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    लंदन की लैब से जींद के ट्रैक तक... 355 साल पुरानी खोज पर दौड़ी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, पढ़ें पूरा सफर

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 09:54 PM (IST)

    जींद से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू हो गया है, जो भारतीय रेलवे के लिए स्वच्छ ऊर्जा के नए युग की शुरुआत है। यह ट्रेन फ्यूल सेल तकनीक से ...और पढ़ें

    जींद से दौड़ी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन। फोटो जागरण

    जींद से दौड़ी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन। फोटो जागरण

    HighLights

    1. जींद से भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू।

    2. फ्यूल सेल तकनीक से चलती है, कार्बन उत्सर्जन नहीं होता।

    3. 355 साल की वैज्ञानिक खोज का परिणाम है यह तकनीक।

    अमित धवन, हिसार। जींद से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू होने के साथ भारतीय रेलवे ने स्वच्छ ऊर्जा के नए दौर में कदम रखा है। यह केवल नई ट्रेन की शुरुआत नहीं, बल्कि 355 साल पहले शुरू हुई वैज्ञानिक खोज की बड़ी उपलब्धि भी है।

    वर्ष 1671 में लंदन की प्रयोगशाला में पहली बार हाइड्रोजन बनने की प्रक्रिया सामने आई थी। आज यही गैस फ्यूल सेल तकनीक के जरिए बिजली बनाकर रेल इंजन को गति दे रही है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता और उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी बनता है। विशेषज्ञ इसे भविष्य के स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल ईंधन के रूप में देख रहे हैं।

    सफर 355 साल का ... खोज से तकनीक तक

    1671: ब्रिटिश वैज्ञानिक राबर्ट बायल ने धातु और अम्ल पर प्रयोगों के दौरान पहली बार हाइड्रोजन बनने की प्रक्रिया दर्ज की।
    1776: हेनरी कैवेंडिश ने सिद्ध किया कि हाइड्रोजन एक स्वतंत्र रासायनिक तत्व है और पानी से उसका वैज्ञानिक संबंध स्थापित किया।
    आज : यही खोज भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन ट्रेन के रूप में प्रयोगशाला से निकलकर ट्रैक तक पहुंच गई।

    जानें... हाइड्रोजन आखिर है क्या?

    रंगहीन, गंधहीन और सबसे हल्की गैस। अत्यंत ज्वलनशील होने के बावजूद नियंत्रित तकनीक में सुरक्षित ऊर्जा स्रोत। पानी, अनेक रासायनिक यौगिकों और मानव शरीर में भी हाइड्रोजन मौजूद रहती है। ऊर्जा उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन नहीं होने से इसे भविष्य का स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है।

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    पानी से ऐसे दौड़ती है ट्रेन

    पानी + इलेक्ट्रोलिसिस +→ हाइड्रोजन + फ्यूल सेल + बिजली +→ मोटर+ ट्रेन

    गुजविप्रौवि के रसायन विभागाध्यक्ष डॉ. सतबीर मोर के अनुसार पानी में विद्युत प्रवाहित कर हाइड्रोजन और आक्सीजन अलग की जाती हैं। फ्यूल सेल में दोनों की नियंत्रित रासायनिक प्रक्रिया से बिजली तैयार होती है, जिससे ट्रेन चलती है। यदि यह हाइड्रोजन नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार हो तो इसे ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है।

    सिर्फ ग्रीन ही नहीं, तीन तरह की होती है हाइड्रोजन

    ग्रीन: पानी के इलेक्ट्रोलिसिस और सौर-पवन ऊर्जा से तैयार, सबसे स्वच्छ।
    ब्लू : प्राकृतिक गैस से तैयार, कार्बन को अलग कर संग्रहित किया जाता है।
    ग्रे : जीवाश्म ईंधन से तैयार, इसमें कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक होता है।

    क्यों अलग है यह तकनीक?

    धुआं और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं। उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी बनता है। डीजल पर निर्भरता कम करने की क्षमता। रेल के साथ उद्योग और भारी परिवहन के लिए भी उपयोगी मानी जा रही है।

    क्या आप जानते हैं?

    हाइड्रोजन का नाम ग्रीक शब्द 'हाइड्रो' (पानी) और 'जीन' (बनाने वाला) से बना है। ब्रह्मांड में सबसे अधिक पाया जाने वाला तत्व हाइड्रोजन ही है। भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक का व्यावहारिक उपयोग शुरू हो चुका है। फ्यूल सेल में ऊर्जा बनने के बाद मुख्य रूप से केवल पानी निकलता है, इसलिए यह पर्यावरण अनुकूल तकनीक मानी जाती है।