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    1000 लड़कों पर 1500 लड़कियां! कैथल के दो गांवों की अनोखी नजीर, हर कोई सरकारी स्कूल में भेज रहा अपने बच्चे

    Updated: Thu, 23 Jul 2026 05:09 PM (IST)

    कैथल के सौंगरी और गुलियाणा गांव 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान को शिक्षा के माध्यम से साकार कर रहे हैं। ग्रामीणों के 30 लाख से अधिक के योगदान से स्कूल ...और पढ़ें

    कैथल के सरकारी स्कूल में पढ़े 300 से अधिक लोग पुलिस व सेना में बने जवान।

    कैथल के सरकारी स्कूल में पढ़े 300 से अधिक लोग पुलिस व सेना में बने जवान।

    HighLights

    1. ग्रामीणों ने स्कूल विकास में 30 लाख रुपये से अधिक का योगदान दिया

    2. स्कूल में छात्राओं की भागीदारी 55% तक बढ़ी, विद्यार्थी संख्या दोगुनी

    3. सौंगरी-गुलियाणा में लिंगानुपात में उल्लेखनीय सुधार, बेटियों को बचाया जा रहा

    रोहताश शर्मा, कैथल। हरियाणा के पानीपत से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2015 में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का जो संदेश दिया था, कैथल के सौंगरी और गुलियाणा गांव उसे पूरी प्रतिबद्धता के साथ साकार करते दिखाई देते हैं। यहां बेटियों को सुरक्षित भविष्य देने का सबसे मजबूत माध्यम शिक्षा को बनाया गया है।

    यही वजह है कि ग्रामीणों ने क्षेत्र के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल, सोंगरी-गुलियाणा को संवारने के लिए अब तक 30 लाख रुपये से अधिक का योगदान दिया है। इसका परिणाम यह निकला कि विद्यालय में पांच साल में छात्राओं की भागीदारी 55 प्रतिशत तक पहुंच गई है और विद्यार्थियों की संख्या 294 से बढ़कर 651 हो गई।

    इतना ही नहीं, विद्यालय ने आईएएस, चिकित्सक, एसडीओ, प्राध्यापक, इंस्पेक्टर और प्रधानाचार्य जैसे अधिकारी तो दिए ही हैं, साथ कही करीब 300 सैनिक और पुलिस जवान भी देश को सौंपे हैं। इनमें लगभग 100 बेटियां विभिन्न पदों पर आसीन हैं। ये सभी भी इसके विकास के लिए योगदान दे रहे हैं। इस बीच सोच बदलने से लिंगानुपात भी बदला है।

    आंकड़े बताते हैं कि अब लड़कियों को बचाया भी जा रहा है। गुलियाना का पिछले छह माह का लिंगानुपात एक हजार लड़कों के पीछे 1500 लड़कियां हैं। इसी तरह सौंगरी का लिंगानुपात एक हजार लड़कों के पीछे 1429 लड़कियां हैं।

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    यह साफ है कि ग्रामीण बेटियां बचा भी रहे हैं और उन्हें पढ़ा भी रहे हैं। ऐसे में यह मॉडल बताता है कि समाज जब दायित्व अपने हाथ में लेता है तो बेटियां बचाई भी जाती हैं और पढ़ाई भी जाती। इतना ही नहीं, आगे भी बढ़ाई जाती हैं।

    इस बदलाव की शुरुआत वर्ष 2016-17 में हुई। उस समय आसपास के करीब 10 किलोमीटर क्षेत्र में बेटियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का बेहतर विकल्प नहीं था। हिंदी प्राध्यापक दीपक राविश, कार्यकारी प्रिंसिपल कुलदीप बिढ़ान और संस्कृत शिक्षक राजकुमार की पहल पर शिक्षा समिति बनाई गई। इसमें दोनों ग्राम पंचायतों, पूर्व शिक्षाविदों और ग्रामीणों को जोड़ा गया।

    सतपाल कौशिक को समिति का अध्यक्ष और वेदप्रकाश को उपाध्यक्ष बनाया गया। डॉ. नरेंद्र, नसीब, मंदीप, राजेश सहित 15 सदस्य इसमें शामिल किए गए। सबसे पहले विद्यार्थियों की घटती संख्या के कारणों पर मंथन हुआ। पंचायतों के सहयोग से शिक्षकों की कमी दूर की गई।

    नए कमरों का निर्माण कराया गया और फिर घर-घर जाकर अभिभावकों को सरकारी विद्यालय की गुणवत्ता से परिचित कराया गया। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा लौटा और विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ती गई। इसी का परिणाम है कि आज विद्यालय में छात्राओं की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत तक हो गई है।

