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    Border 2 Review: फौजियों का दर्द, करेंगी आंखें नम; 1971 में पाकिस्तान की चाल को भारत ने किया था नाकाम

    By Priyanka SinghEdited By: Tanya Arora
    Updated: Fri, 23 Jan 2026 04:27 PM (IST)

    Border 2 Review: अनुराग सिंह के डायरेक्शन में बनी 'बॉर्डर 2' साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की कहानी कहती है। जिसमें भारतीय सेना के तीनों अंगों की ब ...और पढ़ें

    बॉर्डर 2 रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    बॉर्डर 2 रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    HighLights

    1. 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध पर बेस्ड है बॉर्डर 2 की कहानी 

    2. सैनिकों के पारिवारिक दर्द और बलिदान को गहराई से दर्शाया

    3. सनी देओल की बॉर्डर 2 का हर एक सीन देख नम हो जाएंगी आंखें

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    प्रियंका सिंह, मुंबई। जंग हथियारों से नहीं, जुर्रत से जीती जाती है। है वो जुर्रत... है वो जुर्रत... है वो जुर्रत... जब सनी देओल का पात्र पर्दे पर अपने फौजियों के सामने यह युद्धघोष करते हैं, तो साल 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध का अहसास हो जाता है। फिल्मकार जेपी दत्ता की बॉर्डर (1997) फिल्म भारतीय सेना की उस नामुमकिन जंग को बहादुरी से लड़कर जीतने की कहानी है, जो पाकिस्तानियों की बड़ी फौज के सामने कठिन थी, लेकिन नामुमकिन नहीं। अनुराग सिंह की फिल्म बॉर्डर 2 भी उसी युद्ध के दौरान थलसेना, नौसेना और वायुसेना के तीनों मोर्चों से लड़ी गई दूसरी लड़ाइयों पर बनी है।

    कैसे शुरू होती है बॉर्डर 2 की कहानी?

    बॉर्डर 2 की कहानी भारत-पाकिस्तान युद्ध के आगाज से शुरू होती है, जब तीन दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी वायुसेना ने अपने ऑपरेशन चंगेज खान के तहत भारतीय वायुसेना के बेस पर बमबारी की थी। जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आधिकारिक तौर पर योद्ध की घोषणा की। इस युद्ध की शुरुआत पाकिस्तानियों ने पश्चिमी मोर्चे से इसलिए की थी, क्योंकि पाकिस्तानी आर्मी द्वारा किए जाने वाले कत्लेआम से बचने के लिए पूर्वी पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी भारत आने लगे थे। जब कोई समाधान नहीं निकला, तो उस दौरान भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की जनता को इस काबिल बनाना चाहा, जहां वह अपनी सुरक्षा खुद पाकिस्तानी आर्मी से कर सकें।

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    भारत का ध्यान पूर्वी पाकिस्तान पर देखकर, उसने पश्चिम की ओर से भारत पर हमलाकर दिया था और राजस्थान, पंजाब और जम्मू कश्मीर में घुसपैठ की रणनीति बनाई। तीन दिसंबर को शुरू हुई इस जंग में पश्चिमी मोर्च पर कई लड़ाइयां लड़ी गई, इनमें अहम थी अरब महासागर की लड़ाई, श्रीनगर की हवाई जंग, पठानकोट जम्मू सेक्टर में शकड़गड़ बल्ज क्षेत्र में लड़ी गई बैटल ऑफ बसंतर और जम्मू सेक्टर में हुई मुनव्वर तवी का युद्ध, जो निर्णायक लड़ाइयां रहीं। फिल्म इन्हीं लड़ाइयों से गुजरते हुए अंत तक पहुंचती है।

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    राष्ट्रीय प्रेम को पर्दे तक लाने में सफल रहे निर्देशक

