शिवाजी महाराज: अब बड़े पर्दे पर दिखेगा जीजाबाई के संस्कार और 'स्वराज्य' का संघर्ष, Chhaava के बाद बढ़ा पीरियड फिल्मों का क्रेज
समकालीन भारतीय सिनेमा में छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके सहयोगियों का गौरवशाली इतिहास बड़े पर्दे का पसंदीदा विषय है। आने वाले दिनों में क्या दिखेगा इस ...और पढ़ें
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इतिहास से पन्नों से सिनेमा में छाएंगे शिवाजी

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज छत्रपति शिवाजी राजे भोसले केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी शासक, कुशल रणनीतिकार और जनकल्याण के प्रति समर्पित राष्ट्रनिर्माता थे। सत्रहवीं
शताब्दी में शिवाजी ने न केवल मुगल साम्राज्य को चुनौती दी, बल्कि एक ऐसे स्वराज्य आंदोलन की नींव रखी, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। शिवाजी और उनके सहयोगियां के वीरगाथाओं के ढेरों किस्से इतिहास में दर्ज हैं।
तान्हाजी और छावा को मिला भरपूर प्यार
इन प्रेरणादायक कहानियों पर भारतीय सिनेमा में कई फिल्में बनी हैं। इनमें मराठी फिल्म छत्रपति शिवाजी, शेर शिवाजी, धर्मरक्षक महावीर छत्रपति संभाजी महाराज पार्ट 1, हिंदी में अजय देवगन अभिनीत तान्हाजी : द अनसंग वारियर (Tanhaji The Unsung Warrior) और विक्की कौशल अभिनीत छावा (Chhaava) आई। आगामी दिनों में भी रितेश देशमुख फिल्म राजा शिवाजी ला रहे हैं। उसके बाद ऋषभ शेट्टी अभिनीत द प्राइड आफ भारत : छत्रपति शिवाजी महाराज अगले साल आएगी।
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आने वाली पीढ़ियों को मिलेगी इतिहास की सीख
हाल में आई खबरों में कहा गया था कि लक्ष्मण उतेकर शाहूजी महाराज पर फिल्म बनाने की तैयारी में हैं। शिवाजी के सेनापति बाजी प्रभु देशपांडे पर फिल्म हर हर महादेव बना चुके अनिरुद्ध देशपांडे का मानना है इतिहास की सही समझ अगली पीढियों तक पहुंचाना बहुत जरूरी है।
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वह कहते हैं कि बच्चों को बताया जाता है कि अकबर ग्रेट है तो उन्हें ये भी सिखाओ कि शिवाजी महाराज सबसे महानतम थे। शिवाजी और उनसे जुड़े लोगों की प्रेरणात्मक कहानियां प्रेरणा का स्रोत है जो आने वाली पीढि़यों को जड़ों से जोड़ेगा। उससे हमारा सच्चा इतिहास जिसको पिछले बहुत सारे सालों से शायद जानबूझ कर दबाया गया था अब उजागर हो रहा है।
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वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों, जैसे अमेरिका, इजरायल और ईरान, रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के बीच भारतीय दृष्टिकोण को भी वह प्रासंगिक मानते हैं। अभिजीत कहते हैं हमारी सनातन संस्कृति, हमारी भारतीय संस्कृति का सार यही है कि हम कभी भी विस्तारवादी नहीं रहे हैं। महाभारत में युधिष्ठिर का दृष्टिकोण हो या गीता में श्रीकृष्ण का उपदेश भारतीय परंपरा हमेशा धर्म, करुणा और संयम पर आधारित रही है।
छावा और तान्हाजी के बाद अब क्या?
