश खन्ना की फिल्म। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

    राज कपूर से प्रेरित थी राजेश खन्ना की फिल्म। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

    HighLights

    1. राज कपूर की दोस्ती से प्रेरित थी हिट फिल्म

    2. राजेश खन्ना ने मुख्य भूमिका निभाकर लूटी महफिल

    3. फिल्म की तरह डायलॉग भी रहे सदाबहार

    संदीप भूतोड़िया, मुंबई। जब 12 मार्च 1971 को ऋषिकेश मुखर्जी की 'आनंद' पर्दे पर उतरी, तो इसमें न तो मार-धाड़ का शोर था और न ही कोई भव्य सेट। यह तो बस एक मरते हुए इंसान की सादा सी कहानी थी। लेकिन आज पांच दशक बाद भी 'आनंद' हिंदी सिनेमा का वो चमकता हुआ सूरज है जिसकी गर्मी हर पीढ़ी महसूस करती है।

    यह फिल्म सिर्फ मौत की बात नहीं करती, बल्कि उस इंसानियत और जिंदादिली का जश्न मनाती है, जो हमें टूटने के बाद फिर से जुड़ना सिखाती है। 'आनंद' के केंद्र में एक अजीब सी कशमकश है: एक ऐसी फिल्म जो मौत की दहलीज पर खड़ी है, लेकिन जिसमें हंसी के फुव्वारे फूटते हैं। ऋषिकेश मुखर्जी ने इस कहानी को अपनी निजी भावनाओं से सींचा था।

    राज कपूर की वजह से बनी आनंद मूवी

    कहा जाता है कि इस फिल्म का बीज राज कपूर के साथ उनकी गहरी दोस्ती से उपजा था। जब राज कपूर की सेहत बिगड़ी, तो ऋषि दा को अपने उस चुलबुले दोस्त के बिना दुनिया अधूरी लगने लगी। उसी बेचैनी ने 'आनंद सहगल' (राजेश खन्ना) को जन्म दिया— एक ऐसा किरदार जो मरते दम तक दूसरों के दुखों को अपनी शरारतों से धो देता है।

    कविता की तरह फिल्म की कहानी

    आनंद सहगल दरअसल राज कपूर की उस अदम्य ऊर्जा का फिल्मी अक्स था, जिसे खोने से ऋषि दा डरते थे। कहानी किसी कविता की तरह सरल है। एक तरफ हैं 'बाबू मोशाय' यानी डॉ. भास्कर बनर्जी जो दुनिया की नाइंसाफियों और बीमारियों को देखकर उदास रहते हैं।

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    Anand Film

    दूसरी तरफ उनके जीवन में बवंडर बनकर आता है आनंद—एक ऐसा मरीज जिसके पास जीने को बस चंद सांसें बची हैं लेकिन आनंद हार मानने के बजाय, हर पल को एक उत्सव बना देता है। भास्कर की यादों के जरिए लिखी गई यह दास्तां दरअसल उस दोस्ती का शुक्रिया है जिसने उसे बदल कर रख दिया।

    अमर हो गया राजेश खन्ना का डायलॉग

    गुलजार साहब की कलम ने इस फिल्म के संवादों में ऐसी जान फूंकी कि वे आज हमारी जुबान का हिस्सा बन चुके हैं। “बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं”—यह महज एक डायलॉग नहीं, बल्कि जीने का वो फलसफा है जिसने करोड़ों लोगों को गम के अंधेरों से निकाला है। आनंद की नाटकीयता कभी बनावटी नहीं लगती क्योंकि उसके पीछे छिपी तन्हाई और दर्द को फिल्म ने बड़ी खूबसूरती से सहेजा है।

    राजेश खन्ना ने अपनी भूमिका में भरी जान

    राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) ने इस फिल्म में जो जादू कर दिखाया, वो शायद कोई और नहीं कर सकता था। उस वक्त वे सुपरस्टार थे, लेकिन आनंद बनकर उन्होंने अपनी उस चमक को बड़ी ही संजीदगी के साथ पर्दे पर उतारा। उनकी आंखों में एक तरफ शरारत चमकती थी, तो दूसरी तरफ मौत का सन्नाटा भी झलक जाता था।

    रुला देता है फिल्म का क्लाइमैक्स

    वहीं दूसरी ओर, अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) की खामोशी और उनकी गंभीर शख्सियत ने आनंद के किरदार को और भी ऊंचा कर दिया। फिल्म के क्लाइमैक्स में जब आनंद की रिकॉर्ड की गई आवाज गूंजती है और भास्कर का धैर्य टूटता है, तो दर्शकों का कलेजा मुंह को आ जाता है। वो सीन आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।

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    सदाबहार आनंद फिल्म के गाने

    सलील चौधरी का संगीत और मुकेश व मन्ना डे की आवाज ने इस फिल्म को अमर कर दिया। 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' और 'जिंदगी कैसी है पहेली'- ये गाने आज भी अकेलेपन के साथी की तरह लगते हैं। 

    क्या सिखाती है आनंद फिल्म?

    'आनंद' आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह हमें सिखाती है कि खुश रहना दरअसल एक चुनाव है। दुनिया भर की तड़क-भड़क के बीच, यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि एक छोटा सा मजाक, एक खामोश बात या बस एक साथ बिताया पल भी जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा हो सकता है। इसीलिए आज भी, जब दिल भारी होता है, तो लोग 'आनंद' को याद करते हैं- उस दोस्त की तरह जो हमें फिर से मुस्कुराना सिखा देता है।

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