200 फिल्में, अनगिनत किरदार और एक स्टार; सिनेमा का वो 'रावण' जिसकी आवाज से थर्राते थे दर्शक
40 के दशक में कई स्टार्स ऐसे थे, जिनकी रौबदार आवाज ही उनकी असली पहचान थी। हालांकि निजी जीवन में ...और पढ़ें

सिनेमा के पहले 'रावण' की कहानी

समय कम है?
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एंटरेटमनेंट डेस्क, नई दिल्ली। बड़ा पर्दा और उस पर आने का ख्वाब कई लोगों के दिल में रहता है। सिनेमा में अबतक कई स्टार्स आए जिन्होंने अपने इस ख्वाब को पूरा भी किया। हमने अबतक कई कहानियां देखी और सुनी हैं। हिंदी सिनेमा के एक ऐसे स्टार के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं, जिसे असल में रामायण का रावण कहा गया। महज 15 फिल्मों में काम करने वाला वो एक्टर भारतीय सिनेमा का पहला 'रावण' था, जिसने उसे हर तरफ पहचान दिलाई। आज कहानी उसी स्टार की...
कौन थे बी.एम व्यास?
जिन एक्टर के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं, उनका नाम बी.एम व्यास यानि बृजमोहन व्यास। वही बृजमोहन व्यास जो अपनी रौबदार आवाज से हर किसी को एक पल के लिए डरा देते थे। बृजमोहन व्यास का जन्म 22 अक्टूबर 1920 को राजस्थान के चूरू जिले में हुआ था।

ब्राह्मण परिवार में जन्मे बृजमोहन व्यास बेहद सरल और शांत स्वभाव किस्म के व्यक्ति थे। उन्हें शुरू से ही कला से बेहद लगाव था। कहा जाता है कि शुरूआत से ही उन्हें बनना तो सिंगर था लेकिन बन वो एक्टर गए और सिनेमा में फिर उन्होंने रावण का किरदार निभाकर ऐसी छाप छोड़ी कि हर कोई देखता रह गया।
ऐसे स्टार बने बी.एम. व्यास
फिल्मों में आने से पहले उन्होंने संगीत की और अच्छे से शिक्षा ली। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने कई गाने भी गाए। 1940 के दशक में व्यास जी एक सिंगर के तौर पर पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थिएटर से जुड़ गए औऱ यहां उन्होंने पहले नाटक 'शकुंतला' में भाग लिया। जब वो इस नाटक में काम कर रहे थे, तो उनकी संस्कृत देख हर कोई चकित रह गया।
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बाद में उनकी इसी संस्कृत के चलते उन्होंने फिल्मों के ऑफर्स मिलने लगे। इसके बाद करीब दस सालों तक वो पृथ्वी थिएटर का हिस्सा बने रहे और देशभर के दौरों पर गए। इस दौरान एक अभिनेता और संगीतकार, दोनों के रूप में उनकी खूब सराहना हुई।
कई फिल्मों में भी किया काम
थिएटर और नाटकों में काम करने के बाद उनकी पहचान बन चुकी थी। उनकी संस्कृत और हिंदी भाषा पर पकड़ अच्छी थी, तो वहीं उनकी रौबदार आवाज का भी अलग ही जादू था। इसी के चलते उन्होंने कुछ फिल्मों में भी काम किया और 1944 की फिल्म 'भर्तृहरि' से पहली बार प्लेबैक सिंगर के रूप में उन्होंने अपनी आवाज रिकॉर्ड की। 'पहले आप' (1944) और 'महाराणा प्रताप' (1946) जैसी कुछ और फिल्मों के लिए भी उन्होंने गाने रिकॉर्ड किए।

आखिरकार वो वक्त आया, जब उन्हें एक अभिनेता के तौर पर पर्दे पर काम करने का मौका मिला। चेतन आनंद की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी 'इंडिया पिक्चर्स' से बतौर प्रोडक्शन मैनेजर जुड़ गए। इसी कंपनी की साल 1946 में आई पहली फिल्म 'नीचा नगर' से बी.एम व्यास ने छोटा सा किरदार निभाकर एक्टिंग वाला सपना भी पूरा कर लिया। इसके कुछ सालों बाद वो 'आग' (1948) और 'बरसात' (1949) जैसी फिल्मों में नजर आए।
रावण ने किरदार ने दिलाई पहचान
बी.एम व्यास ने अपने करियर में यूं तो कई फिल्मों में काम किया, लेकिन असली पहचान उन्हें संपूर्ण रामायण से मिली। बाबूभाई मिस्त्री की फिल्म 'संपूर्ण रामायण' साल 1961 में आई थी। इस फिल्म में बी.एम व्यास ने 'रावण' का किरदार निभाया। ये किरदार इतना ब्लॉकबस्टर हुआ कि हर किसी ने उनकी खूब तारीफ की।

पौराणिक फिल्म में उनके इस काम के चलते ही उन्हें कई ऐसी पौराणिक कथाओं पर बनने वाले प्रोजेक्ट्स के ऑफर मिले। उन्होंने अपने करियर में लगभग 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी कुछ यादगार फिल्में कुछ इस प्रकार रहीं:
- बरसात (1949)
- आवारा (1951)
- मुगल-ए-आजम (1960)
- महल (1969)
- सरस्वतीचंद्र (1968)
70 का दशक आते-आते सिनेमा में नए कलाकार आने शुरू हो गए। धीरे-धीरे बी.एम व्यास सिमटने लगे। उन्होंने पर्दे पर अच्छे किरदार निभाए तो इसके साथ ही उन्होंने फिल्मों में निगेटिव किरदार भी निभाए, जिसके चलते उन्हें और सफलता भी मिली, लेकिन वक्त के साथ उनकी कला सिमटकर रह गई। 90 के दशक आते-आते उन्होंने एक्टिंग से दूरी बना ली।
उनके आखिरी कुछ प्रोजेक्ट्स में 'मां' (1993) और 'ओ डार्लिंग ये है इंडिया' (1995) जैसी फिल्में शामिल रहीं। 11 मार्च 2013 को 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया और अपने पीछे वह वो यादें छोड़ गए, जिसे सदियों तक हर कोई याद रखेगा।
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