भारत की पहली सिंगर, गाए 6000 गाने, पिता की शर्त पर पहना बुर्का; आशा-लता की प्रेरणा थी वो 'आवाज', दिलचस्प है कहानी
क्या आप एक ऐसी सुपरस्टार की कल्पना कर सकते हैं, जिसकी आवाज पर करोड़ों लोग दीवाने थे, लेकिन किसी ने उसका चेहरा तक नहीं देखा था? लता मंगेशकर भी उनकी मुर ...और पढ़ें

6000 गाने गाकर इतिहास रचने वाली वो सिंगर

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में 40 और 50 का दशक वो दशक था, जब सिनेमा में अच्छी फिल्में बनने का दौर शुरु हो रहा था। ये वही दौर था जब सिनेमा धीरे-धीरे अपने पांव पसार रहा था। नए एक्टर्स आ रहे थे और बदलते सिनेमा में संगीत की परिभाषा भी बदल रही थी। एक दौर था जब महिलाएं गाती थीं, तो इसे समाज में खराब माना जाता था लेकिन फिर इसी बीच एक सिंगर आईं, जिन्होंने सिनेमा की परिभाषा तो बदल ही डाली, साथ ही महिलाओं के लिए प्रेरणा भी बनीं।
पिता को दिए एक वादे की खातिर उन्होंने सालों तक अपनी तस्वीर नहीं खिंचवाई, तो उनकी आवाज पर पूरी दुनिया नाचती थी, लेकिन उनका चेहरा एक रहस्य था। 'मेरे पिया गए रंगून' से लेकर 'कजरा मोहब्बत वाला' जैसे आइकोनिक गाने वाले और खूब शोहरत पाने वाली इस महान गायिका को जब आशा और लता जैसी गायिकाएं देखतीं, तो उन्हें प्रेरणा मानती थीं। आज कहानी उसी गोल्डन ऐरा की आवाज की, जिसने सिनेमा को दिए अनगिनत यादगार तराने...
पंजाब में हुआ था शमशाद बेगम का जन्म
14 अप्रैल 1919 को शमशाद बेगम (Shamshad Begum) का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था। हालांकि कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, लाहौर (ब्रिटिश इंडिया) में हुआ था। उस दौर में सिनेमा की पहुंच लाहौर से लेकर कलकत्ता तक हुआ करती थी। शमशाद बेगम का बचपन तंगहाली में बीता। पिता की आर्थिक स्थित ज्यादा अच्छी नहीं थी।
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(Photo- AI)
शमशाद बेगम का शुरू से ही संगीत की ओर झुकाव रहा। जब वह 10 साल की थीं, तभी से गाने गाया करती थीं। हालांकि पिता को शमशाद का गाना ज्यादा पसंद नहीं था। वह नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी गाना-बजाना करे। हालांकि आसपास रहने वाले लोग शमशाद की आवाज से परिचित थे और उनकी आवाज को काफी पसंद करते थे। इस बीच शमशाद बेगम के चाचा ने उनकी मदद की।
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ऐसे मिला शमशाद बेगम को पहना गाना
शमशाद बेगम के करियर में उनके चाचा ने काफी मदद की। दरअसल साल 1931 में शमशाद बेगम के चाचा ने उन्हें संगीत के दरवाजे का रास्ता दिखाया। उनके चाचा उन्हें गुपचुप तरीके से ऑडिशन के लिए ले गए। इसके बाद ऑडिशन में शमशाद बेगम पास हुईं और उन्हें 'जेनोफोन' म्यूजिक कंपनी ने चुन लिया।

