Sankalp Review: नाना पाटेकर ने संभाली सीरीज की डोर, कमजोर स्टोरीटेलिंग ने बिगाड़ा 'संकल्प' का खेल
Sankalp Review: नाना पाटेकर और जीशान अय्युब स्टारर 10 एपिसोड की सीरीज 'संकल्प' अमेजन एमएक्स प्लेयर पर स्ट्रीम हो रही है। यहां पढ़ें सीरीज का रिव्यू-
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नाना पाटेकर की 'संकल्प' ओटीटी पर कर रही है स्ट्रीम

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, नई दिल्ली। भारतीय इतिहास में चाणक्य और चंद्रगुप्त का रिश्ता गुरु-शिष्य, संरक्षक-पाल्य और कूटनीतिज्ञ-सम्राट का सबसे अटूट व ऐतिहासिक संबंधों में गिना जाता है। चाणक्य ने एक साधारण बालक चंद्रगुप्त की प्रतिभा पहचानकर उसे तक्षशिला में शिक्षित किया और अपनी नीतियों (साम-दाम-दंड-भेद) से अत्याचारी राजा धनानंद को परास्त कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना करवाई। वेब सीरीज ‘संकल्प’ (Sankalp) की कहानी भी इसी गुरु-शिष्य संबंध की अवधारणा से प्रेरित दिखाई देती है।

क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी पटना में गंगा किनारे बसे गुरुकुल के संचालक कन्हैयालाल उर्फ ‘माट साब’ (नाना पाटेकर- Nana Patekar) के इर्द-गिर्द घूमती है। माट साब गुरुकुल में बौद्धिक रुप से तेज और प्रतिभाशाली बच्चों को तैयार करते हैं जो आगे चलकर प्रभावशाली नौकरशाह बनते हैं। दिक्कत तब होती है उनका चहेता शिष्य एसपी आदित्य वर्मा (मोहम्मद जीशान अय्यूब) ही उनका विरोधी हो जाता है। दिल्ली से पटना आती-जाती कहानी में दिल्ली के मुख्यमंत्री प्रशांत सिंह (संजय कपूर) और उनके रणनीतिकार वकार (नीरज काबी) के साथ कन्हैयालाल का राजनीतिक टकराव बढ़ता हैं।
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टकराव के बीच माट साहब के भरोसेमंद पुलिस अधिकारी परवीन शेख (कुब्रा सैत) और वासुदेव (सौरभ गोयल) उनके साथ हैं। जैसे-जैसे टकराव बढ़ता है, पुराने विश्वासघात, वैचारिक मतभेद और सत्ता की महत्वाकांक्षा सामने आने लगती है। सीरीज गुरु-शिष्य संबंधों, महत्वाकांक्षाओं के साथ उनके पीछे छिपी राजनीति तथा स्वार्थ को टटोलने की कोशिश करती है।
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डायरेक्शन, स्टोरीटेलिंग और कहानी
राजनीति की बिसात पर इस बार नए खिलाडि़यों के साथ निर्देशक प्रकाश झा संकल्प के साथ लौटे हैं। रेशूनाथ की लिखित कहानी सत्ता के गलियारों को दिखाने की कोशिश तो करती है, लेकिन किंगमेकर और बागी शिष्यों की राजनीति वेब सीरीज के फार्मेट में कई जगह घिसी-पिटी लगती है।
एटीएम में नकली नोट, चुनाव जीतने के लिए मुफ्त रेवड़ियां, भ्रष्ट तंत्र, छात्र राजनीति जैसे मुद्दे से रची दुनिया कहीं-कहीं फीकी लगती है। प्रशांत और वकार को सत्ता से हटाने को लेकर शह मात का खेल दिलचस्प नहीं बन पाया है। दस एपिसोड की इस सीरीज की दृश्यात्मक संरचना में भी अपेक्षित नवीनता नहीं दिखती, जिससे इसकी रोचकता प्रभावित होती है।
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बीच-बीच में प्रशांत सवाल करता है कि आखिर हो क्या रहा है? यही सवाल दर्शकों के मन में उठता है, क्योंकि कई उपकथानक अधूरे लगते हैं। महिला पात्र भी सशक्त नहीं बन पाए हैं। वह सहयोगी भूमिका में सीमित रह गए हैं। हालांकि सिनेमेटोग्राफर चंदन कोवली का काम सराहनीय। अद्वैत नेमलेकर का संगीत कथानक के अनुरुप है।
राइटिंग में रह गई कमी
बहरहाल, फिल्म राजनीति में शांत, लेकिन पर्दे के पीछे से सत्ता संचालित करने वाले रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले नाना पाटेकर उसी छवि को आगे बढ़ाते नजर आते हैं। एक जगह नाना का पात्र नारा देते है सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। प्रकाश झा इस नारे के साथ लोकनायक जयप्रकाश नारायण का स्मरण कराते हैं, जिन्होंने पिछली सदी के सातवें दशक में कांग्रेस के खिलाफ एक नई राजनीतिक पीढ़ी तैयार की, जिसके कई नेता अभी भी सक्रिय है।
यहां पर माट साब यही काम नौकरशाही के केंद्र में करते हैं। बहरहाल, नाना पाटेकर सीरीज का भार सहजता से अपने कंधों पर उठाते हैं। बाकी कलाकारों का उन्हें सहयोग मिलता है लेकिन कमजोर लेखन उनकी संभावनाओं को सीमित कर देता है। शो के आखिर में दूसरे सीजन का संकेत हैं।
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