Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    Explainer: किशोर-रफी की सादगी से बादशाह की 'फूहड़ता' तक कैसे पहुंचा संगीत? सुरों के पतन की पूरी कहानी

    Updated: Tue, 10 Mar 2026 07:50 PM (IST)

    भारतीय सिनेमा का बदलता दौर, जहां सबकुछ बदल रहा है कहानियों से लेकर सितारों के रहन-सहन तक। सिनेमा की 'सोल' यानि आत्मा संगीत को माना जाता है लेकिन सोचिए ...और पढ़ें

    बदलते सिनेमा में कितना बदल गया संगीत?

    बदलते सिनेमा में कितना बदल गया संगीत?

    HighLights

    1. फूहड़ लिरिक्स का सहारा ले रहे गीतकार

    2. बादशाह के गाने पर क्यों हुआ विवाद?

    3. क्या खो गया रफी-किशोर का संगीत?

    अंकित सिंह तोमर, नई दिल्ली। संगीत जिसके सुरों से जीवन खिल उठता है... संगीत जिसके सुनने मात्र से दिल खुश हो जाए... संगीत जो हमारे हर भाव को बड़े ही सही ढंग से दर्शाता है। एक दौर था जब संगीत की माला में सुरों के मोती को पिरोकर उसे तैयार किया जाता था। जहां छोटे से रेडियो पर एंटीना सेट करके उन मधुर धुनों का हम आनंद लेते थे। 

    कभी किशोर दा आकर हमारे कानों को सुकून देते थे तो कभी रफी साहब की वो मखमली आवाज मानो दिल के तार ऐसे छेड़ती कि दिल की धड़कनें थम सी जाती थीं और मन का मोर खुले आंगन में नाचने लगता था। कभी लता दीदी की वो रुहानी आवाज महफिल को गुलजार करती तो कभी जगजीत साहब की वो गजलें हर शाम की शम्मा को रोशन कर जाती थीं, पर संगीत के इस बदलते दौर में क्या सिर्फ संगीतकार बदले या फिर हमारा संगीत भी बदला?

    अगर सीधेतौर पर कहें तो हां संगीत और संगीतकार दोनों ही बदले और बदलते दौर में संगीत के सुरों को छेड़ने वाले धुनों को शब्दों के संदूक में कुछ लोगों ने ऐसे दफ्न किया कि सिवाय फूहड़ता के कुछ नजर नहीं आया। आज बात उसी संगीत की जहां अब 'सुरों' में सुकून नहीं 'शोर' सुनाई दे रहा है....

    सुरों की लड़ाई कैसे विवाद ले आई?

    सबसे पहले आपके लिए सुरों के रण में छिड़े इस युद्ध की कहानी का जानना ज्यादा जरूरी है, बाकी का किस्सा हम आपको आगे बताएंगे। सुरों के संग्राम की शुरूआत सिंगर और रैपर मशहूर बादशाह से हुई है। दरअसल बादशाह ने हाल ही में अपना नया गाना रिलीज किया और गाने का नाम था 'टटीरी' (Tateeree Song)।

    खबरें और भी

    यह भी पढ़ें- टटीरी गाने पर बढ़ते विवाद के बीच रैपर Badshah ने मांगी माफी, बोले- मैं हरियाणा का बेटा हूं और...'

    Tatt 2

    ये गाना 1 मार्च 2026 को यूट्यूब पर रिलीज किया गया, बादशाह (Badshah) के साथ हरियाणवी सिंगर सिमरन जगलान भी दिखीं। गाना जब सोशल मीडिया पर आया तो पहले तो लोगों को गाने में हरियाणवी संगीत और डांस को इग्नोर किया, लेकिन धीरे-धीरे गाने को पूरा सुना गया तो लोगों के कान खड़े हो गए।

    गाने को लेकर क्यों हुआ विवाद?

