स्टेशन पर काटी रातें, मैकेनिक बन किया काम; 4000 गाने लिखने वाला वो 'सिपाही' जो पाकिस्तान से आया!
हिंदी सिनेमा में अच्छे गीतकार कई रहे हैं लेकिन जो मुकाम आनंद बक्शी ने हासिल किया वो अलग था। सिनेमा में उनके संघर्ष से सफलता की कहानी बेहद दिलचस्प रही ...और पढ़ें

सिनेमा के 'आनंद' की अनसुनी दास्तां

समय कम है?
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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। जो लिख दे तो हर तराना सुकून का अफसाना बन जाता... जो अपनी कलम से हर जज्बात को बयां कर दे तो भावनाओं का सैलाब आ जाता... हिंदी सिनेमा में एक ऐसा ही जादूगर आया जिसके शब्दों की जादूगरी सालों साल लोगों के दिलों में बसी रही, यहां तक कि आज भी लोगों के दिलों में वही जज्बात भरे हुए हैं।
हम बात कर रहे हैं उस शख्स की जिसने हिंदी सिनेमा में कई नगमें दिए और उन नगमों को लिखने का श्रेय उसी को जाता है। आज बात आनंद बक्शी की, जिन्होंने कई यादगार गाने लिखे हैं...
सिनेमा से पहले सेना में थे आनंद बक्शी
हिंदी सिनेमा के जिस सितारे की आज हम चर्चा कर रहे हैं उनका नाम है आनंद बक्शी (Anand Bakshi)। वही आनंद बक्शी, जिन्होंने ना जाने कितने अनगिनत गानों को अपनी कलम से लिखा और उन तरानों को अमर कर दिया। आनंद बक्शी एक ऐसे गीतकार रहे जिन्होंने करीब 4 हजार से ज्यादा गाने लिखे और हर तरफ छाए।
आनंद बक्शी का जन्म पाकिस्तान के रावल पिंडी में 21 जुलाई 1930 को हुआ था। अपने जीवन के 17 साल उन्होंने पाकिस्तान के रावलपिंडी में ही बिताए थे। हालांकि 1947 के दंगों के दौरान उनका परिवार सब कुछ छोड़कर दिल्ली आ गया। उन्हें बचपन से ही गायक बनने का शौक था, लेकिन किस्मत उन्हें सेना में ले गई।

