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    'अपराधिक केस में बरी होने से विभागीय जांच खत्म नहीं होती', पूर्व अधिकारी की याचिका पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 01:12 PM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कीटनाशक खरीद में अनियमितता के मामले में पूर्व उपनिदेशक प्रताप सिंह सभरवाल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को बरकरार रखा है। ...और पढ़ें

    पूर्व अधिकारी की याचिका पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला (फाइल फोटो)

    पूर्व अधिकारी की याचिका पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला (फाइल फोटो)

    राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के पूर्व उपनिदेशक प्रताप सिंह सभरवाल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को बरकरार रखते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में दर्ज निष्कर्षों की पुनरावलोकन करना हाई कोर्ट का कार्य नहीं है। इसके साथ ही, तकनीकी आधार पर आपराधिक मुकदमे में बरी होने से विभागीय कार्रवाई स्वत समाप्त नहीं होती।

    जस्टिस निधि गुप्ता ने यह निर्णय उस याचिका पर सुनाया, जिसमें वर्ष 2020 के दंडादेश और वर्ष 2016 की विभागीय जांच रिपोर्ट को रद्द करने की मांग की गई थी। विभाग ने प्रताप सिंह सभरवाल पर एक वेतन वृद्धि पर रोक लगाने की सजा लगाई थी।

    याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उन्होंने कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में लगभग 30 वर्ष तक सेवा दी है और वर्ष 2012 में भिवानी में तैनाती के दौरान उनके खिलाफ विभागीय आरोपपत्र जारी किया गया था। उनका कहना था कि जिन आरोपों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया गया, वे तथ्यहीन हैं।

    उदाहरण के तौर पर, उन्होंने कहा कि विभाग ने मेलाथियान 50 प्रतिशत ईसी की खरीद 210 रुपये प्रति लीटर की दर से करने को अनियमित माना, जबकि हरियाणा के अन्य जिलों में यही कीटनाशक 200 से 230 रुपये प्रति लीटर तक खरीदा गया था।

    इसी प्रकार नीमिन सेडिन की खरीद को लेकर भी गलत तुलना की गई। उन्होंने यह भी तर्क किया कि आपराधिक मामले में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था और विभाग के महानिदेशक ने भी कार्रवाई समाप्त करने की सिफारिश की थी।

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    हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच में पाया गया कि मेलाथियान 50 प्रतिशत ईसी बाजार में 140 रुपये प्रति लीटर उपलब्ध था, जबकि याचिकाकर्ता ने इसे 210 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदकर सरकारी खजाने को लगभग 1.40 लाख रुपये का नुकसान पहुंचाया।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को आपराधिक मुकदमे में तकनीकी आधार पर राहत मिली थी, जो विभागीय कार्रवाई पर कोई प्रभाव नहीं डालती। इन सभी कारणों से हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।