    दरअसल गाने में बादशाह ने हरियाणा की संस्कृति को सभ्यता को ठेस पहुंचाई। गाने के लिरिक्स भी बेहद फूहड़ तरीके से लिखे गए। इसके अलावा गाने में हरियाणा की बसें नजर आईं जहां, स्कूल यूनिफॉर्म पहने लड़कियां बस के ऊपर नाचती हुई दिखाई दीं। इसके अलावा कई हरियाणवी महिलाओं और पुरुषों को भी दिखाया गया।

    tatt

    वहीं गाने में स्कूल की बच्चियों और महिलाओं को लेकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। गाने में बादशाह के इशारे और गंदे लिरिक्स ने रातोंरात विवाद खड़ा कर दिया। इसके बाद महिला आयोग ने शिकायत दर्ज कराई तो वहीं पुलिस द्वारा बादशाह को गिरफ्तार करने का भी आदेश दिया गया। हालांकि आनन-फानन में बादशाह ने तुरंत एक वीडियो बनाया और गाने को लेकर सभी से माफी मांगी और गाना यूट्यूब और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

     
     
     
    View this post on Instagram

    A post shared by BADSHAH (@badboyshah)


    साल 2023 में भी बादशाह ने सनक नाम का गाना बनाया, जिसपर भी विवाद हुआ। गेंदा फूल हो या फिर हम्मा हम्मा हो... ऐसे कई गाने हैं बादशाह के, जिन पर भरपूर विवाद हुआ है। लेकिन इस सबके बीच सवाल ये है कि क्या बार-बार गलती कर देना और फिर माफी मांग लेना, ये काफी है?

    खोता जा रहा है संगीत?

    जिन बादशाह ने अपने संगीत में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, वो शायद ये भूल गए कि संगीत आज भी सिनेमा की रूह का हिस्सा है। बादशाह जैसे सिंगर्स के दौर में संगीत का मतलब बदलकर 'शोर', 'फूहड़ता' और 'घटिया लिरिक्स' तक सिमट गया है। सवाल यह है कि क्या हमने संगीत का स्तर खुद गिरा दिया है, या बाज़ार ने हमें 'कचरा' सुनने पर मजबूर कर दिया है?

     Gemini_Generated_Image_dmnr0tdmnr0tdmnr

    (इमेज सोर्स- AI)

    पुराने दौर में गीतकार (Lyricists) जैसे साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी और गुलजार शब्दों को तराशते थे। एक-एक शब्द का अर्थ होता था।

    जहां कहीं दूर जब दिन ढल जाए... मुकेश (Singer Mukesh) की आवाज वाले इस गाने में सादगी के साथ जीवन की एक अलग गहराई नजर आती है या फिर जब कोई बात बिगड़ जाए तुम देना साथ मेरा... कुमार सानू (kumar sanu) की आवाज में इस गीत से मानो दो आत्माओं का मिलन होता है और आजीवन एक दूसरे के साथ की बात की जाती है, पर शायद अब ये संगीत खोता जा रहा है।

    अलग था किशोर-रफी का दौर

    सिनेमा के जिस दौर में हम आज जी रहे हैं वहां सिर्फ भागदौड़ है, थकान है और है तो सिर्फ हाथों की लकीरों से रेत की तरह तेजी से फिसलता वक्त। लेकिन 60, 70 और 80 के दशक में गानों का मतलब कुछ और था। जहां मोहम्मद रफी की आवाज वाले गाने 'आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे' में भी वो अल्हड़पन नजर आता था।

    kisshoree

    वो बिंदास अंदाज भी दिखता था तो अपने प्यार के लिए दीवानगी भी नजर आती थी। सिर्फ दर्द ही नहीं बल्कि मस्ती के भी सुल्तान थे रफी साहब।