छत्रपति शिवाजी महाराज ने जनता की सुरक्षा और कल्याण को अपना उद्देश्य बनाया। उन्होंने कभी विलासित या अहंकार को प्राथमिकता नहीं दी। मुझे लगता है कि संयम और वीरता का जो मेल है, वही देश की असली पहचान है। छत्रपति शिवाजी महाराज तो एक महासागर की तरह है तो उसमें से आप कितना भी पानी निकालोगे तो वो कम ही है। अभिजीत भी शिवाजी पर फिल्म बनाने की तैयारी में हैं। इस फिल्म की शूटिंग अगले साल आरंभ होगी। वह बताते हैं मैं एक साउथ के एक्टर के साथ बना रहा हूं। युद्ध जीतना फिर भी आसान होता है लेकिन मन के भीतर के संघर्षों को जीतना बहुत मुश्किल होता है।
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शिवाजी के जीवन में कई निजी दुख और चुनौतियां थी। उनके और उनके पिताजी का वास्तव में क्या संबंध था? वह कभी फ्रंटफुट पर होते थे, कभी जीतते थे, कभी थोड़ा पीछे जाना पड़ता था। सिर्फ पचास सालों में उन्होंने हिंदुत्व को जिंदा कर दिया। सनातन धर्म वापस लाए यह कैसे हुआ तो हर हर महादेव में बाजी प्रभु देशपांडे का नजरिया था। उसी तरह इसमें शिवाजी महाराज का नजरिया होगा।
शिवाजी की मां का संघर्ष दिखेगा सिनेमा में
शिवाजी के अनछुए पहलू पर फिल्म की तैयारी कर रहे निर्देशक अमित राय कहते हैं शिवाजी का गौरवशाली इतिहास रहा है। ये वो लड़ाके रहे हैं जो औरंगजेब के विरुद्ध खड़े हुए थे। मुझे लगता है कि बीच में इतना सारा आक्रमण हुआ है कि हमारे इतिहास ये बात कहीं छुप गई ही रह गई। उन्होंने न तो कोई राजमहल बनवाए न ही अपने इतिहास को खुद लिखवाया। मुझे लगता है समय आ गया है फिर से इनकी गाथाओं को बताने का।
शिवाजी की मां जीजाबाई के योगदान पर कोई बात नहीं करता। जबकि उनके व्यक्तित्व निर्माण में सबसे बड़ा योगदान उनकी मां का रहा। यह सामान्य बात नहीं है कि कोई मां अपने पुत्र को संघर्ष और बलिदान के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे।
उन्होंने अपने पुत्र में साहस, धर्म और स्वराज्य की भावना का बीजारोपण किया। यही वजह थी कि शिवाजी महाराज के जीवन में उनकी माता का स्थान अत्यंत ऊंचा था। करीब 15 साल की उम्र में उन्होंने पहला किला जीता था। मैं शिवाजी की जिंदगी के एक ऐसे अध्याय पर फिल्म बनाने की तैयारी में हूं जो अभी तक किसी ने बनाया नहीं है। वहीं शिवाजी पर फिल्म बनाने को लेकर रितेश देशमुख ने कहा था शिवाजी महाराज पर फिल्म बनाना एक बड़ी जिम्मेदारी है।
रितेश देशमुख और ऋषभ शेट्टी ने रखी अपनी राय
रितेश ने कहा, ' यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सम्मान से जुड़ा विषय है। जबकि अभिनेता ऋषभ शेट्टी का मानना है कि कलाकार की पीरियड, माइथोलाजिकल और बायोपिक करने में दिलचस्पी होती ही है। इन कहानियों में गहराई होती है और कलाकार को अपने अभिनय के विभिन्न आयामों को खोजने का मौका मिलता है। मैं आभारी हूं कि यह पात्र निभाने का मौका मिला।
तान्हा जी : द अनसंग वारियर हो या छावा दोनों बाक्स आफिस पर हिट रही। ऐसे में कई फिल्ममेकर एकमत हैं कि पीरियड फिल्म के साथ बड़ा बजट जरूरी होता है। कारण स्पष्ट है ऐसी फिल्मों में भव्य सेट्स का निर्माण, उस दौर के वातावरण को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने के लिए उन्नत वीएफएक्स का उपयोग और व्यापक पैमाने पर प्रोडक्शन की आवश्यकता होती है। इसके साथ बड़ा स्टार भी जरूरी है वरना बजट नहीं मिलेगा। उसके साथ निर्देशक का स्पष्ट नजरिया भी बहुत अहम होता है।
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