'27 साल बाद जब सुना बेटे का नाम...', कारगिल बलिदानियों के घर पहुंचीं बच्चों की चिट्ठियां तो ताजा हो गईं पुरानी यादें
दैनिक जागरण के 'वीर वंदन' अभियान के तहत हरियाणा के 15 जिलों में स्कूली बच्चों की चिट्ठियां कारगिल बलिदानियों के परिवारों तक पहुंच रही हैं। ...और पढ़ें
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स्कूली बच्चों की चिट्ठियों से कारगिल बलिदानियों के परिवारों की आंखें नम।
HighLights
दैनिक जागरण के 'वीर वंदन' अभियान से शहीदों को सम्मान
स्कूली बच्चों की चिट्ठियों ने कारगिल बलिदानियों के परिवारों को भावुक किया
नई पीढ़ी ने शहीदों के त्याग और शौर्य को याद किया
जागरण टीम, हिसार/पानीपत। दैनिक जागरण के 'आओ चिट्ठी लिखें: शब्दों के धागे अपनों के नाम' महाअभियान के वीर वंदन चरण में अब प्रदेश के 15 जिलों के कारगिल बलिदानियों के स्वजन तक विद्यार्थियों की लिखी चिट्ठियां पहुंचने लगी हैं। 85 विद्यालयों के 15,728 विद्यार्थियों की भावनाओं से भरे ये पातियां उन घरों तक पहुंचीं, जहां 26 वर्ष पहले देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों की स्मृतियां आज भी उतनी ही सजीव हैं।
इन चिट्ठियों ने केवल पुरानी यादों को ही नहीं जगाया, बल्कि यह भरोसा भी मजबूत किया कि नई पीढ़ी अपने वीरों के त्याग को सम्मान के साथ स्मरण कर रही है। पढ़िए, ऐसे ही कुछ भावुक पल...।
27 साल बाद चिट्ठी में फिर लौटा पवित्र का नाम
नारनौंद (हिसार): स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल वीर पवित्र सिंह के घर पहुंचीं तो उनकी मां खजानी देवी की आंखें नम हो गईं। उन्होंने बेटे सर्वित्र और प्रदीप से छात्रा की लिखी चिट्ठी पढ़वाई। 27 साल बाद चिट्ठी में बेटे का नाम सुनते ही वह भावुक हो उठीं। उन्होंने कहा कि एक मां के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या होगा कि आज भी प्रदेश के बच्चे उनके बेटे को याद कर रहे हैं।
कहा कि पहले चिट्ठियों से ही अपनों का हालचाल मिलता था। समय के साथ यह दौर पीछे छूट गया, लेकिन दैनिक जागरण के इस अभियान ने बीते दौर को फिर ताजा कर दिया। चिट्ठी पर बना तिरंगा देखते ही उन्हें वह दिन याद आ गया, जब उनका बेटा देश के काम आया था।
चिट्ठियों ने फिर सहेज दी 23 साल के बेटे की स्मृतियां
फरीदाबाद: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल बलिदानी मनोहर लाल के घर पहुंचीं तो मां हरकोरी देवी ने उन्हें बड़े जतन से संभाल लिया। उन्होंने कहा कि इन पत्रों ने 23 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले बेटे की स्मृतियों को फिर जीवंत कर दिया।
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मनोहर लाल ने 13 मई 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उनके छोटे भाई राजेश ने बताया कि सेना में भर्ती होने के मात्र चार वर्ष के भीतर मनोहर ने अपनी प्रतिभा के दम पर लेफ्टिनेंट पद की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी।
बच्चों के शब्द पढ़कर पूरा परिवार गर्व से भर उठा। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास बलिदानी परिवारों को यह विश्वास दिलाते हैं कि देश आज भी अपने वीरों को उसी सम्मान से याद करता है। परिवार की बेटी मनीषा ने कहा कि इन चिट्ठियों से बच्चों में भी राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की प्रेरणा मिलती है।