    केसरी फिल्म का निर्देशन कर चुके अनुराग सिंह राष्ट्रप्रेम के जुनून को पर्दे तक ले आने में सफल हुए हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर, गीत-संगीत, सुमित अरोड़ा और अनुराग के लिखे डायलॉग्स दमदार है। जेपी दत्ता की बेटी व निर्माता निधि दत्ता की लिखी कहानी में रिसर्च है, लेकिन जेपी दत्ता वाला टच नहीं। फिल्म का मध्यांतर से पहले का हिस्सा दमदार है। युद्ध पर बनी फिल्में अक्सर युद्ध के मैदान तक ही सिमटी रह जाती है, लेकिन इसमें फौजियों की पारिवारिक कहानी को गहराई से दिखाकर निधि और अनुराग ने युद्ध में शहीद होने वाले फौजियों के दर्द को और गहराई से महसूस करवाया, जिसमें दिमाग सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अब फलां फौजी के शहीद होने पर उसके परिवार की जिंदगी आगे कैसे बढ़ेगी। नेशनल अकेडमी में हुई वरुण, दिलजीत और अहान के पात्रों के बीच दोस्ती, भाईचारा मजेदार है।

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    कुछ जगहों पर खलेगी ये कमी

    फिल्म की कमजोर कड़ी है मध्यातंर के बाद का युद्ध सीन, जिसमें पहली फिल्म के मुकाबले रणनीति की कमी दिखी, इससे बेहतर विजुअल इफेक्ट्स बॉर्डर में थे, जब तकनीक इतनी बेहतर नहीं थी। बॉर्डर में बावर्ची से लेकर मथुरा दास और रतन सिंह समेत हर पात्र को जगह मिली थी, लेकिन इसमें फिल्म स्टार पावर तक सिमट जाती है।

    बॉर्डर 2

    फिल्म के आइकानिक गानों का प्रयोग खूबसूरत है। तो चलूं... गाने को किसी एक पर केंद्रित न करके सभी कलाकारों पर फिल्माया गया है। संदेसे आते हैं... गाने से पहले फौजियों के चिट्ठी पढ़ने वाले दृश्य में एक बेटे का अपनी मां की चिता को आग न दे पाने का दुख, किसी के पिता बनने की खुशी और घर की वो छोटी-छोटी बातें जो बॉर्डर पर बैठे अपनों से वह नहीं कह पाते, महसूस होता है।

    कैसा है कलाकारों का फिल्म में अभिनय?

    अभिनय की बात करें, तो धर्मेंद्र जी के बेटे (सनी का नाम ऐसे स्क्रीन पर लिखकर आता है। धर्मेंद्र के निधन के बाद सनी की पहली फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई है) सनी देओल अभिनय नहीं करते हैं, वो 68 की उम्र में भी दहाड़ते हैं। जब वो कहते हैं कि आवाज लाहौर तक जानी चाहिए, तो वाकई वो महसूस होता है। वरुण धवन उन सब ट्रोलर्स का मुंह अपने अभिनय से बंद कर दिया, जिन्होंने कभी उनकी हंसी, तो कभी उनके चेहरे के भावों के लिए उन्हें ट्रोल किया था।

    जैसे फिल्म में पाकिस्तानी आर्मी का जवान उन्हें सैलूट करता है, उनके अभिनय को भी सलाम बनता है। अहान शेट्टी पर दबाव था कि वह अपने पिता की विरासत (सुनील शेट्टी ने पहली बार्डर में काम किया था) को आगे लेकर जा पाएंगे या नहीं, वह उसमें सफल होते हैं। दिलजीत दोसांझ अपने अभिनय और गाने में अपनी आवाज से दिल जीत लेते हैं।

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    परमवीर सिंह चीमा छोटी सी भूमिका में अपनी छाप छोड़ते हैं। फौजियों की पत्नियों के रोल में मोना सिंह, सोनम बाजवा, आन्या सिंह, मेधा राणा उस दर्द को महसूस कराती हैं, जब उनके पति जंग पर जाते हैं। मोना फिल्म में मां की भूमिका में भी हैं, जिसका जवान बेटा साल 1965 की जंग में शहीद हो जाता है। बेटे का सेहरा जब वह शहीद बेटे के सिर पर सजाती हैं, वह दृश्य दिल कचोटता है।कुल मिलाकर यह फिल्म बार्डर जैसी भले ही न हो, लेकिन भारतीय सशस्त्र सेनाओं की वीरता को बखूबी दिखाती है।

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