60 सालों से Mohammad Rafi के इस गाने को माना जाता है अभिशाप, किसने दी आशा पारेख को बद्दुआ?
मोहम्मद रफी ने साल 1966 में आई फिल्म में एक ऐसा गाना गाया था जिसके बोल सीधे दिल पर चोट करते हैं। इस गाने को 'बद्दुआ' के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। ...और पढ़ें
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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई ऐसे गानों की लिस्ट भरी पड़ी है जिसे लोग अपने मूड, फीलिंग्स और इजहार करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। चाहे वो लव एट फर्स्ट साइट हो, दिल टूटने का दर्द हो, या फिर जिंदगी का जश्न हमारे पास हर मौके के लिए एक परफेक्ट 'प्लेलिस्ट' तैयार रहती है।
जिन चीजों को कई बार शब्दों के जरिए बयां कर पाना मुश्किल होता है उसके लिए गाने खूबसूरत काम करते हैं। लेकिन क्या आप कभी सोच सकते हैं कि फिल्म के किस गाने को बद्दुआ के तौर पर भी इस्तेमाल किया गया होगा?
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गाने को बद्दुआ के तौर पर करते हैं इस्तेमाल
शायद नहीं तो चलिए आज हम आपको एक ऐसे ही गाने के बारे में बताने वाले हैं जिसका इस्तेमाल इस तरह किया जाता है जैसे किसी को कोई बद्दुआ दी जा रही हो। हम बात कर रहे हैं 1966 में आई फिल्म 'आए दिन बहार के' (Aaye Din Bahar Ke) की जिसमें धर्मेंद्र (Dharmendra), आशा पारेख (Asha Parekh), बलराज साहनी, राज मेहता और सुलोचना लतकर ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
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इस फिल्म के गाने मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे की एक-एक लाइन अगर आप ध्यान से सुनेंगे तो आपको समझ आएगा कि इसके बोल कुछ इसी तरह लिखे गए हैं। सुनकर समझ आता है जैसे गाने वाले के दिल में कितनी नफरत भरी है। गाने के बोल आनंद बक्शी ने लिखे हैं।
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मोहम्मद रफी ने दी है आवाज
इस फिल्म के गाने को अभिशाप के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। तू फूल बने पतझड़ का, तुझ पे बहार न आए कभी... मेरी ही तरह तू तड़पे तुझको करार न आए कभी...जिये तू इस तरह की जिंदगी को तरसे सुनकर ही लग रहा है कि गाने वाले के दिल में कितना दुख भरा हुआ है। इस गाने को आवाज मोहम्मद रफी ने दी है। मोहम्मद रफी की आवाज में वैसे ही वो जादू था जो सीधे दिल में उतर जाती थी।
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आनंद बख्शी साहब ने इस गाने के बोल इतने तीखे और गहरे लिखे थे कि वे सीधे दिल पर चोट करते हैं। वहीं इसका संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया है जो अपनी विधा में माहिर हैं। ये गाना साफ तौर पर धोखे की कहानी बयां करता है।