बच्चों की चिट्ठियों ने लौटा दी बेटे के खत की याद
सिरसा: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल बलिदानी राधेश्याम भाकर के घर पहुंचीं तो परिवार पुरानी यादों में खो गया। गांव बेगूंवाला निवासी राधेश्याम भाकर ने 24 वर्ष की आयु में 17 दिसंबर 1999 को कुपवाड़ा में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
पिता बेगराज भाकर ने बताया कि बेटे के बलिदान के बाद तेरहवीं के पांचवें दिन उसका अंतिम पत्र मिला था। उसमें उसने लिखा था कि वह कुपवाड़ा में तैनात है, घर की चिंता न करें और पत्र का जवाब जरूर दें। लेकिन तब तक उसकी तेरहवीं की रस्म चल रही थी, इसलिए उस आखिरी खत का जवाब नहीं दिया जा सका।
अब बच्चों की लिखी चिट्ठियां मिलीं तो वही पल फिर आंखों के सामने लौट आए। मां सरस्वती भाकर कभी बेटे की तस्वीर देखतीं तो कभी चिट्ठियों को। भाई अमीलाल और उनकी पत्नी सुमन ने भी बच्चे के हर शब्द को बड़े गौर से पढ़ा और कहा कि नई पीढ़ी का यह सम्मान परिवार के लिए सबसे बड़ी पूंजी है।
बच्चों की चिट्ठियों ने फिर लौटा दी प्रवेश की यादें
निसिंग/करनाल: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठी जब कारगिल बलिदानी राइफलमैन प्रवेश कुमार के घर पहुंची तो मां रामलेश देवी पुरानी स्मृतियों में खो गईं। बच्चों ने अपने पत्रों में उनके बेटे के साहस और बलिदान को नमन किया था। चिट्ठियां पढ़ते-पढ़ते उनकी नजरें उस वर्दी और जूते पर ठहर गईं, जिन्हें आज भी उन्होंने बड़े जतन से संभालकर रखा है।
उन्होंने कहा कि इन पत्रों ने बेटे की यादों को फिर से जीवंत कर दिया। मुकाबला गांव निवासी प्रवेश कुमार 18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। कारगिल युद्ध के दौरान 6 जून 1999 को दुश्मनों से लोहा लेते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनके सम्मान में गांव के राजकीय विद्यालय का नाम शहीद प्रवेश कुमार राजकीय विद्यालय रखा गया है। परिवार ने दैनिक जागरण की ओर से चलाए गए इस अभियान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि बच्चों की ये चिट्ठियां उनके लिए सम्मान की सबसे बड़ी धरोहर हैं और यह विश्वास दिलाती हैं कि नई पीढ़ी आज भी देश के वीरों को पूरे आदर से याद करती है।
चिट्ठियों ने ताजा कर दी छोटे भाई की याद, आंखें हो गईं नम
बरवाला/जींद: कारगिल विजय दिवस पर दैनिक जागरण के 'वीर वंदन' अभियान के तहत स्कूली बच्चों द्वारा लिखी चिट्ठियां गांव रावलोधी निवासी कारगिल बलिदानी नायक राजकुमार के बड़े भाई सुखबीर तक पहुंचीं तो वह भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि बच्चों के पत्र पढ़ते समय ऐसा लगा जैसे पूरा देश आज भी उनके छोटे भाई के सर्वोच्च बलिदान को याद कर रहा है।
नई पीढ़ी ने अपने शब्दों के माध्यम से जिस सम्मान और अपनत्व का परिचय दिया है, वह पूरे परिवार के लिए गर्व का विषय है। ऐसे अभियान बच्चों को देश के वीरों के शौर्य, त्याग और बलिदान से जोड़ने का काम करते हैं।
दैनिक जागरण का यह प्रयास केवल चिट्ठियां पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बलिदानियों के परिवारों तक समाज का सम्मान पहुंचाने का माध्यम भी बना है। परिवार ने इस पहल के लिए दैनिक जागरण और पत्र लिखने वाले सभी बच्चों का आभार जताया।
