3 साल की लड़ाई, 127 कट्स; कौन थे जसवंत सिंह खालरा जिस पर बनी है दिलजीत दोसांझ की फिल्म, क्या है इसकी कंट्रोवर्सी?
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज', जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है, तीन साल की लड़ाई ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। लगभग तीन साल तक सर्टिफिकेशन के लिए चली लड़ाई के बाद, दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' (Satluj) आखिरकार ओटीटी पर रिलीज हो गई। फिल्म 3 जुलाई से Zee5 पर स्ट्रीम हो रही है।
सीबीएफसी नहीं दे रहा था सर्टिफिकेट
इस फिल्म का पहले नाम 'पंजाब '95' था बाद में इसे कंट्रोवर्सी की वजह से बदल दिया गया। इसे हनी त्रेहान ने डायरेक्ट किया है। यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा (Jaswant Singh Khalra) की जिंदगी पर आधारित है।
फिल्ममेकर के अनुसार, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने इसमें 127 कट लगाने को कहा था, जिसके बाद यह प्रोजेक्ट अधर में लटक गया था। अब यह बिना किसी कट और नए टाइटल के साथ स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर आ गई है।
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कौन-कौन से स्टार्स आए नजर?
दिलजीत दोसांझ के साथ-साथ, इस फिल्म में कंवलजीत सिंह, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहलयान भी अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म के ओटीटी पर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर इसको लेकर चर्चा शुरू हो गई।
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दिलजीत ने फिल्म में जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है। आइए जानते हैं कौन थे ये एक्टिविस्ट और क्या हुआ था इनके साथ?
जसवंत सिंह खालरा पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। वे राज्य में उग्रवाद के दौर में कथित तौर पर गैर-कानूनी हत्याओं और गुप्त रूप से अंतिम संस्कार किए जाने के मामलों का खुलासा करने के लिए जाने जाते थे।
सिख-दंगों की घटनाओं ने किया प्रभावित
अमृतसर जिले के खालरा गांव में 1952 में जन्मे जसवंत सिंह खालरा ने मानवाधिकारों से जुड़े कामों में सक्रिय रूप से शामिल होने से पहले 1980 के दशक में बैंक कर्मचारी के तौर पर काम किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख-विरोधी दंगों जैसी घटनाओं ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उस दौरान, कई सिख परिवारों ने बताया कि उग्रवाद से जुड़े होने के शक में पंजाब पुलिस ने कई लोगों को उठा लिया जिसमें उनके कई रिश्तेदार लापता हो गए थे।
जैसे-जैसे उनके आस-पास और लोग लापता होने लगे, जसवंत सिंह खालरा ने जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया। उनकी खोज उन्हें अमृतसर में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड तक ले गई, जहां उन्हें कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज मिले जिनमें हजारों लोगों के नाम, उम्र और पते दर्ज थे। इन लोगों को कथित तौर पर पुलिस ने मार डाला था और उनके परिवारों को बताए बिना ही उनका गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया था।
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उनकी खोज ने इस मुद्दे की ओर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया और उन्हें पंजाब से मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले सबसे जाने-माने लोगों में से एक बना दिया।
कालरा का हुआ था किडनैप?
साल 1995 में जसवंत सिंह खालरा खुद लापता हो गए। खालिस फ़ाउंडेशन के अनुसार, गायब होने से पहले उन्हें आखिरी बार अपने घर के बाहर अपनी कार धोते हुए देखा गया था। जसवंत सिंह खालरा को पुलिस ने उठा लिया था। एक चश्मदीद ने बताया था कि पंजाब पुलिस के दो DSP, तीन इंस्पेक्टर अपने साथ तीन-चार लोगों को लेकर पहुंचे और जसवंत सिंह को उठाकर ले गए। राजीव ने बताया था कि उस वाकये के करीब डेढ़ महीने बाद पुलिस ने जसवंत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी और लाश हरिके नहर म फेंक दी थी। यानी उनका भी एनकाउंटर कर दिया गया था।
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