150 रुपये के चक्कर में बैंक खाता बंद, खुलवाने के लिए जाना पड़ा हाईकोर्ट
फरीदाबाद में एक नर्सरी संचालक का बैंक खाता साइबर ठगी के 150 रुपये के भुगतान के कारण 14 महीने के लिए ब्लॉक कर दिया गया। अनजान शख्स ने पौधे के लिए यूपीआ ...और पढ़ें
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बैंक खाता ब्लॉक होने से व्यक्ति परेशान हुआ। सांकेतिक फोटो सौजन्य- एआई जेनरेटेड
HighLights
नर्सरी संचालक से पौधा व गमला खरीदने पर किया था अनजान शख्स ने 150 रुपये का भुगतान
उसके खाते में थी ठगी की रकम, इसलिए नर्सरी संचालक का खाता भी कर दिया गया था ब्लॉक
प्रवीन कौशिक, फरीदाबाद। साइबर ठगी की रकम जितने भी बैंक खातों में घूमती है, उन सभी को ब्लॉक कर दिया जाता है। फिर चाहे वह खाता छोटे से दुकानदार, रेहड़ी-खोमचे वाले का हो या माल संचालक का। इस नियम से ऐसे हजारों दुकानदारों की परेशानी बढ़ गई है, जिन्हें पता नहीं होता कि ऑनलाइन भुगतान ठगी की रकम से हो रहा है।
वैसे भी ऑनलाइन भुगतान के समय दुकानदार के लिए इस रकम के बारे में पता करना मुमकिन नहीं है। इसी तरह का एक मामला औद्योगिक नगरी से सामने आया है। नर्सरी संचालक से कोई अनजान व्यक्ति 150 रुपये में पौधा और छोटा गमला खरीदकर ले गया। उसने ऑनलाइन भुगतान किया था, लेकिन कुछ दिन बाद नर्सरी संचालक का खाता ब्लॉक कर दिया गया, आरोप था कि जो 150 रुपये उसके खाते में अनजान शख्स ने यूपीआई से भेजे थे, वह ठगी की रकम थी।
14 महीने बाद मिली राहत
पीड़ित संचालक ने पुलिस से खूब गुहार लगाई, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अब उनके पक्ष में फैसला आया है और खाता चालू करने के आदेश जारी किए गए हैं। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया है कि बिना इलाका मजिस्ट्रेट के आदेश के किसी का खाता फ्रीज न किया जाए।
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अजरौंदा चौक पर इसी नर्सरी से खरीदा गया था पौधा व गमला। जागरण
पीड़ित को यह राहत 14 माह बाद मिली है। ऐसे पीड़ित एक-दो नहीं हैं बल्कि साइबर के तीनों थानों में हर महीने हजारों लोग ऐसे आते हैं, जिनके खाते ब्लॉक करा दिए गए हैं। इनमें अधिकतर दुकानदार हैं। जिनसे खरीदारी के बाद यूपीआई से भुगतान किया गया है।
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नवंबर 2024 में हुई थी खरीदारी
अजरौंदा चौक पर नर्सरी चलाने वाले अजय अरोड़ा के अनुसार नवंबर 2024 में उनकी नर्सरी पर एक अनजान शख्स ने एक पौधा व गमला खरीदकर ऑनलाइन 150 रुपये ट्रांसफर कर दिए थे। 17 नवंबर 2024 को उनका खाता ब्लॉक हो गया। वह अपने इंडसइंड बैंक में गए तो पता चला कि यह खाता छत्तीसगढ़ के चंद्रपुर थाने में दर्ज साइबर ठगी के मामले की वजह से बंद किया गया है।
उन्होंने चंद्रपुर की थाना पुलिस से भी संपर्क किया। वहां से पता चला कि जिस शख्स ने उनकी नर्सरी से 150 रुपये का सामान खरीदा था, उसके खाते में ठगी की रकम थी। जिस-जिस के खाते में यह रकम जाएगी, उन सभी खातों को ब्लॉक कर दिया जा रहा है। अजय के अनुसार उन्होंने स्थानीय साइबर थाना पुलिस की मदद ली और वहां से भी चंद्रपुर की थाना पुलिस को फोन कराया।
अजय के खिलाफ कोई भी मामला दर्ज नहीं था, इसके बावजूद वहां की पुलिस ने खाता चालू नहीं कराया। 30 जनवरी 2025 को अजय ने अपने वकील राजवंत सिंह चहल की मदद से हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इसी याचिका पर अब खाता दोबारा चालू करने के आदेश आए हैं। अजय के अनुसार उनके खाते में एक लाख से अधिक रुपये जमा थे, जिन्हें वह जरूरत होने पर भी नहीं निकाल पा रहे थे।
केस स्टडी एक
अक्टूबर 2025 में में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था। एनआईटी में एक शख्स के साथ हुई 4.43 करोड़ की ठगी की वजह से 36 हजार खाते ब्लॉक कर दिए गए थे। यह खाते उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, मुंबई, बंगाल, गुजरात, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, मुंबई सहित अन्य कई राज्यों में रहने वाले लोगों के थे जिन्होंने एनआइटी साइबर थाने में फोन करके इस बारे में बताया था। जांच में सामने आया कि अधिकतर खाताधारकों को तो पता ही नहीं है कि जो उनके खाते में पैसे आए वह ठगी के हैं।
केस स्टडी दो
मुंबई से एक संदीप कुमार 12 नवंबर 2025 को एनआईटी थाने में आए। उन्होंने पुलिस को बताया कि उनकी मुंबई में कपड़ों की दुकान है। किसी ने कपड़े खरीदकर 2000 रुपये यूपीआई कर दिए।
कुछ दिन बाद उनका खाता ब्लॉक हो गया। यह मामला एनआइटी थाने में दर्ज था। वह यहां आए। पुलिस ने उनकी जांच की और खाता खुलवा दिया। इस दौरान संदीप को काफी दिन तक परेशान घूमना पड़ा। क्योंकि पूरा लेन-देन जिस खाते से होता था, वह बंद हो गया था।
शिकायत पर ब्लॉक हो जाते हैं खाते
एनआइटी थाना प्रभारी जितेंद्र कुमार के अनुसार साइबर ठगी होने पर लोग राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल कर देते हैं। इसके बाद गृह मंत्रालय द्वारा पीड़ित के साथ हुई ठगी की रकम जिस-जिस खाते में जाती है, उसे ब्लॉक कर दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि थाने में जो लोग आते हैं, उनके बारे में पूरी जानकारी लेकर उनके खाते खुलवा दिए जाते हैं। पीड़ितों की इस परेशानी को लेकर अपने मुख्यालय पत्र लिख चुके हैं।