मासूम शब्दों ने भर दी वीरांगना की आंखें
बरवाला/जींद: दैनिक जागरण के 'वीर वंदन' अभियान के तहत स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां गांव गोकल निवासी कारगिल बलिदानी हवलदार लाल सिंह की पत्नी बिमला देवी तक पहुंचीं तो उनकी आंखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा कि हर शब्द में देश के वीरों के प्रति सम्मान और सच्चे देशभक्ति की भावना दिखाई देती है। उन्हें गर्व है कि युवा पीढ़ी कारगिल के वीरों के शौर्य और बलिदान को आज भी श्रद्धा से याद कर रही है। ऐसे प्रयास केवल बलिदानी परिवारों का सम्मान ही नहीं बढ़ाते, बल्कि युवाओं को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों से भी जोड़ते हैं।
पिता ने कहा- बच्चों के शब्दों में मिला सबसे बड़ा सम्मान
हंसी: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल हीरो जयवीर मलिक तक पहुंचीं तो वह वर्षों पुरानी स्मृतियों में खो गए। बच्चों ने पत्रों में उनके देश का असली हीरो बताते हुए लिखा कि उनके कदमों की बदौलत देश सुरक्षित है।
इन आत्मीय शब्दों को पढ़कर जयवीर मलिक ने कहा कि नई पीढ़ी का यह स्नेह और सम्मान उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। बच्चों की इन चिट्ठियों ने यह भरोसा और मजबूत किया है कि देश आज भी अपने वीरों के त्याग और साहस को नहीं भूला है। दैनिक जागरण का यह अभियान नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम और सैनिकों के प्रति सम्मान की भावना जगाने का सराहनीय प्रयास है।
चिट्ठियों ने लौटाया अधूरे वादे का अहसास
झज्जर: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल बलिदानी लांस नायक लीलाराम के घर पहुंचीं तो पत्नी तारा देवी (तारावती) की स्मृतियां 27 साल पीछे लौट गईं। उन्होंने बताया कि बलिदान से करीब 10 दिन पहले राजौरी सेक्टर से पति का पत्र आया था। उसमें लिखा था, "चिंता मत करना, 10 दिन में बदली बीकानेर हो जाएगी। फिर तुम और बच्चों को अपने साथ लेकर चलूंगा।"
लेकिन बदली के आदेश की जगह 27 जून 1999 को तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा। तारा देवी ने कहा कि बच्चों के पत्र पढ़कर वही आखिरी चिट्ठी फिर याद आ गई। गांव जहांगीरपुर निवासी लीलाराम 25 जून 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
उन्होंने बताया कि पति का बीकानेर ले जाने का वादा अधूरा रह गया, लेकिन वर्षों बाद दोनों बेटों ने बीकानेर जाकर पिता की उस अंतिम इच्छा को अपने तरीके से पूरा किया। तारा देवी ने कहा कि बच्चों की इन चिट्ठियों ने परिवार को यह विश्वास दिलाया है कि देश आज भी अपने वीरों के त्याग और बलिदान को पूरे सम्मान के साथ याद करता है।
बच्चों की चिट्ठियों ने फिर लौटा दिए सुखविंद्र के साथ बिताए पल
अंबाला: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल वीर हवलदार सुखविंद्र सिंह के घर पहुंचीं तो पली-पत्नी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि सुखविंद्र सिंह अपनी नवजात बेटी के साथ केवल 11 दिन ही बिता पाए थे।
इसके बाद वह ड्यूटी पर लौट गए और फिर कभी घर नहीं आ सके। बच्चों के पत्रों ने परिवार के सामने वही स्मृतियां फिर ताजा कर दीं। 15 पंजाब रेजिमेंट के हवलदार सुखविंद्र सिंह ने कुपवाड़ा के मचल सेक्टर में देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