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इस ऑडिशन में मशहूर सिगंर गुलाम हैदर मौजूद थे, जो खुद कंपनी के म्यूजिक डायरेक्टर थे। उन्होंने शमशाद बेगम को 15 गानों का कॉन्ट्रैक्ट दिया। साथ ही में ये भी तय किया गया कि उन्हें हर गाने के लिए 12 रुपये दिए जाएंगे। इसके बाद शमशाद बेगम ने कई गाने गाए। कहा जाता है कि उस दौर में शमशाद को कुछ गानों के लिए क्रेडिट नहीं मिला था।
उनके नाम बदलकर बताया जाता था और इसके पीछे की वजह थी कि उस दौर में लोग अपने धर्म के लोगों के गाने ज्यादा सुनना पसंद करते थे। शमशाद ने जेनोफोन कंपनी के कॉन्ट्रैक्ट के बाद धीरे-धीरे रेडियो के लिए गाना शुरु किया। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो से शुरुआत की। उनकी आवाज सुनकर मास्टर गुलाम हैदर इतने प्रभावित हुए कि उन्हें फिल्मों में ले आए।
13 साल की उम्र में हुआ था प्यार
शमशाद बेगम जब 13 साल की थीं तब उन्हें उनके पड़ोस में रहने वाले एक हिंदू वकील से प्यार हो गया था। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं। लेकिन गणपत लाल हिंदू थे ऐसे में मुश्किल तो आनी ही थी। शमशाद ने जब घरवालों को अपने प्यार की जानकारी दी तो घर वाले बौखला गए। परिजनों ने हिंदू युवक से विवाह की मंजूरी नहीं दी।
वकील गणपत लाल से प्यार करने के बाद काफी विवाद हुआ। प्यार में बगावत करके आखिरकार 15 साल की उम्र में शमशाद बेगम ने गणपत लाल से साल 1935 शादी कर ली।

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महबूब खान मुंबई लाए, गुलाम हैदर ने फिल्मों में ऑफर दिया
शादी के बाद शमशाद बेगम रेडियो पर गाने गाती रहीं। आखिरकार फिर वो दौर आया जब शमशाद को सिनेमा में आने का मौका मिला। साल 1941 में महबूब खान को शमशाद बेगम की आवाज इतनी पसंद आई कि वो उन्हें बॉम्बे ले आए। उन्होंने शमशाद को बंगला, गाड़ी और चीजों का ऑफर दिया।
हालांकि पिता इसके लिए राजी नहीं थे, पर उनके पति की इसमें रजामंदी थी। आखिरकार महबूब खान के लाख मनाने पर शमशाद मुंबई आ गईं। इसके बाद गुलाम हैदर ने शमशाद को फिल्मों में गाने का मौका दिया। साल 1941 में आई फिल्म खजानची में शमशाद ने अपनी आवाज दी। हालांकि उस वक्त शमशाद की फीस कम थी, लेकिन उनकी आवाज से फिल्ममेकर इतने कायल थे कि उन्हें दो हजार देने को तैयार थे।
ब्लॉकबस्टर गाने देकर बनीं स्टार
40 के दशक में शमशाद बेगम स्टार बन रही थीं। उस वक्त वह इकलौती ऐसी सिंगर थीं, जिसकी इतनी ज्यादा चर्चा थी। हालांकि हर कोई सिर्फ उन्हें सुनता ही था, किसी ने उन्हें देखा नहीं था। 40 और 50 के दशक में फिल्मी संगीतों पर उनका ही नाम लिखा रहता था। इन्हीं में से पतंगा फिल्म का गाना मेरे पिया गए रंगून खूब पसंद किया गया।
इस गाने ने युवाओं के दिलों में घर कर लिया। इसके बाद उनका गाना कजरा मोहब्बत वाला, लेके पहला पहला प्यार, कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना जैसे गानों को शमशाद ने अपनी आजवा देकर अमर बना दिया। यह गाने बेहद लोकप्रिय साबित हुए। संगीतकार ओ.पी. नैय्यर की वह पहली पसंद थीं। फिल्म 'आर-पार' (1954) के गाने "कभी आर कभी पार" और "बाबूजी धीरे चलना" ने उन्हें युवाओं का चहेता बना दिया।