    इस तरह लोगों ने दिया सहयोग

    विद्यालय के विकास में ग्रामीणों ने दिल खोलकर सहयोग किया। शिक्षकों और ग्रामीणों ने मिलकर करीब 11 लाख रुपये की लागत से भव्य प्रवेश द्वार बनवाया। ईश्वर रापड़िया ने 11 लाख रुपये की लागत से एक विशाल हाल बनवाया, जबकि पूर्व प्रिंसिपल रामकरण शर्मा ने पांच लाख रुपये से एक कमरा बनवाया। विद्यालय में जब भी किसी नई सुविधा की जरूरत होती है, ग्रामीण तुरंत आर्थिक सहयोग के लिए आगे आ जाते हैं। यही कारण है कि संसाधनों की कमी कभी विकास में बाधा नहीं बनी।

    शत-प्रतिशत रहा परिणाम

    विद्यालय की सबसे बड़ी ताकत उस पर समाज का भरोसा है। यहां पढ़ाने वाले कई अध्यापकों के अपने बच्चे भी इसी विद्यालय में पढ़ते हैं। गांव के सरपंच और मार्केट कमेटी चेयरमैन ने भी अपने बच्चों के लिए इसी स्कूल को चुना है। अधिकांश शिक्षकों के पद भरे हुए हैं। 10वीं और 12वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम लगातार शत-प्रतिशत रहा है और इस वर्ष भी विद्यार्थियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है।

    40 से अधिक विद्यार्थी मेडल हासिल कर चुके

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    पढ़ाई के साथ खेलों में भी विद्यालय लगातार पहचान बना रहा है। यहां कबड्डी और फेंसिंग की विशेष नर्सरी संचालित की जा रही है। साइक्लिंग और एथलेटिक्स में भी विद्यार्थी राज्य स्तर पर पदक जीत चुके हैं। विभिन्न प्रतियोगिताओं में 40 से अधिक विद्यार्थी मेडल हासिल कर चुके हैं।

    विद्यालय से पढ़े विद्यार्थी आज आईएएस, चिकित्सक, कालेज प्राध्यापक, एसडीओ, इंस्पेक्टर, प्रधानाचार्य और मुख्याध्यापक जैसे पदों पर कार्यरत हैं। करीब 300 युवा सेना और पुलिस में सेवाएं दे रहे हैं। नौकरी पाने वाले अनेक पूर्व विद्यार्थी भी विद्यालय के विकास में आर्थिक सहयोग करते हैं।

    वर्ष 1932 में पांचवीं तक के विद्यालय के रूप में शुरू हुए इस संस्थान की नींव भी ग्रामीणों के सहयोग से रखी गई थी। उस समय भी ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर कमरे बनवाए थे। वर्ष 1959 में इसे 10वीं कक्षा तक अपग्रेड किया गया और संयुक्त पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने स्वयं गांव पहुंचकर इसका उद्घाटन किया था।

    आज यह विद्यालय स्वच्छ विद्यालय प्रतियोगिता में खंड स्तर पर प्रथम और जिला स्तर पर द्वितीय स्थान प्राप्त कर चुका है। परिसर में स्वच्छता, शौचालयों की साफ-सफाई और सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था भी की गई है।

    शिक्षा समिति, अध्यापक और ग्रामीण मिलकर टीम भावना से काम कर रहे हैं। इसी कारण स्कूल में शिक्षा का उत्कृष्ट माहौल बना है और विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। -रमेश कुमार, प्रिंसिपल

    'मैं 12 कक्षा तक राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल सोंगरी-गुलियाणा में पढ़ा। यहां पर शुरू से ही पढ़ाई का माहौल बहुत अच्छा रहा है। पढ़ाई को लेकर यहां पर छात्र-छात्राओं में कंपीटीशन रहता है। स्कूल के टीचर बहुत  मेहनत करते हैं। सोंगरी और गुलियाणा गांवों के लोगों का भी बहुत ज्यादा सहयोग रहता है, जब भी स्कूल में कमरे की जरूरत है या किसी अन्य सामान की, गांव के लोग सरकारी ग्रांट का भी इंतजार नहीं करते।  स्वयं सहयोग करते हैं। अध्यापक ग्रामीणों से जो भी मांग करते हैं, तुरंत पूरी कर दी जाती है। पढ़ाई के लिए सकारत्मक माहौल बना हुआ है, इसका गांव के छात्र-छात्राओं को बहुत लाभ मिल रहा है।' -राममेहर सिंह,  सहायक प्रोफेसर,  राजकीय कॉलेज,   राजौंद।

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