मध्य प्रदेश के बासमती GI टैग पर मचा घमासान, हरियाणा समेत सात राज्यों ने किया विरोध; क्या है वजह?
मध्य प्रदेश के 14 जिलों को बासमती चावल का जीआई टैग देने का दिल्ली, हरियाणा सहित सात राज्यों के मिलर्स विरोध कर रहे हैं। ...और पढ़ें

मध्य प्रदेश के बासमती GI टैग पर मचा घमासान (फाइल फोटो)
HighLights
मध्य प्रदेश के बासमती को जीआई टैग का विरोध
पारंपरिक उत्पादकों को नुकसान, बाजार में अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा का डर
पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय अदालतों में भारत के खिलाफ मौका
प्रदीप शर्मा, करनाल। मध्य प्रदेश के 14 जिलों के बासमती चावल को जीआई टैग देने को लेकर माहौल गर्म हो गया है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर के मिलर्स मामले को लेकर एपीडा (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) के समक्ष पक्ष रख चुके हैं। इन्होंने मध्य प्रदेश को जीआई टैग देने का विरोध किया है। पारंपरिक बासमती उत्पादक इस मांग का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
जन 2026 में केंद्र सरकार की एजेंसी एपीडा द्वारा नई कानूनी फर्म की नियुक्ति के बाद विवाद गहरा गया है। मिलर्स का कहना है कि जो लॉ फर्म नियुक्त की गई है, पूर्व में वह एमपी सरकार में काम कर चुके हैं, ऐसे में पक्षपात हो सकता है।
क्यों हो रहा है मध्य प्रदेश के दावे का विरोध?
पारंपरिक रूप से बासमती चावल का जीआई टैग भारत के इंडो-गैंगेटिक प्लेन (सिंधु-गंगा के मैदानी भाग) को मिला हुआ है, जिसमें हरियाणा और पंजाब शीर्ष पर हैं। कृषि वैज्ञानिकों और राइस मिलर्स एसोसिएशन का तर्क है कि बासमती केवल एक बीज नहीं है, बल्कि यह इस विशेष क्षेत्र की मिट्टी, पानी और अनुकूल जलवायु की अनूठी देन है, जो इसे अपनी खास खुशबू और स्वाद देते हैं।
मिलर्स का कहना है कि मध्य प्रदेश में जमीनें बड़ी हैं और वहां खेती की लागत हरियाणा की तुलना में काफी कम है। यदि मध्य प्रदेश के चावल को भी बासमती के प्रीमियम नाम से वैश्विक बाजार में बेचने की अनुमति मिल गई, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा अस्वस्थ हो जाएगी। इससे करनाल बेल्ट के बासमती की मांग और दाम दोनों धड़ाम से गिर जाएंगे।
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जीआई टैग के इस विवाद के साथ-साथ व्यापारी पहले से ही सख्त मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस की मार झेल रहे हैं। ऊंचे निर्यात मूल्य के कारण खाड़ी और यूरोपीय देशों के खरीदार दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं, जिससे मंडियों में पुराना स्टाक जमा हो रहा है।
पाकिस्तान से मिल रही कड़ी चुनौती
इस विवाद का एक दूसरा बड़ा पहलू अंतरराष्ट्रीय साख का है। भारतीय निर्यातकों का तर्क है कि अगर भारत ने अपने मूल भौगोलिक क्षेत्र से बाहर मध्य प्रदेश को यह टैग दे दिया, तो पाकिस्तान को यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में भारत के खिलाफ केस मजबूत करने का मौका मिल जाएगा। पाकिस्तान यह मुद्दा उठा सकता है कि भारत खुद अपने भौगोलिक मानकों का पालन नहीं कर रहा है, जिससे भारतीय बासमती का पूरा वैश्विक निर्यात संकट में पड़ सकता है।
हरियाणा राइस एक्सपोर्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील जैन का कहना है कि यदि बासमती के भौगोलिक क्षेत्र (जीआई जोन) के साथ कोई भी समझौता किया गया, तो यह धान के कटोरे के नाम से मशहूर हरियाणा की इस बेल्ट के पूरे कृषि अर्थशास्त्र को तबाह कर देगा। सरकार को पारंपरिक राज्यों के हितों की रक्षा करनी ही होगी।