भारत आने के बाद उन्होंने सेना ज्वॉइन कर ली। सेना में जाने के बाद वो अपनी कविताएं अपनी बैरक में रहने वाले साथी फौजियों को सुनाया करते थे। उनकी ये शानदार कला देखने के बाद लोग उनकी खूब तारीफ करते थे। धीरे-धीरे वो और बड़े प्लेटफॉर्म पर गाने लगे।
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मुंबई से वापस फौज में चले गए आनंद
सिनेमा में आने से पहले आनंद बक्शी ने राज कपूर (Raj Kapoor) और नरगिस (Nargis) की फिल्म बरसात करीब 20 बार देखी और यहीं से उनके दिल में सिनेमा में आने की चाहत जाग गई। यहीं से उन्होंने गीत लिखने शुरू कर दिए। साल 1950 में उन्होंने एक घोषणा पत्र लिखा और इस पत्र में उन्होंने बताया कि मैं गाने लिखने का ऐलान करता हूं।
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नौकरी छोड़कर वो मुंबई चले आए। हालांकि मुंबई आकर उनकी मुश्किलें हल नहीं हुई। कहा जाता है कि वो स्टेशन पर रुका करते थे। उन्होंने कई प्रोड्क्शन हाउस के चक्कर काटे। जो बचे कुचे पैसे थे वो भी खत्म हो गए थे। इसके बाद वो दिल्ली आए और आकाशवाणी में ऑडिशन दिया, लेकिन इसमें वो फेल हो गए।
उन्हें यकीन नहीं हुआ कि वो फेल भी हो सकते हैं। उन्हें समझ आ गया कि उन्हें फौज की नौकरी में वापस चले जाना चाहिए। उस दौर में फौज में वापस जाने का विकल्प होता था। वो जबलपुर आ गए और फौज की नौकरी री-ज्वाइन कर ली। इसके बाद 1953 में उनका प्रमोशन हुआ। फिर उन्होंने 1956 में मुंबई दोबारा वापस आए।
दूसरी पारी में मिली बॉलीवुड में एंट्री
साल 1956 में वो दोबारा मुंबई आए और इस बार वो ठानकर आए कि वो सिनेमा में काम पाकर ही रहेंगे। उन्होंने स्टेशन के वेटिंग रूम में रातें काटीं, मैकेनिक बनकर भी काम किया। आखिरकार मिस्टर भगवान ने उन्हें ब्रेक दिया और 15 दिन में आनंद बक्शी ने उनके लिए 4 गाने लिखे, जिसके लिए उन्हें 150 रुपए मिले।उनका पहला गाना 'धरती के लाल, ना कर कमाल' आया। इसके बाद उन्हें फिर कुछ काम नहीं मिला।
वो वापस रेडियो की दुनिया में आए। इसके बाद उनके गाने रेडियो पर आए तो धीरे-धीरे फिर उन्हें सिनेमा में पहचान मिलने लगी। आनंद बक्शी की खासियत थी कि वो 8 मिनट में गाना लिख देते थे।
जब 'बख्शी' नाम ब्रैंड बन गया
हालांकि आनंद बक्शी को असल सफलता का स्वाद चखने के लिए करीब 7 साल का इंतजार करना पड़ा। साल 1965 में फिल्म 'जब जब फूल खिले' में परदेसियों से ना अखियां मिलाना गाना आया और फिर 'हिमालय की गोद में' ने उन्हें रातों-रात स्टार गीतकार बना दिया। इसके बाद तो मानो उनकी पूछ खूब होने लगी।
इसके बाद आनंद बख्शी, संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और सुपरस्टार राजेश खन्ना की ऐसी तिकड़ी बनी जिसने बॉलीवुड पर 15 साल राज किया।
'आराधना', 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम' और 'दो रास्ते' जैसी फिल्मों ने उन्हें सफलता के शिखर पर बैठा दिया। यहां तक कि उनकी आर.डी. बर्मन के साथ जुगलबंदी भी खूब हिट रही। 'दम मारो दम' का गाना हरे रामा हरे कृष्णा और 'शोले' के गानों ने साबित किया कि आनंद बक्शी को हिट गानों की परख अच्छे से है और युवाओं की नब्ज पकड़नी उन्हें आती है।
'चोली' वाला गाना और विवादों का फसाना
आनंद बक्शी ने ना जाने कितने हिट गाने पहले ही सिनेमा को दे दिए थे। 80 और 90 के दशक में तो मानो हिट गानों की गारंटी बक्शी बन चुके थे। इसी बीच साल 1993 में आई फिल्म खलनायक। इस फिल्म के गाने 'चोली के पीछे क्या है' को खुद आनंद बक्शी ने ही लिखा था। इस गाने को लेकर भारी विवाद हुआ था।

इसे 'अश्लील' कहा गया और मामला संसद तक पहुंचा। आनंद बक्शी इस बात से काफी दुखी थे, क्योंकि उनका मानना था कि यह एक लोकगीत पर आधारित है और इसे गलत संदर्भ में लिया गया। ये गाना बैन तक कर दिया गया था। हालांकि आज ये गाना कल्ट गानों में से एक है और हर पार्टी में बजता है।
उम्र के अंतिम पड़ाव तक लिखते रहे गाने
आनंद बक्शी ने उम्र के अंतिम पड़ाव तक गाने लिखे। उन्हें पता था कि नौजवानों को क्या पसंद है। यही वजह है कि 90 का दौर आते-आते उन्होंने नई फिल्मों के लिए गाने लिखे। उन्होंने 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे', 'ताल', 'दिल तो पागल है' और 'मोहब्बतें' जैसी फिल्मों के लिए ऐसे गाने लिखे जो आज की पीढ़ी के भी फेवरेट हैं। वह इकलौते ऐसे गीतकार थे जिन्हें 40 बार फिल्मफेयर के लिए नोमिनेट किया गया।
आनंद बक्शी अपने करियर में सदबहार गानों की लंबी लिस्ट देकर गए। उन्होंने वो गाने गाए जो आज भी हर किसी की जुबान पर हैं।
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