हांसी के लाल का बॉक्सिंग में कमाल, सोरखी गांव के नरेंद्र बेरवाल ने जीता सिल्वर मेडल
हांसी के सोरखी गांव के मुक्केबाज नरेंद्र बेरवाल ने रियो ओलंपिक में सुपर हैवीवेट श्रेणी में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। ...और पढ़ें

मातृभूमि की छाती चौड़ी कर आया सोरखी का लाल (फाइल फोटो)
HighLights
नरेंद्र बेरवाल ने रियो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीता।
देसी दूध-घी की ताकत से बने फौलादी मुक्केबाज।
मां ने घर वापसी पर चूरमा-मूंग दाल खिलाने की तैयारी।
प्रदीप दुहन, हांसी। रिंग में जब 6 फीट 4 इंच का हांसी का गबरू उतरता है, तो सामने वाला मुक्केबाज पहले ही सहम जाता है। यह ताकत किसी डिब्बे वाले प्रोटीन पाउडर की नहीं, बल्कि सोरखी गांव के खेतों, मां के हाथों से मिले देसी दूध-घी और शुद्ध ग्रामीण आंचल के दूध-दही के खाने की है।
हरियाणा के नए नवेले जिले हांसी के सोरखी गांव के मुक्केबाज नरेंद्र बेरवाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रियो ओलंपिक में सुपर हैवीवेट श्रेणी में सिल्वर मेडल (रजत पदक) अपने नाम कर पूरे देश और प्रदेश की छाती गर्व से चौड़ी कर दी है।
भले ही फाइनल के बेहद कड़े और सांसें रोक देने वाले मुकाबले में नरेंद्र इंग्लैंड के अनुभवी मुक्केबाज से चूक गए और उन्हें सिल्वर से संतोष करना पड़ा, लेकिन सोरखी गांव की चौपाल से लेकर उनके घर तक जश्न और गर्व में कोई कमी नहीं है।
मुकाबले का वो आखिरी दौर केवल रिंग में नहीं, बल्कि सोरखी गांव में नरेंद्र के घर में भी लड़ा जा रहा था। टीवी स्क्रीन के सामने पूरा परिवार और आसपास के पड़ोसी सांसें थामे जमा थे।
सांसें रोके रहे पिता
पिता जगदीश बेरवाल की नजरें टीवी स्क्रीन पर टिकी हुई थीं। बेटे का हर एक पंच जब स्क्रीन पर पड़ता, तो पिता का दिल जोर से धड़क उठता। हाथ जोड़े बैठी रही मां:
टीवी स्क्रीन के बिल्कुल सामने माता रोशनी देवी दोनों हाथ जोड़कर आंखें बंद किए भगवान से अपने लाल की जीत की दुआएं मांग रही थीं।
खबरें और भी
पड़ोसियों का जमघट
मैच देखने के लिए पूरा मोहल्ला और पड़ोसी टीवी रूम में जुटे हुए थे। हर एक मुक्के पर जय हिंद और सोरखी का शेरा के नारे गूंज रहे थे।
शुरुआत से ही साईं एकेडमी का अनुशासन और देसी खुराक का जादू
मैच समाप्त होने के बाद जब दैनिक जागरण ने पिता जगदीश बेरवाल से बातचीत की, तो उनके चेहरे पर सिल्वर मेडल जीतने का अपार गर्व था। पिता ने पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि नरेंद्र को बचपन से ही मुक्केबाजी का जुनून था। उसकी लगन को देखते हुए शुरुआत में ही उसे साईं बाक्सिंग एकेडमी में दाखिल करवा दिया गया था।
एकेडमी के कड़े अनुशासन के साथ-साथ अगर आज नरेंद्र दुनिया के सबसे मजबूत मुक्केबाजों को धूल चटा रहा है, तो इसके पीछे हमारे घर की देसी दूध-घी की ताकत है। गांव के शुद्ध दूध और मक्खन ने ही उसके शरीर को फौलाद बनाया है।
मां खिलाएगी चूरमा और मूंग की दाल
भले ही नरेंद्र गोल्ड मेडल से थोड़े से अंतर से चूक गए हों, लेकिन मां रोशनी देवी के लिए उनका बेटा दुनिया का सबसे बड़ा विजेता है। बेटे की घर वापसी को लेकर मां बेहद भावुक हैं और उन्होंने अपने लाल के स्वागत का देसी मेन्यू अभी से तय कर लिया है।
माता रोशनी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा
मेरा बेटा इतने दिनों से विदेशी खाना खाकर देश के लिए लड़ रहा था। जब वो हांसी अपने घर सोरखी आएगा, तो उसके आते ही उसके लिए हाथ से कूटा हुआ देसी घी का चूरमा और उसकी पसंदीदा मूंग की दाल तैयार रखूंगी। अपने हाथों से चूरमा खिलाकर उसका मुंह मीठा कराऊंगी और उसकी नजर उतारूंगी।
सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले सोरखी के इस जांबाज बेटे की वतन वापसी पर पूरे हांसी जिले में एक भव्य विजय जुलूस और नागरिक अभिनंदन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।