सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी को नहीं मिली जमानत, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म, अपहरण और धमकी के आरोपी साजिद को जमानत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे जघन्य अपराध समाज ...और पढ़ें

हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी को नहीं दी जमानत। सांकेतिक फोटो
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म, अपहरण और धमकी जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे साजिद को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह के जघन्य अपराध केवल व्यक्ति के खिलाफ नहीं होते, बल्कि पूरे समाज की शांति, सुरक्षा और नैतिकता पर गहरा आघात करते हैं।
कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में केवल लंबे समय तक जेल में रहने का आधार जमानत के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। जस्टिस नीरजा के कलसन ने आरोपित साजिद की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। इस मामले में थाना हथीन, जिला पलवल में दर्ज एफआईआर दर्ज की गई थी।
मामले के अनुसार 05 जुलाई 2023 को शिकायतकर्ता की बहन खेतों में चारा लेने गई थी, लेकिन घर वापस नहीं लौटी। परिजनों द्वारा तलाश के बाद पुलिस को सूचना दी गई। पीड़िता करीब 38 दिन बाद 12 अगस्त 2023 को हथीन बस स्टैंड से बरामद हुई, जहां से साजिद को भी उसी दिन गिरफ्तार किया गया।
पीड़िता ने अपने बयानों में बताया कि उसे किसी पदार्थ को सुंघा कर बेहोश किया गया और साजिद व उसके एक साथी वसीम ने उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद उसे मोटरसाइकिल पर पलवल ले जाया गया और जान से मारने की धमकी दी गई।
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पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में अन्य व्यक्तियों ने भी उसका यौन शोषण किया।बचाव पक्ष ने दलील दी कि पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली और एफएसएल रिपोर्ट में वीर्य के ठोस प्रमाण नहीं हैं। साथ ही कहा गया कि पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है।
मगर कोर्ट ने कहा कि ये सभी पहलू ट्रायल के दौरान ही परखे जाएंगे, जमानत के स्तर पर इनका सूक्ष्म विश्लेषण उचित नहीं है। बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि साजिद पिछले दो साल और पांच महीने से हिरासत में है।
राज्य के वकील ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता के आरोप स्पष्ट और सुसंगत हैं। उन्होंने दलील दी कि सह-आरोपी की गिरफ्तारी अभी बाकी है और अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
न्यायालय ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जमानत के चरण में साक्ष्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन या ''मिनी-ट्रायल'' नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा आरोपित लंबे समय से जेल में है, लेकिन अपराध की गंभीरता के सामने इसे आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी को रिहा करने से गवाहों के प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। अदालत ने माना कि पीड़िता के बयान प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मजबूत आधार प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में उसे रिहा करना पीड़िता की सुरक्षा और समाज के हितों के खिलाफ होगा।
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल धीमी गति से चल रहा है। इसलिए निचली अदालत को निर्देश दिए गए हैं कि शेष गवाहों, विशेषकर पीड़िता के माता-पिता और अन्य स्वतंत्र गवाहों के बयान शीघ्र दर्ज किए जाएं और तीन माह के भीतर अभियोजन साक्ष्य पूरा किया जाए।