    उधर किशोर कुमार की आवाज वाले 'पल पल दिल के पास' गाने में भी मानो एक सुकून था। लग जा गले.. जब मदन मोहन के संगीत और लता दीदी की आवाज से बने इस मास्टरपीस ने दस्तक दी तो हर दिल ठहर गया। इस गाने में भी मानो एक अलग ही सादगी और शांति थी, जहां प्यार की रोशनी में सुरों का शोर नहीं बल्कि सुकून था।

    rafir

    ऑटो ट्यून की जुगाड़ के बीच मेलोडी की मौत

    जिस दौर के संगीत ने इतिहास रचा, उस दौर के संगीत के स्तर को छू पाना भी मुश्किल है। उस दौर में जहां सिर्फ सादगी दिखती थी, जहां कोई ऑटो ट्यून जैसी जुगाड़ नहीं थी। लता जी और रफी साहब घंटों तक रियाज करते थे ताकि एक सुर भी इधर से उधर न हो। उनके गानों में साज़ों का एक अनुशासन था।

    Gemini_Generated_Image_qu03h0qu03h0qu03

    (इमेस सोर्स- AI)

    आज ऑटोट्यून ने हर किसी को सिंगर बना दिया है। आजकल के कई ऐसे सिंगर्स हैं, जिन्हें सुर की समझ हो न हो, लेकिन तकनीक उनके फटे गले को भी चमका देती है और तो और धुनें ऐसी हैं जो कानों को सुकून देने के बजाय सिरदर्द पैदा करती हैं।

    यही वजह है कि मेलोडी आज मर चुकी है और ऑटोट्यून के जुगाड़ के चलते अक्सर एक नए सिंगर की आवाज हमें सुनाई देने लगती है।

    bad

    दो मिनट भी नहीं टिकता आज का संगीत

    अगर सही मायनों में देखा जाए तो आज का संगीत वाकई में 2 मिनट का ही है। हालांकि ऐसा नहीं है, कि आज के सिनेमा में बनने वाले संगीत में कोई सुर और ताल नहीं है, जरूर है, लेकिन ज्यादातर बनने वाले गानों को आप शायद 4 ही दिन तक याद रख पाएंगे।

    आज का संगीत फास्ट फूड की तरह है। इसे याद रखने के लिए नहीं, सिर्फ सोशल मीडिया और रील्स तक सीमित रखने के लिए ही बनाया जा रहा है। डिपोस्जेबल वाले संगीत के बीच में पुराने संगीत को आज 50 साल बाद भी हम याद रखकर बैठे हैं।

    reels

    हमें लगता है कि फूहड़ शब्दों का इस्तेमाल करके गानों को कूल बनाया जा सकता है, लेकिन सत्य बिल्कुल इसके विपरीत है। गानों मे जब सुर और ताल ही नहीं है और ऊपर से भद्दे लिरिक्स का इस्तेमाल उसमें किया गया, तो असल में ऐसे गाने कानों को सिर्फ करकश ही लगते हैं।

    सुर और शोर के बीच खोए संगीत की ये परिभाषा आज या कल नहीं लिखी गई है, बल्कि इसकी शुरूआत काफी पहले हो गई थी और जिसका साथ हम और आप सालों से देते आ रहे हैं। यही वजह है कि फूहड़ता के नाम पर परोसे जाने वाले संगीत को भी हम अपना लेते हैं, लेकिन जब विवाद होता है तब हमारी आंखें खुलती हैं।

    Gemini_Generated_Image_e2mczve2mczve2mc

    (इमेज सोर्स- AI)

    अगर भारतीय संगीत की गरिमा और उन तरानों को बचाना है तो हमें खुद शोर के बादशाहों को पीछे सुरों के शहंशाहों द्वारा बनाई गई अनमोल विरासत को गले से लगाकर रखना होगा, अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब संगीत सिर्फ किताबों और शब्दों के बीच शोर का पर्यायवाची बनकर सिमट जाएगा।

    यह भी पढ़ें- बादशाह के नए गाने पर इतना विवाद क्यों, क्या होता है 'टटीरी' का मतलब? हरियाणा से है गहरा कनेक्शन