Dacoit Review: बनावटी क्लाइमैक्स... भटकता मुद्दा, मसाले डालकर कहानी में तड़का लगाना भूल गए मेकर्स
मृणाल ठाकुर-अदिवि शेष और अनुराग कश्यप स्टारर 'डकैत' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म में कई मुद्दे उठाने के चक्कर में मेकर्स ने कहानी की ख ...और पढ़ें

डकैत मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। फिल्म का शीर्षक 'डकैत' है, तो डकैती होना लाजमी है। लेकिन यहां डकैती पारंपरिक अंदाज में नहीं होती है। न घोड़ों पर सवार डाकू हैं और न बैंक लूटने के दृश्य। यहां पर डकैती एक अस्पताल के इर्द-गिर्द रची गई है, जो मरीजों से मोटी फीस वसूलने और किडनी के अवैध धंधे में लिप्त है। यह आइडिया सुनने में रोचक लगता है, लेकिन पर्दे पर ठीक से साकार नहीं हो पाया है। बीच-बीच में कुछ दिलचस्प ट्विस्ट और टर्न जरूर आते हैं, लेकिन तब तक कहानी अपनी पकड़ खो चुकी होती है।
साल 2021 से शुरू होती है 'डकैत' की कहानी
कहानी का आरंभ साल 2021 से होता है। सजा काट रहा हरि (अदिवि शेष) जेल से फरार होना चाहता है। दरअसल, उसकी प्रेमिका सरस्वती (मृणाल ठाकुर) ने अपने भाई की हत्या के आरोप में उसके खिलाफ गवाही दी होती है। इसके बाद उसकी पिछली जिंदगी की परतें खुलती हैं। हरि निम्न जाति से है, जबकि सरस्वती उच्च जाति और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखती है। वह एमबीबीएस की पढ़ाई की तैयारी कर रही होती है।
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जेल से बाहर आने में हरि की मदद 'इश्क' (अतुल कुलकर्णी) करता है। बाहर आकर हरि को पता चलता है कि सरस्वती अब शादीशुदा है और एक बच्ची की मां है। उसकी जिंदगी तमाम परेशानियों से घिरी है। उसका पति दो महीने से अस्पताल में भर्ती है और किडनी ट्रांसप्लांट के लिए उसे लाखों रुपये चाहिए। पति घर को बैंक के पास गिरवी रख चुका है।
हरि उसे उसी अस्पताल को लूटने में अपना साथ देने के लिए कहता है। हरि की योजना पैसा लूटकर विदेश भागने और सरस्वती को पुलिस के हवाले करने की होती है, लेकिन आगे कई सच्चाइयां सामने आती हैं, जो घटनाक्रम को नया मोड़ देती हैं। इनमें से कुछ घटनाक्रम चौंकाते भी हैं।
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कई मुद्दों को भुनाने के चक्कर में फंसी कहानी
शेनिल देव और अदिवि शेष द्वारा लिखित इस कहानी और स्क्रीनप्ले में जात-पात, ऊंच-नीच, एकतरफा प्यार और भ्रष्ट पुलिस जैसे कई मुद्दे शामिल हैं, लेकिन किसी भी मुद्दे को कहानी समुचित तरीके से स्थापित नहीं कर पाती है।
इंटरवल से पहले की कहानी ज्यादातर फीकी और बिना रोमांच के आगे बढ़ती है। चाहे अदिवि शेष का जेल से भागना हो या डकैती वाला सीन, दोनों ही प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहते हैं। हरि और सरस्वती की प्रेम कहानी का आधार भी कमजोर है; उनका रिश्ता कैसे शुरू हुआ, यह स्पष्ट नहीं किया गया।
मामले की जांच को लेकर महिला पुलिस अधिकारी (जैन मेरी खान) का अपने पुलिस अधिकारी पिता स्वामी (अनुराग कश्यप) से मदद मांगना हास्यास्पद लगता है। अगर जैन का पात्र कहानी का हिस्सा नहीं भी होता, तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता। इंटरवल के बाद कहानी में कुछ रोचक मोड़ आते हैं, लेकिन धीमी रफ्तार के कारण वे फिल्म को रोमांचक नहीं बना पाते।
बनावटी है 'डकैत' का क्लाइमैक्स
फिल्म का क्लाइमैक्स भी काफी बनावटी लगता है। यह भले ही एक प्रेम कहानी है, लेकिन दर्शकों के साथ कहीं भी भावनात्मक जुड़ाव नहीं बना पाती। शेनिल देव निर्देशित इस फिल्म में कोरोना काल के बाद का दौर कहानी का अहम हिस्सा है, लेकिन लेखक ने आवश्यकतानुसार ही उसका उपयोग किया है।
हिंदी के साथ तेलुगु में शूट हुई इस फिल्म की अवधि बहुत ज्यादा है। एडिटर कोडाती पवन कल्याण इसे चुस्त संपादन से थोड़ा छोटा कर सकते थे। तकनीकी पक्ष की बात करें तो सिनेमेटोग्राफर धनुष भास्कर ने माहौल को सही तरीके से कैमरे में कैद किया है। हालांकि, गीत-संगीत ऐसा नहीं है जो सिनेमाघर से बाहर आने पर याद रहे। फिल्म के संवाद भी प्रभावी नहीं बन पाए हैं।