जसबीर कौर ने कहा कि नई पीढ़ी का यह सम्मान परिवार के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। बच्चों की इन चिट्ठियों ने यह भरोसा और मजबूत किया है कि देश आज भी अपने वीरों के त्याग और बलिदान को पूरे सम्मान के साथ याद करता है।
जागरण टीम, हिसार/पानीपत। दैनिक जागरण के 'आओ चिट्ठी लिखें: शब्दों के धागे अपनों के नाम' महाअभियान के वीर वंदन चरण में अब प्रदेश के 15 जिलों के कारगिल बलिदानियों के स्वजन तक विद्यार्थियों की लिखी चिट्ठियां पहुंचने लगी हैं। 85 विद्यालयों के 15,728 विद्यार्थियों की भावनाओं से भरे ये पातियां उन घरों तक पहुंचीं, जहां 26 वर्ष पहले देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों की स्मृतियां आज भी उतनी ही सजीव हैं।
इन चिट्ठियों ने केवल पुरानी यादों को ही नहीं जगाया, बल्कि यह भरोसा भी मजबूत किया कि नई पीढ़ी अपने वीरों के त्याग को सम्मान के साथ स्मरण कर रही है। पढ़िए, ऐसे ही कुछ भावुक पल...।
27 साल बाद चिट्ठी में फिर लौटा पवित्र का नाम
नारनौंद (हिसार): स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल वीर पवित्र सिंह के घर पहुंचीं तो उनकी मां खजानी देवी की आंखें नम हो गईं। उन्होंने बेटे सर्वित्र और प्रदीप से छात्रा की लिखी चिट्ठी पढ़वाई। 27 साल बाद चिट्ठी में बेटे का नाम सुनते ही वह भावुक हो उठीं। उन्होंने कहा कि एक मां के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या होगा कि आज भी प्रदेश के बच्चे उनके बेटे को याद कर रहे हैं।
कहा कि पहले चिट्ठियों से ही अपनों का हालचाल मिलता था। समय के साथ यह दौर पीछे छूट गया, लेकिन दैनिक जागरण के इस अभियान ने बीते दौर को फिर ताजा कर दिया। चिट्ठी पर बना तिरंगा देखते ही उन्हें वह दिन याद आ गया, जब उनका बेटा देश के काम आया था।
चिट्ठियों ने फिर सहेज दी 23 साल के बेटे की स्मृतियां
फरीदाबाद: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल बलिदानी मनोहर लाल के घर पहुंचीं तो मां हरकोरी देवी ने उन्हें बड़े जतन से संभाल लिया। उन्होंने कहा कि इन पत्रों ने 23 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले बेटे की स्मृतियों को फिर जीवंत कर दिया।
मनोहर लाल ने 13 मई 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उनके छोटे भाई राजेश ने बताया कि सेना में भर्ती होने के मात्र चार वर्ष के भीतर मनोहर ने अपनी प्रतिभा के दम पर लेफ्टिनेंट पद की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी।
बच्चों के शब्द पढ़कर पूरा परिवार गर्व से भर उठा। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास बलिदानी परिवारों को यह विश्वास दिलाते हैं कि देश आज भी अपने वीरों को उसी सम्मान से याद करता है। परिवार की बेटी मनीषा ने कहा कि इन चिट्ठियों से बच्चों में भी राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की प्रेरणा मिलती है।
बच्चों की चिट्ठियों ने लौटा दी बेटे के खत की याद
सिरसा: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल बलिदानी राधेश्याम भाकर के घर पहुंचीं तो परिवार पुरानी यादों में खो गया। गांव बेगूंवाला निवासी राधेश्याम भाकर ने 24 वर्ष की आयु में 17 दिसंबर 1999 को कुपवाड़ा में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
