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    Charak Review: आस्था की आड़ में खौफनाक अंधविश्वास का काला सच दिखाती है 'चरक', जबरदस्त है क्लाइमैक्स

    By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
    Updated: Fri, 06 Mar 2026 11:28 AM (IST)

    'द केरल स्टोरी' के बाद निर्देशक सुदीप्तो सेन एक और पावरफुल कहानी दर्शकों के सामने लेकर आए हैं। उनके प्रोडक्शन में बनी फिल्म 'चरक: फेयर ऑफ फेथ' बंगाल क ...और पढ़ें

    चरक: फेयर ऑफ फेथ रिव्यू/ फोटो - Jagran Graphics

    चरक: फेयर ऑफ फेथ रिव्यू/ फोटो - Jagran Graphics

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    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। खुद के संतान सुख प्राप्‍ति के लिए किसी दूसरे बच्‍चे की बलि देना सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन फिल्‍म 'चरक: फेयर ऑफ फेथ' बंगाल में प्रचलित चरम तांत्रिक प्रथाओं और अंधविश्वास के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानी है। फिल्‍म नरबलि और बच्चों के लापता होने की घटनाओं को केंद्र में रखती है। मान्‍यता है कि चरक मेला मां काली और शिव भगवान को प्रसन्‍न करने के लिए आयोजित किया जाता है।

    द केरल स्‍टोरी के निर्देशक सुदीप्‍तो सेन ने चरक के जरिए फिल्‍म निर्माण में कदम रखा है। फिल्म मेले की आड़ में होने वाले अंधविश्‍वास को लेकर झकझोरती है।

    क्या है चरक: फेयर ऑफ फेथ की कहानी?

    कहानी चांदपुर में चरक मेले से दो सप्ताह पहले शुरू होती है। बिकास (सुब्रत दत्‍त) और सुकुमार (शशि भूषण) बचपन के जिगरी दोस्‍त हैं। बिकास के बेटे बिरसा (शंखदीप) को निसंतान सुकुमार और उसकी पत्‍नी बहुत प्‍यार करते हैं। सुकुमार चरक मेले में इस बार बड़ा पुजारी बना है। उधर, बिकास से जुआ में हारा जगन (नलनीश नील) उससे पैसे वापस मांगता है जो उसने मेले में दुकान लगाने के लिए रखे होते हैं। बिकास मना कर देता है। आपसी अनबन के बाद जगन उसे सबक सिखाने की ठान लेता है।

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    वहीं पुलिस इंस्‍पेक्‍टर सुभाष शर्मा (सहीदुर रहमान) और उसकी लेखिका पत्‍नी शेफाली (अंजलि पाटिल) शादी के 12 साल बाद भी निसंतान हैं। शेफाली बच्‍चा गोद लेने को कहती है, लेकिन सुभाष उसके लिए राजी नहीं है। ऐसी मान्‍यता है कि निसंतान श्रद्धालु अगर अघोरियों के जरिए किसी बच्‍चे की बलि दें तो संतान सुख प्राप्‍त कर सकते हैं।

    चरक की तैयारियों के बीच बिरसा और उसका जिगरी दोस्‍त कानू (शौनक श्‍यामल) लापता हो जाते हैं। स्‍थानीय विधायक का निर्देश है कि मेले के दौरान पुलिस कोई मामला दर्ज न करें, लेकिन लोगों की नाराजगी को देखते हुए पुलिस उनकी तलाश में जुटती है। आखिर बिरसा और कानू के लापता होने के पीछे कौन जिम्‍मेदार है? क्‍या इनकी बलि दी जाएगी? कहानी इस संबंध में हैं।

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    charak fair of faith

    मेले और उससे जुड़ी परंपराओं पर है फिल्म का फोकस

    आस्था और अंधविश्वास के बीच की पतली रेखा को तर्क ही अलग करता है। शिलादित्‍य मौलिक द्वारा निर्देशित और संजय हल्दर की लिखी कहानी इसी मुद्दे को उठाती है। फारुख मलिक के लिखे स्क्रीनप्ले में कई सामाजिक पहलुओं को जोड़ा गया है जैसे संतान न होने के लिए औरत को दोषी ठहराना, शिक्षित सुभाष का अपनी मां के कहने पर तांत्रिक बाबा की दवाई लेना, जात-पात और बच्चों की चोरी जैसी घटनाएं। फिल्म का पहला हिस्सा मुख्य रूप से चरक मेले और पात्रों की स्थापना में बीत जाता है। मेले के आयोजन और उससे जुड़ी परंपराओं पर ज्यादा फोकस किया गया है।

    इंटरवल के बाद कहानी रफ्तार पकड़ती है क्लाइमैक्स चौंकाता है लेकिन उसे थोड़ा और गहराई से दिखाने की गुंजाइश थी। सुकुमार से जुड़े कुछ सवाल अनुत्‍तरित रह जाते हैं। शरीर को लोहे की छड़ों से भेदने और अघोरियों के खोपड़ी से पानी पीने जैसे दृश्य कुछ दर्शकों को विचलित कर सकते हैं। फिल्म के अंत में वर्तमान समय में गैरकानूनी तरीके से दी जा रही नरबलि से जुड़ी अखबारों की खबरों की क्लिप भी दिखाई जाती है।

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    तकनीक पक्ष की बात करें तो विशाख ज्योति का संगीत फिल्म के भाव और वातावरण को प्रभावी ढंग से उभारता है। वहीं सिनेमेटोग्राफर मानस भट्टाचार्य और प्रशांतनु मोहपात्रा ने चरक उत्सव के साथ गांव की प्राकृतिक सुंदरता को खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है।

    कलाकारों ने अपने किरदारों के साथ किया न्याय

    कलाकारों में अंजलि पाटिल और साहीदुर रहमान प्रभावशाली हैं। उन्‍होंने अपने किरदारों को उचित भावों के साथ जीया है। बिरसा के शराबी और जुआरी पिता के रूप में सुब्रत दत्त तथा उसकी मां के रूप में मनोश्री बिस्वास का अभिनय सराहनीय है। बाल कलाकार शंखदीप और शौमल श्यामल भी प्रभावित करते हैं। सुकुमार के रूप में शशि भूषण और उनकी पत्नी की भूमिका में श्रेया भट्टाचार्य ने भी अपने किरदारों को सहजता से निभाया है।

    कुल मिलाकर चरक : फेयर आफ फेथ एक गंभीर सामाजिक मुद्दे को उठाती है। हालांकि इसकी कहानी और प्रस्तुति थोड़ी और सशक्त होती तो इसका प्रभाव कहीं ज्यादा गहरा हो सकता था।

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