Hello Bachhon Review: फिजिक्स वाला की कहानी में Vineet Kumar बने 'माथे का चंदन', Series में कहां रह गई कमी?
Hello Bachhon Review: मशहूर शिक्षक अलख पांडे, जो कि फिजिक्स वाला (Physics Wallah) के फाउंडर है की कहानी पर बनी सीरीज हैलो बच्चों, 6 मार्च को नेटफ्लिक् ...और पढ़ें

कैसी है विनीत कुमार सिंह स्टारर हैलो बच्चों?

समय कम है?
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एकता गुप्ता, नई दिल्ली। शिक्षा- एक बेसिक सुविधा जिस पर हर बच्चे का हक है, फिर चाहे वह गरीब हो अमीर। ये एक लाइन ही काफी है फिजिक्स वाला के फाउंडर अलख पांडे के विजन को समझने के लिए। ये लाइन बहुत पढ़ने और सुनने में जितनी सरल लगती है असल में इस पर अमल करना उतना ही मुश्किल होता है। खासकर जब देश की सबसे बड़ी एग्जाम में से एक आईआईटी की बात की जाए।
आईआईटी (IIT) की पढ़ाई का गढ़ माने जाने वाले कोटा में हर साल लाखों बच्चे कुछ सपने लिए जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो कोटा तो दूर अपनी जिंदगी के बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते जिसमें सबसे आगे आती है गरीबी, पैसों की कमी जो उन्हें बड़े सपनों को देखने की इजाजत नहीं देती। लेकिन इसी बाधा को खत्म करने के लिए अलख पांडे (Alakh Pandey) ने फिजिक्स वाला (Physics Wallah) की शुरुआत की और लाखों बच्चों को घर बैठे कम खर्च में आईआईटी की पढ़ाई कराई। यह सीरीज उन्हीं अलख पांडे की कहानी को दिखाती है।
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हैलो बच्चों की कहानी
हैलो बच्चों (Hello Bachhon) में विनीत कुमार सिंह (Vinnet Kumar Singh) ने अलख पांडे का किरदार निभाया है। सीरीज अलख पांडे की प्रोफेशनल जर्नी के साथ-साथ पर्सनल मुश्किलों और हालातों को भी दिखाती है। इसके साथ ही पैरेलल में उन बच्चों की कहानी भी चलती है जो गरीबी के अंधेरे में बड़े सपने देखते हैं और अलख पांडे की दिखाई रोशनी में उन सपनों को पूरा करते हैं।
सीरीज में अलख पांडे के फिजिक्स वाला की शुरुआत करने, उसके लिए फंड जुटाने और सामने आई कई मुश्किलों का हल निकालने की कहानी दिखाई गई है। जिसमें उनके साथ प्रतीक माहेश्वरी (विक्रम कोचर) भी होते हैं जो उनके साथ फिजिक्स वाला की नींव रखते हैं।
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हैलो बच्चों रिव्यू (Hello Bachhon Review)
हैलो बच्चों की सबसे मजबूत कड़ी के रूप में उभरकर आए हैं विनीत कुमार सिंह (Vineet Kumar Singh) जिन्होंने 'छावा' जैसी फिल्म में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया है। विनीत ने अलख पांडे के किरदार में सधी हुई एक्टिंग की है। फंड जुटाने की जद्दोंजहद से लेकर अपने बच्चों के लिए मेहनत तक उनके एक्सप्रेशन और इमोशनल सीन सीधा दिल पर लगते हैं। बाकी किरदारों में गिरिजा ओक और विक्रम कोचर ने भी अच्छा काम किया है।
सीरीज में अलख पांडे और उनके पढ़ाए बच्चों की कहानी को पैरेलल चलाना कुछ नयापन देता है। इससे सीरीज में इमोशनल पहलू प्रेरणा के रूप में काम करता है और दर्शकों को अपने सपने पूरा करने की प्रेरणा देता है।
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बात करें कहानी की तो पहले दो एपिसोड थोड़ी धीमी गति से चलते हैं, तीसरे एपिसोड से कहानी रफ्तार पकड़ती है लेकिन स्क्रीनप्ले इतना स्लो लगता है कि बोरियत होने लगती है। वहीं हर एपिसोड में एक ही कहानी रिपीट की हुई लगती है। जैसे अलख पांडे का सिर्फ फंड जुटाने और फीस कम करने की जद्दोजहद में लगे रहना। कहानी पर छोड़ी और मेहनत हो सकती थी।
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बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है, इमोशनल सीन और इंस्पायरिंग सीन में बीजीएम का अच्छा काम है। बस कमी है तो कहानी की रफ्तार और स्क्रीनप्ले की जो और बेहतर हो सकता था, जिससे सीरीज देखने में बोरियत नहीं होती। पूरी कहानी प्रीडिक्टेबल लगती है कुछ भी नया और सस्पेंसफुल नहीं है।
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देखें या नहीं?
अलख पांडे (फिजिक्स वाला) पर बनी सीरीज धीमी भले ही है लेकिन यह आपको इंस्पायर करती है और अपने सपनों को पूरा करने के लिए दो बार सोचने पर मजबूर जरूर करती है। एक बार देख सकते हैं।