पिता बेगराज भाकर ने बताया कि बेटे के बलिदान के बाद तेरहवीं के पांचवें दिन उसका अंतिम पत्र मिला था। उसमें उसने लिखा था कि वह कुपवाड़ा में तैनात है, घर की चिंता न करें और पत्र का जवाब जरूर दें। लेकिन तब तक उसकी तेरहवीं की रस्म चल रही थी, इसलिए उस आखिरी खत का जवाब नहीं दिया जा सका।
अब बच्चों की लिखी चिट्ठियां मिलीं तो वही पल फिर आंखों के सामने लौट आए। मां सरस्वती भाकर कभी बेटे की तस्वीर देखतीं तो कभी चिट्ठियों को। भाई अमीलाल और उनकी पत्नी सुमन ने भी बच्चे के हर शब्द को बड़े गौर से पढ़ा और कहा कि नई पीढ़ी का यह सम्मान परिवार के लिए सबसे बड़ी पूंजी है।
बच्चों की चिट्ठियों ने फिर लौटा दी प्रवेश की यादें
निसिंग/करनाल : स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठी जब कारगिल बलिदानी राइफलमैन प्रवेश कुमार के घर पहुंची तो मां रामलेश देवी पुरानी स्मृतियों में खो गईं। बच्चों ने अपने पत्रों में उनके बेटे के साहस और बलिदान को नमन किया था। चिट्ठियां पढ़ते-पढ़ते उनकी नजरें उस वर्दी और जूते पर ठहर गईं, जिन्हें आज भी उन्होंने बड़े जतन से संभालकर रखा है।
उन्होंने कहा कि इन पत्रों ने बेटे की यादों को फिर से जीवंत कर दिया। मुकाबला गांव निवासी प्रवेश कुमार 18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। कारगिल युद्ध के दौरान 6 जून 1999 को दुश्मनों से लोहा लेते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनके सम्मान में गांव के राजकीय विद्यालय का नाम शहीद प्रवेश कुमार राजकीय विद्यालय रखा गया है। परिवार ने दैनिक जागरण की ओर से चलाए गए इस अभियान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि बच्चों की ये चिट्ठियां उनके लिए सम्मान की सबसे बड़ी धरोहर हैं और यह विश्वास दिलाती हैं कि नई पीढ़ी आज भी देश के वीरों को पूरे आदर से याद करती है।
चिट्ठियों ने ताजा कर दी छोटे भाई की याद, आंखें हो गईं नम
बरवाला/जींद : कारगिल विजय दिवस पर दैनिक जागरण के 'वीर वंदन' अभियान के तहत स्कूली बच्चों द्वारा लिखी चिट्ठियां गांव रावलोधी निवासी कारगिल बलिदानी नायक राजकुमार के बड़े भाई सुखबीर तक पहुंचीं तो वह भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि बच्चों के पत्र पढ़ते समय ऐसा लगा जैसे पूरा देश आज भी उनके छोटे भाई के सर्वोच्च बलिदान को याद कर रहा है।
नई पीढ़ी ने अपने शब्दों के माध्यम से जिस सम्मान और अपनत्व का परिचय दिया है, वह पूरे परिवार के लिए गर्व का विषय है। ऐसे अभियान बच्चों को देश के वीरों के शौर्य, त्याग और बलिदान से जोड़ने का काम करते हैं।
दैनिक जागरण का यह प्रयास केवल चिट्ठियां पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बलिदानियों के परिवारों तक समाज का सम्मान पहुंचाने का माध्यम भी बना है। परिवार ने इस पहल के लिए दैनिक जागरण और पत्र लिखने वाले सभी बच्चों का आभार जताया।
मासूम शब्दों ने भर दी वीरांगना की आंखें
