Everybody Loves Sohrab Handa Review: सीट से हिलने नहीं देगी 101 मिनट की मर्डर मिस्ट्री, एक कमरे में घूमती कहानी
विनय पाठक की फिल्म 'एव्रीबडी लव्स सोहराब हांडा' (Everybody Loves Sohrab Handa Review) ओटीटी पर रिलीज हो गई है। जानिए फिल्म कैसी है... ...और पढ़ें

मर्डर मिस्ट्री का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- एक्स

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प्रियंका सिंह, मुंबई। मर्डर मिस्ट्री में अंत तक अगर अंदाजा न लग पाए की मर्डर किसने किया है, तो वह कहानी दिलचस्प लगती है। जी5 पर रिलीज हुई फिल्म एव्रीबडी लव्स सोहराब हांडा (Everybody Loves Sohrab Handa) की कहानी भी कई किरदारों को समेटे ऐसी ही दिलचस्प है।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी शुरू होती है हिल स्टेशन पर एक बड़े से विला में, जहां रमन (नील भूपलन) और जयती (पालोमी घोष) अपनी दसवीं शादी की सालगिरह मनाने गए हैं। उन्होंने इस खुशी में अपने करीबियों, दोस्तों और बिजनेस पार्टनर सोहराब (विनय पाठक), उसके भाई (चंद्रचूड़ राय) और सोहराब की पत्नी इशा (कोयल पुरी) को भी आमंत्रित किया होता है।
सोहराब स्वभाव से बेहद गुस्सैल है, हर किसी को डांट देता है। उसकी उस घर में मौजूद लगभग हर किसी से बहस हो जाती है। उसी रात सोहराब का खून हो जाता है। पुलिस इंस्पेक्टर अफजल कुरैशी (सौरभ शुक्ला) छानबीन के लिए पहुंचता है। शक की सुई हर किसी पर जाती है, क्योंकि हर किसी के पास सोहराब का खून करने का कारण है।
रजत कपूर का निर्देशन है काबिल-ए-तारीफ
आखों देखी, रघु रोमियो समेत कई फिल्मों का निर्देशन कर चुके रजत ने इसे आम मर्डर मिस्ट्री ड्रामा से अलग बनाया है, जिसमें कैमरा लाउड बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ लोगों के चेहरों पर नहीं घूमता। एक घर के भीतर खून हो जाना और शक के दायरे में वहां मौजूद हर शख्स का होना, नया नहीं है, लेकिन उसे कई पात्रों की जिंदगानी दिखाते हुए प्रस्तुत करना अलग है।
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एक फिल्म में दिखा दिए सारे भाव
रजत ने एक ही कहानी में गुस्सा, अहंकार, जलन, खुशी, गम, अपनों के दिए पुराने जख्मों के कारण बदला स्वभाव, बचपन का ट्रामा, मौकापरस्ती जैसी कई भावनाओं को अलग-अलग पात्रों के जरिए समेटने का सफल प्रयास किया है। फिल्म के मुख्य पात्र सोहराब की मौत फिल्म के पहले ही फ्रेम में दिखाई गई है, उसके बावजूद रजत अपने लेखन से जैसे कहानी को उसी दिन की सुबह और शाम में लेकर जाते हैं, वह सराहनीय है।
चौंकाता है फिल्म का क्लाइमैक्स
कहानी बीच-बीच में कत्ल वाले समय और उसी दिन की सुबह और दोपहर में आती-जाती रहती है। फिल्म में कई कलाकार एक साथ बात करते हैं, लेकिन वह शोर नहीं लगता है। फिल्म का अंत, कातिल और कत्ल करने का कारण चौंकाएगा। रजत ने पात्रों के जरिए अलग-अलग दुनिया को दिखाने का भी प्रयास किया है, जिसके किसी युगल के बीच उम्र का अंतर होते हुए भी प्यार है, तो वही डाक्टर चड्ढा (रजत कपूर), जो दोस्ती निभाने के लिए कनाडा से दोस्त की सालगिरह में शामिल होने आया है।
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कहां अटकी फिल्म?
सिनेमैटोग्राफर राफे महमूद की सराहना बनती है, क्योंकि उनके पास शूट करने के लिए महज एक कमरा था, जहां एक समय पर सभी पात्र मौजूद थे, फिर भी वह हर किसी के भावों को कैमरे में कैद कर पाए। फिल्म के अंत में रजत अपनी कहानी से कुछ कहने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह स्पष्ट नहीं हो पाता है। रजत कहानी से कुछ पात्रों को कम करके वह बेवजह के सीन निकाल भी सकते थे।
फिल्म की स्टार कास्ट ने भरी जान
अभिनय की बात करें, तो सोहराब के रोल में विनय पाठक फिल्म की जान हैं। उनकी झल्लाहट, गुस्सा सब स्वाभाविक लगता है। रजत कपूर अपने पात्र के जरिए कहानी में ठहराव लाते हैं। रणवीर शौरी इतने पात्रों के बीच भी अपनी सशक्त मौजूदगी दर्ज कराते हैं। कोयल पुरी, नील भूपलम, पालोमी घोष अपने पात्रों में वास्तविक लगते हैं। चंद्रचूड़ राय अपने अभिनय से चौंकाएंगे। उन्होंने अरुण के परतदार रोल को बखूबी निभाया है।