नेताजी सुभाषचंद्र का हिसार से रहा है गहरा नाता, अकाल पीड़ितों का हाल जानने 2 दिन के दौरे पर आए थे बोस बाबू
नेताजी सुभाषचंद्र बोस का 1938 में हिसार दौरा अकाल पीड़ितों की स्थिति जानने और राहत कार्य को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी। उन्होंन ...और पढ़ें

हिसार से जुड़ी है नेताजी की अमर स्मृति। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, हिसार। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा…', का उद्घोष करने वाले महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस का हिसार से गहरा और भावनात्मक नाता रहा है। आजादी के इस नायक का दो दिवसीय हिसार प्रवास न केवल इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, बल्कि मानवीय संवेदना और राष्ट्रचिंतन का जीवंत उदाहरण भी है। सन् 1938 में अकाल पीड़ितों का हाल जानने के लिए नेताजी हिसार आए थे। यह यात्रा आज भी शहर की स्मृतियों में जीवित है।
अकाल पीड़ितों के बीच पहुंचे नेताजी, मानवता का दिया संदेश
28 नवंबर 1938 को लुधियाना–हिसार रेल मार्ग से नेताजी हिसार पहुंचे। कैंप चौक के नजदीक संयुक्त पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव के आवास पर वे कुछ घंटे ठहरे। हिसार दौरे पर वे अकाल की विभीषिका से जूझ रहे लोगों और पशुधन की स्थिति को स्वयं देखकर राहत और जागरूकता का मार्ग प्रशस्त करने आए थे। 29 नवंबर को वे रोहतक मार्ग से दिल्ली की ओर रवाना हुए।
कैंप चौक की प्रतिमा, हिसार से रिश्ते की गवाह
नेताजी की स्मृति को स्थायी स्वरूप देते हुए 23 जनवरी 1987 को कैंप चौक पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। यह प्रतिमा आज भी हिसार से उनके आत्मीय संबंध की गवाही देती है। प्रत्येक वर्ष 23 जनवरी को प्रशासन द्वारा यहां नेताजी की जयंती मनाई जाती है, जो नई पीढ़ी को देशभक्ति और सेवा की प्रेरणा देती है।
अनुमानित अकाल में 50 हजार मवेशियों की हुई थी मौत
उस दौर में हिसार क्षेत्र भीषण अकाल की चपेट में था। अनुमान के अनुसार करीब 50 हजार मवेशियों की मौत हुई थी। नेताजी ने कटला मैदान में स्वागत कार्यक्रम के बाद श्री राजगुरु मार्केट के पास हरियाणा कुरुक्षेत्र गोशाला क्षेत्र उसके अलावा गांव धान्सू, जुगलान और सातरोड गांवों का भ्रमण कर वास्तविक हालात का अवलोकन किया। यह उनकी संवेदनशीलता और कर्मठता का प्रमाण है।
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शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर नेताजी का जोर
इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि गांव सातरोड में लाला हरदेव सहाय द्वारा स्थापित शिल्पशाला में 29 नवंबर 1938 को नेताजी पहुंचे थे। यहां अक्षर ज्ञान के साथ बुनाई, कढ़ाई और मिट्टी की कारीगरी सिखाई जाती थी। नेताजी ने शिक्षा को आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखने की प्रेरणा दी, जो आज भी प्रासंगिक है।
भक्ति, शिक्षा और त्याग की अमर विरासत
नेताजी के विचारों की जीवंत प्रतिछाया उनके निकट रहे सुरक्षाकर्मी स्वर्गीय सुजान सिंह के जीवन में दिखाई देती है। आजाद हिंद फौज के सक्रिय सदस्य रहे सुजान सिंह तीन माह तक नेताजी के निजी सुरक्षा गार्ड रहे। हिसार के गांव हसनगढ़ निवासी, पेशे से शारीरिक शिक्षक सुजान सिंह ने आजादी के बाद शिक्षा को जीवन का ध्येय बनाया।
उनके पुत्र राजबीर सिंह बताते हैं कि नेताजी के विचारों से प्रेरित होकर उनके पिता ने गुरुकुलों के माध्यम से हिसार, सोनीपत और जींद सहित कई जिलों में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।