पति की मौत के बाद छोड़ दी सिंगिंग
शमशाद बेगम ने 40 और 50 के दशक में कई ब्लॉकबस्टर गाने गा दिए। इसके बाद साल 1955 में उनकी जिंदगी में तूफान आया। दरअसल 1955 में शमशाद बेगम के पति गणपत लाल का एक सड़क हादसे में निधन हो गया। पति की मौत के बाद शमशाद बुरी तरह से टूट गईं और उन्होंने सिंगिंग से पूरी तरह से दूरी बना ली।
हालांकि इस बीच कई लोग उनके पास आए और कहा कि वो गाना जारी रखें, लेकिन वह उस स्थित में थीं ही नहीं कि गानों को हां कर सकें। ये वही दौर था जब लता मंगेशकर सिनेमा में आ रही थीं और नई-नई लता को फिर गानों के ऑफर मिलने लगे।
शमशाद बेगम को प्रेरणा मानती थीं लता मंगेशकर
जब शमशाद बेगम गायिकी से दूर हुईं तो इसका फायदा लता मंगेशकर को हुआ। लता मंगेशकर की आवाज धीरे-धीरे लोगों के कानों तक पहुंचने लगी। शमशाद बेगम की बजाय अब लोग लता मंगेशकर को गानों के ऑफर देने लगे। कहा जाता है कि लोग लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) से कहा करते थे कि वो शमशाद बेगम की तरह गाना गाएं।
हालांकि वो दो से तीन साल तक गायिकी दूर रहें। इसी फिल्म मदर इंडिया में बड़ी मुश्किल से वह गाने को राजी हुईं और उन्होंने कमबैक किया। फिल्म में उन्होंने 'पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली' यह गाना गाया। कहा जाता है कि जब वो यह गाना गा रही थीं तो स्टूडियो में मौजूद सबकी आंखें नम थीं।
इसके बाद उन्होंने फिल्म मुगल-ए-आजम की ऐतिहासिक कव्वाली "तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे" में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ सुर मिलाए, जो आज भी कव्वाली के शौकीनों की पहली पसंद है।
रिटायरमेंट लेकर बनाई सिनेमा से दूरी
साल 1965 तक आते-आते वह कई फिल्मों गाने गा चुकी थीं, लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि शायद उनका दौर अब नहीं रहा है। अब लता और आशा भोसले जैसी सिंगर्स सिनेमा में आ गई हैं। इसके बाद उन्होंने हमेशा के लिए फिल्म इंड्स्ट्री को छोड़ दिया। हालांकि उन्होंने साल 1968 में फिल्म 'किस्मत' के गाने "कजरा मोहब्बत वाला" से एक बार फिर साबित कर दिया कि उनकी आवाज में वही पुराना जादू है।
यह गाना आज भी रीमिक्स की दुनिया में सबसे ऊपर रहता है। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे नई फिल्मों के लिए गाना कम कर दिया। उन्होंने अपनी मर्ज़ी से रिटायरमेंट ली और खुद को परिवार और इबादत के लिए समर्पित कर दिया। रिटासरमेंट के बाद उन्होंने बेटी ऊषा को भी कभी गाने की इजाजत नहीं दी। फिर वह बेटी और दामाद के साथ रहने लगीं।
हैरानी की बात यह है कि शमशाद बेगम ने सालों तक अपने पिता की उस शर्त का मान रखा और कभी कैमरे के सामने नहीं आईं और हमेशा बुर्का पहनकर रखा। लेकिन शादी के बाद धीरे-धीरे वो उम्र के पड़ाव पार करने लगीं। जब उनकी तस्वीरें सामने आईं, तबतक वह काफी बूढ़ी हो चुकी थीं।
शमशाद ने अपने संगीत करियर में करीब 6000 हजार गाने गाए। साल 2009 में उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया। इसके अलावा साल 2012 में उन्हें संगीत जगत का प्रतिष्ठित 'ओ.पी. नैय्यर पुरस्कार' भी दिया गया। कई बार उनके निधन की गलत खबरें तक आईं। हालांकि 23 अप्रैल 2013 को 94 वर्ष में उनका निधन हो गया।
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(नोट- खबर में इस्तेमाल की गई जानकारी स्क्रीन को दिए गए इंटरव्यू, शमशाद बेगम की बायोग्राफी और रिसर्च के आधार पर ली गई है।)