बरवाला/जींद : दैनिक जागरण के 'वीर वंदन' अभियान के तहत स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां गांव गोकल निवासी कारगिल बलिदानी हवलदार लाल सिंह की पत्नी बिमला देवी तक पहुंचीं तो उनकी आंखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा कि हर शब्द में देश के वीरों के प्रति सम्मान और सच्चे देशभक्ति की भावना दिखाई देती है। उन्हें गर्व है कि युवा पीढ़ी कारगिल के वीरों के शौर्य और बलिदान को आज भी श्रद्धा से याद कर रही है। ऐसे प्रयास केवल बलिदानी परिवारों का सम्मान ही नहीं बढ़ाते, बल्कि युवाओं को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों से भी जोड़ते हैं।
पिता ने कहा- बच्चों के शब्दों में मिला सबसे बड़ा सम्मान
हंसी: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल हीरो जयवीर मलिक तक पहुंचीं तो वह वर्षों पुरानी स्मृतियों में खो गए। बच्चों ने पत्रों में उनके देश का असली हीरो बताते हुए लिखा कि उनके कदमों की बदौलत देश सुरक्षित है।
इन आत्मीय शब्दों को पढ़कर जयवीर मलिक ने कहा कि नई पीढ़ी का यह स्नेह और सम्मान उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। बच्चों की इन चिट्ठियों ने यह भरोसा और मजबूत किया है कि देश आज भी अपने वीरों के त्याग और साहस को नहीं भूला है। दैनिक जागरण का यह अभियान नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम और सैनिकों के प्रति सम्मान की भावना जगाने का सराहनीय प्रयास है।
चिट्ठियों ने लौटाया अधूरे वादे का अहसास
झज्जर: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल बलिदानी लांस नायक लीलाराम के घर पहुंचीं तो पत्नी तारा देवी (तारावती) की स्मृतियां 27 साल पीछे लौट गईं। उन्होंने बताया कि बलिदान से करीब 10 दिन पहले राजौरी सेक्टर से पति का पत्र आया था। उसमें लिखा था, "चिंता मत करना, 10 दिन में बदली बीकानेर हो जाएगी। फिर तुम और बच्चों को अपने साथ लेकर चलूंगा।"
लेकिन बदली के आदेश की जगह 27 जून 1999 को तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा। तारा देवी ने कहा कि बच्चों के पत्र पढ़कर वही आखिरी चिट्ठी फिर याद आ गई। गांव जहांगीरपुर निवासी लीलाराम 25 जून 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
उन्होंने बताया कि पति का बीकानेर ले जाने का वादा अधूरा रह गया, लेकिन वर्षों बाद दोनों बेटों ने बीकानेर जाकर पिता की उस अंतिम इच्छा को अपने तरीके से पूरा किया। तारा देवी ने कहा कि बच्चों की इन चिट्ठियों ने परिवार को यह विश्वास दिलाया है कि देश आज भी अपने वीरों के त्याग और बलिदान को पूरे सम्मान के साथ याद करता है।
बच्चों की चिट्ठियों ने फिर लौटा दिए सुखविंद्र के साथ बिताए पल
अंबाला: स्कूली बच्चों की लिखी चिट्ठियां जब कारगिल वीर हवलदार सुखविंद्र सिंह के घर पहुंचीं तो पली-पत्नी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि सुखविंद्र सिंह अपनी नवजात बेटी के साथ केवल 11 दिन ही बिता पाए थे।
इसके बाद वह ड्यूटी पर लौट गए और फिर कभी घर नहीं आ सके। बच्चों के पत्रों ने परिवार के सामने वही स्मृतियां फिर ताजा कर दीं। 15 पंजाब रेजिमेंट के हवलदार सुखविंद्र सिंह ने कुपवाड़ा के मचल सेक्टर में देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
जसबीर कौर ने कहा कि नई पीढ़ी का यह सम्मान परिवार के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। बच्चों की इन चिट्ठियों ने यह भरोसा और मजबूत किया है कि देश आज भी अपने वीरों के त्याग और बलिदान को पूरे सम्मान के साथ याद करता है।