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    अंबाला में बिजली इंजीनियरों को बना दिया ‘डॉक्टर’, बिल पास के लिए चेक करेंगे कौन सी दवा सही और कौन सा टेस्ट जरूरी

    Updated: Sat, 25 Jul 2026 11:59 AM (IST)

    उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम के नए आदेश से कार्यकारी अभियंताओं को कर्मचारियों के मेडिकल बिलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है। ...और पढ़ें

    फोटो एआई द्वारा बनाई गई है

    फोटो एआई द्वारा बनाई गई है

    HighLights

    1. नए आदेश से कार्यकारी अभियंताओं को मेडिकल बिल जांचने होंगे

    2. चिकित्सा ज्ञान की कमी से अभियंताओं को परेशानी हो रही है

    3. बिलों के निपटान में देरी, कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है

    दीपक बहल, अंबाला। उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (यूएचबीवीएन) के नए आदेश ने बिजली अधिकारियों को ऐसे काम की जिम्मेदारी दे दी है, जिसके लिए वे प्रशिक्षित ही नहीं हैं। अब तक कर्मचारियों के मेडिकल प्रतिपूर्ति बिलों की तकनीकी जांच मेडिकल अधिकारी करते थे, लेकिन नई व्यवस्था में यह जिम्मेदारी सीधे कार्यकारी अभियंता पर डाल दी गई है। इससे विभाग में असंतोष बढ़ रहा है।

    पहले कर्मचारी अपने मेडिकल बिल संबंधित कार्यकारी अभियंता कार्यालय में जमा करवाते थे। वहां से फाइलें पंचकूला या रोहतक स्थित निगम की डिस्पेंसरी भेजी जाती थीं। जहां मेडिकल अधिकारी यह जांच करते थे कि जिस बीमारी का इलाज कराया गया, उसके अनुसार दवाएं उचित थीं या नहीं, करवाए गए टेस्ट आवश्यक थे या नहीं। अस्पताल निगम के पैनल में शामिल है या नहीं तथा नियमानुसार कितनी राशि का भुगतान बनता है।

    जांच के बाद मेडिकल अधिकारी बिल पास करते थे या आपत्तियां लगाकर फाइल वापस भेज देते थे। अब नई व्यवस्था में यह पूरा दायित्व कार्यकारी अभियंताओं को सौंप दिया है। अब वही तय करेंगे कि कौन सी दवा सही है, कौन सा टेस्ट जरूरी था, किस अस्पताल का बिल मान्य है और कितनी राशि स्वीकृत की जानी चाहिए।

    मेडिकल ज्ञान नहीं, फिर कैसे करेंगे फैसला

    निगम के कई अधिकारियों का कहना है कि कार्यकारी अभियंता बिजली व्यवस्था के विशेषज्ञ हैं, चिकित्सा के नहीं। ऐसे में उनसे दवाओं, इलाज और मेडिकल प्रक्रियाओं की जांच करवाना व्यावहारिक नहीं है।

    यदि किसी बिल में विवाद होता है या गलत भुगतान हो जाता है तो उसकी जवाबदेही भी संबंधित अधिकारी पर ही आएगी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद कार्यकारी अभियंताओं को प्रत्येक मेडिकल बिल की बारीकी से जांच करनी पड़ रही है। इससे एक-एक बिल के निपटान में कई दिन लग रहे हैं और कर्मचारियों के मेडिकल क्लेम भी लंबित होने लगे हैं।

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    कर्मचारी भी परेशान, अधिकारी भी असहज

    बिलों के निपटान में देरी से कर्मचारियों को प्रतिपूर्ति राशि मिलने में इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि अधिकारी अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ से परेशान हैं। विभागीय स्तर पर चर्चा है कि मेडिकल विशेषज्ञों का काम तकनीकी अधिकारियों को सौंपने से व्यवस्था और अधिक जटिल हो गई है।

    पहले क्या था, अब क्या है

    मेडिकल बिल कार्यकारी अभियंता कार्यालय जमा होते थे जहां से निगम की डिस्पेंसरी में मेडिकल अधिकारी की जांच कर बिल पास करते रहे। अब मेडिकल बिल कार्यकारी अभियंता कार्यालय में जमा होंगे जहां अभियंता स्वयं जांच और मंजूरी देंगे।

    विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि किसी मेडिकल बिल में अनियमितता रह जाती है या नियमों के विपरीत भुगतान हो जाता है तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित कार्यकारी अभियंता पर आएगी। ऐसे में अधिकारी बिना चिकित्सा विशेषज्ञता के निर्णय लेने को लेकर चिंता जता रहे हैं।