लिव-इन में रह रहे मेवात के पहले से शादीशुदा जोड़े को हाई कोर्ट की नसीहत, 'घर जाकर चार बच्चों पर ध्यान दो'
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मेवात के एक शादीशुदा लिव-इन जोड़े की सुरक्षा याचिका खारिज कर दी। ...और पढ़ें

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो
HighLights
हाई कोर्ट ने लिव-इन जोड़े की सुरक्षा याचिका खारिज की
अदालत ने बच्चों के लिए आरडी खाते खुलवाने का आदेश दिया
जोड़े को अपने-अपने घरों में लौटकर बच्चों पर ध्यान देने को कहा
दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अनोखे आदेश में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे मेवात (नूंह) के एक पहले से शादीशुदा जोड़े की जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा संबंधी याचिका को खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि पहले से शादीशुदा इस जोड़े को अपने-अपने घरों में लौटकर पहले से मौजूद अपने बच्चों के भविष्य पर ध्यान देना चाहिए।
अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं को अपने-अपने पूर्व वैवाहिक संबंधों से जन्मे चारों बच्चों के नाम आवर्ती जमा (रिकरिंग डिपाजिट-आरडी) खाते खुलवाने और प्रत्येक खाते में एक वर्ष तक हर महीने कम से कम पांच-पांच हजार रुपये जमा कराने के निर्देश दिए।
जस्टिस आलोक जैन ने स्पष्ट किया कि यह याचिका तो भारी जुर्माने के साथ खारिज किए जाने योग्य थी, लेकिन 'न्यायहित तथा नाबालिग बच्चों के कल्याण' को ध्यान में रखते हुए जुर्माना लगाने की बजाय यह वित्तीय निर्देश जारी किया जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में गुहार लगाई थी कि वे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और उन्हें जान-माल का खतरा है। उन्होंने 26 जून को संबंधित अधिकारियों को दिए गए अपने प्रार्थना पत्र पर कार्रवाई नहीं होने का हवाला देते हुए जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों याचिकाकर्ता पहले से अन्य से विवाहित थे। पुरुष के अपनी पत्नी से तीन बच्चे हैं, जबकि महिला के अपने पति से एक बच्चा है।
चार बच्चों का भविष्य दांव पर: हाई कोर्ट
अदालत ने कहा कि चार बच्चों का भविष्य भी दांव पर लगा हुआ है। याचिकाकर्ताओं पर इन बच्चों के कल्याण और भविष्य को सुनिश्चित करने की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है, लेकिन वर्तमान मामले में उनके आचरण से ऐसी जिम्मेदारी परिलक्षित नहीं होती।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका में कई महत्वपूर्ण तथ्यों के अभाव पर भी गंभीर टिप्पणी की। पुरुष याचिकाकर्ता की पत्नी की मृत्यु संबंधी दावे पर न्यायालय ने कहा कि बार-बार और स्पष्ट पूछे जाने के बावजूद कि पहले विवाह कब हुआ और पत्नी की मृत्यु कब हुई, याचिकाकर्ताओं के वकील इसका कोई उत्तर नहीं दे सके।
अदालत ने यह भी पाया कि महिला याचिकाकर्ता की ओर से यह तक नहीं बताया गया कि उसने पति से अलगाव या तलाक के लिए कोई कार्यवाही शुरू की है अथवा पति के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराई है।
आय का स्रोत का नहीं दे पाए जवाब
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जब अदालत ने पूछा कि दोनों कब से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और उनकी आय का स्रोत क्या है, तब भी उनके वकील कोई उत्तर नहीं दे सके तथा याचिका में भी इसका कोई उल्लेख नहीं था।
इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि सुरक्षा प्रदान करने का कोई मामला नहीं बनता। न्यायालय ने कहा कि याचिका में किसी ठोस खतरे का उल्लेख नहीं है। बल्कि प्रथम दृष्टया यह याचिका कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर अपने अनैतिक संबंध को छिपाने का एक भद्दा प्रयास प्रतीत होती है। ऐसे कृत्य न केवल उनके चार बच्चों के भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं, बल्कि दो अन्य व्यक्तियों के वैवाहिक जीवन को भी बर्बाद कर रहे हैं।
अंत में हाई कोर्ट ने कहा कि याचिका सही तथ्य प्रस्तुत नहीं करती और जितना बताया गया है, उससे अधिक तथ्य छिपाए गए हैं। साथ ही कोई स्पष्ट खतरे की स्थिति भी सामने नहीं आई है।
कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किसी अनैतिक संबंध को छिपाने के लिए नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने से राज्य का यह दायित्व समाप्त नहीं होता कि जहां वास्तविक आवश्यकता हो, वहां वह याचिकाकर्ताओं के जीवन एवं स्वतंत्रता की रक्षा की जाए।