'मुश्किल में सोचता हूं कान्हा होते ...', रोज गीता का पाठ करता है ये एक्टर; सीखी जिंदगी की सबसे बड़ी बात
कृष्णावतारम-पार्ट 1 में कान्हा जी की भूमिका निभाने वाले सिद्धार्थ गुप्ता ने हाल ही में बताया कि इस फिल्म को करने के बाद उनके जीवन में क्या बदलाव आए।

कृष्ण को जिंदगी का हिस्सा मानता है एक्टर/ फोटो-इंस्टाग्राम
HighLights
श्रीकृष्ण का रोल निभाने से जीवन में आया बड़ा बदलाव
श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर कर्म के सिद्धांत में रखते हैं विश्वास
हर मुश्किल में सोचते हैं श्रीकृष्ण होते तो क्या करते
प्रियंका सिंह, मुंबई। कृष्ण मेरे लिए जीवन हैं, प्रेम है, आज भी हर परिस्थिति में सोचता हूं कि श्रीकृष्ण होते तो इसमें क्या करते। जन्माष्टमी के मौके पर यह कहना है अभिनेता सिद्धार्थ गुप्ता का जिन्होंने फिल्म पूर्ण पुरुषोत्तम कृष्णावतारम्: पार्ट 1 द हार्ट (हृदयम्) में ने भगवान श्रीकृष्ण का रोल निभाया है। इस रोल को करने के बाद उनके जीवन में काफी बदलाव आया है।
'मेरा हिस्सा बन चुके हैं श्री कृष्ण'
सिद्धार्थ कहते हैं, "श्रीकृष्ण मेरा हिस्सा बन चुके हैं, वह मुझसे अलग नहीं हैं। वह मुझमें बसे हुए हैं। इस रोल को करते हुए उन तक पहुंचना था, हालांकि मैं जानता हूं कितना भी प्रयास कर लूं, उनके जैसा बनना संभव नहीं था। वह तो भगवान हैं, मनुष्य के अवतार में जीवन जिया, यह जानते हुए भी की नियती में आगे क्या होगा। फिर भी ज्यादा प्रतिक्रिया न देते हुए आंखों से सब महसूस करना था।
सिद्धार्थ ने कहा,"उनके जैसा बनना जरूरी है, केवल अभिनय भी किया जा सकता है, लेकिन फिर वह स्क्रीन पर समझ आ जाता। टीम के साथ बैठकर इस रोल के लिए मैंने तैयारी की थी। मैं तब आध्यात्मिक तौर पर इतना जागरूक नहीं था। एक वरदान की तरह जीवन में यह फिल्म आई थी। जब रोल की तैयारी शुरू की थी, तो श्रीमद्भगवद्गीतापढ़ना शुरू किया था। उस दौर में बहुत कुछ सीखने को मिला है।मैंने रूटीन बनाकर रखा था कि सोने से दो घंटे पहले पढ़ना है, फिर उठने के बाद पढ़ना था। फिर वर्कशाप होती थी।"

'श्रीमद्भगवद्गीता में डूबता गया'
सिद्धार्थ ने कहा, "जितना मैं श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ता गया, उसमें डूबता चला गया। वह एक थेरेपी की तरह है। जीवन जीना सिखाती है। मुझमें कई बदलाव हैं, जिन्हें शब्दों में नहीं बयां कर सकता हूं। वह बदलाव अंदर से हुआ है। मैं भी अब कर्म कर फल की चिंता मत कर, इसमें यकीन रखता हूं। जीवन इसी के अनुसार जीता हूं। मेरा यही मानना है कि अपनी तरफ से अपना सर्वश्रैष्ठ दीजिए और परिणाम के बारे में मत सोचिए।"
अभिनेता बोले, "हमारा अभिनय का पेशा है, इसमें निर्णय किसी पेपर पर निर्भर नहीं करता है कि आपने लिख दिया, तो वह हो जाएगा। कई बार सब सही करने के बाद भी आप हार जाते हैं, लेकिन उसमे हताश नहीं होना है। प्रक्रिया का मजा लीजिए, उसके परिणाम पर निर्भर न रहें।"
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'मेरी मां ठाकुर जी की भक्त हैं'
आगे घर पर जन्माष्टमी मनाने को लेकर सिद्धार्थ कहते हैं कि जन्माष्टमी अहम त्योहार रहा है। मेरी माताजी जी ठाकुर जी की भक्त रही हैं। बचपन से ही मैंने देखा है कि हमारे घर पर जन्माष्टमी मनाई जाती है। जब छोटा था, तब कान्हा की मूर्ति सजाता था, घर पर खास खाना बनता था, फिर दही हांडी फोड़ते थे। इस बार वृंदावन जाना चाहता था, लेकिन काम के कारण नहीं जा पाऊंगा, तो इस बार मुंबई में ही यह त्योहार मना रहा हूं।
