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    Ohh My Dog Review: इंसानी लालच पर भारी पड़ी बेजुबान 'ऑस्कर' की वफादारी, क्या देखने लायक है 'ओह माय डॉग'?

    By Smita SrivastavaEdited By: Rinki Tiwari
    Updated: Thu, 06 Aug 2026 11:08 AM (IST)

    Ohh My Dog Movie Review: अमित राय निर्देशित 'ओह माय डॉग' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म देखने से पहले इसका रिव्यू पढ़ें। ...और पढ़ें

    ओह माय डॉग मूवी का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- एक्स

    ओह माय डॉग मूवी का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- एक्स

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    स्मिता श्रीवास्‍तव, मुंबई। अमूमन 'ओह माय गॉड!' तब बोला जाता है जब किसी बात पर बहुत ज्यादा हैरानी, खुशी, डर, सदमा या अविश्वास का भाव हो, लेकिन जब इंसान की जान बचाने के लिए एक कुत्ता अपनी जान की बाजी लगा दे, तो 'ओह माय डॉग' (Ohh My Dog) कहना बनता है।

    यहां भी एक श्‍वान (डॉग) अपने मालिक की जान बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा देता है। 'ओएमजी 2' निर्देशित करने के बाद अमित राय 'ओह माय डॉग' में इंसान और श्‍वान के इसी भावनात्‍मक रिश्‍ते को खूबसूरती से उठाया है।

    क्या है 'ओह माय डॉग' की कहानी?

    इसमें दो कहानी समानांतर चलती हैं। यद्यपि दोनों की चिंता और भाव एक जैसे हैं, लेकिन उनके रास्ते आपस में नहीं मिलते। कहानी का आरंभ मुंबई में श्‍वान सेनापति को राजकीय सम्‍मान के साथ अंतिम विदाई देने से होता है। उसने बीस से ज्‍यादा खतरनाक मिशन, छह इंटेलीजेंस ऑपरेशन समेत कई सा‍हसिक मिशन में योगदान दिया होता है।

    वहां से कहानी दो अलग-अलग राज्‍यों में आती है। पहली कहानी असम की है जिसमें अप्‍पू (माही राय) का श्‍वान मोमो (ऑस्‍कर) अचानक से लापता हो जाता है। अप्‍पू बेहद बुद्धिमान और तकनीक का जानकार है। अप्‍पू की मां (गीता अग्रवाल) भी मोमो को बेटे की तरह मानती हैं। दूसरी कहानी पटना आती है जहां मास्‍टर जी (पंकज त्रिपाठी) गरीब बच्‍चों को पढ़ाते हैं। उनका छात्र और दिहाड़ी मजदूर प्रिंस (निखिल कुमार) गायब हो जाता है।

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    दोनों ही पक्ष पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। फिर पता चलता है कि प्रिंस को किडनी निकालने के लिए अगवा किया गया है, तो दूसरी तरफ असम में कुत्तों की तस्करी का मामला सामने आता है। प्रिंस की खोज में उसका पालतू श्‍वान ऑस्‍कर (ब्रूनो) , उसके स्‍वजन और मास्‍टरजी जुटते हैं। वहीं दूसरी ओर मोमो की खोज में अप्‍पू अपनी टीचर (सुलक्षणा बरुआ) की मदद लेता है। दोनों अपनी खोज में सफल हो पाएंगे की नहीं क‍हानी इस संबंध में हैं।

    निस्वार्थ प्रेम को जाहिर करती है फिल्म

    श्‍वान को केंद्र में रखकर 77 चार्ली, एंटरटेनमेंट, तेरी मेहबानियां जैसी फिल्‍में बनी हैं। 'ओह माय डॉग' भी श्वान की वफादारी और अपने मालिक के प्रति उसके निस्वार्थ प्रेम को गहराई से सामने लाती है। वहीं इंसान का लालची चेहरा भी सामने लाती है जो पैसों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

    दिल छूता है अमित राय का निर्देशन-स्क्रीनप्ले

    अमित राय ने अमीरी-गरीबी, किडनी चोरी गैंग, कुत्‍तों की तस्‍करी, पुलिस में भ्रष्‍टाचार जैसे कई मुद्दों को कहानी में समेटा है। जहां एक ओर कुत्ता अपने मालिक की तलाश में है तो दूसरी ओर एक लड़का अपने लापता कुत्ते को खोज रहा है। इन दोनों कहानियों को उन्‍होंने अच्छी तरह से साथ में पिरोया है।

    खास बात यह है कि मोमो अमित का अपना पालतू श्‍वान हैं। वहीं अप्‍पू उनका छोटा बेटा है। हालांकि कहानी शुरुआत में धीमी गति से आगे बढ़ती हैं, लेकिन जैसे-जैसे दोनों ओर खोज तेज होती है उसमें गति आती है। ऑस्‍कर को जब पुलिसवाले घाट के किनारे चक्‍कर लगवाते हैं तो बेजुबान की बेबसी देखकर दिल भर आता है। ऑस्कर की भूमिका काफी प्रभावशाली है।

    ohh my dog

    जबकि दूसरा श्‍वान मोमो कहानी में कम नजर आता है। ऑस्कर की अपने मालिक के प्रति वफादारी और समर्पण को बेहद मजबूती से दिखाया गया है। हालांकि, कुछ जगह यह भाव जरूरत से ज्यादा आदर्शवादी भी लगता है। ऐप्‍स को लेकर अप्पू की जानकारी और उनकी मदद से खोज को आगे बढ़ाना फिल्म में तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल को दर्शाता है।

    कहां हो गई चूक?

    मगर कुछ सवाल अनुत्‍तरित भी रह जाते हैं। टीचरजी के मामा (पवन मल्‍होत्रा) ने बीस साल से अपनी बहन से बात नहीं की है फिर भी भांजी के संपर्क में कैसे हैं? यह स्‍पष्‍ट नहीं है। किडनी निकालने का अस्‍पताल में प्रकरण भी बहुत सतही रहा है। हालांकि, क्‍लाइमेक्‍स तक पहुचंने में लेखक- निर्देशक जल्‍दीबाजी में नजर आते हैं।

    कैसा है फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक एंड साउंड?

    फिल्म का ज्यादातर हिस्सा वास्तविक लोकेशनों पर फिल्माया गया है। साउंड डिजाइनर सुभाष साहू ने कुत्तों के भौंकने, लोगों की आवाजों, पुलिस के सायरन और शंखनाद जैसी अलग-अलग ध्वनियों का प्रभावी इस्तेमाल किया है। वहीं मंगेश धाकड़े का बैकग्राउंड संगीत कहानी की भावनाओं को सहज रूप से दर्शकों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है।

    उम्दा है कलाकारों का प्रदर्शन

    कलाकारों में पंकज त्रिपाठी, राजेश कुमार, पवन मल्‍होत्रा, गीता अग्रवाल समेत सहयोगी भूमिका में आए सभी कलाकार अपनी भूमिका साथ न्‍याय करते हैं। अप्‍पू की भूमिका में माही राय और टीचर की भूमिका में सुलक्षणा बरुआ का अभिनय प्रभावी है।

    कुल मिलाकर यह फिल्म श्वानों के प्रति करुणा, संवेदनशीलता और उनकी भावनाओं को समझने का सार्थक संदेश देती है।

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