'मांस बेचेगा तो बर्बाद हो जाएगा', मुरथल के ढाबों पर क्यों नहीं मिलता नॉन-वेज?
murthal dhaba News: मुरथल के ढाबे सफेद मक्खन और परांठे से शुरू होकर अब क्यूआर कोड, टॉय ट्रेन और रोबोट जैसी आधुनिक तकनीक अपना चुके हैं।

मुरथल के ढाबों पर वीकेंड में उमड़ती है भीड़। फोटो- जागरण
HighLights
मुरथल के ढाबे अब क्यूआर कोड और रोबोट से खाना परोसते हैं।
बाबा कलीनाथ की भविष्यवाणी के कारण ये पूरी तरह शाकाहारी हैं।
स्वाद और आधुनिकता का मेल इन्हें लोकप्रिय वीकेंड स्थल बनाता है।
विष्णु कुमार, सोनीपत। मुरथल की कहानी सफेद मक्खन और परांठे से शुरू हुई थी। पांच दशकों में यहां आधुनिकता का ऐसा समावेश हुआ कि अब यहां क्यूआर कोड से आर्डर देने से लेकर टाय ट्रेन और रोबोट द्वारा खाना परोसने तक की तकनीक आ गई है।
यहां की थीम बेस्ड डाइनिंग, वाटर फाउंटेन, सेल्फी प्वाइंट इसे एक कंप्लीट आउटिंग का अनुभव देते हैं। सबसे विशेष बात यह है कि इतनी आधुनिकता के बावजूद, एक चीज जो खास है वो है यहां की स्वाद संस्कृति में अपना वही पुराना अपनत्व और वही जायका बरकरार होना।
आज यह केवल एक भोजन स्थल नहीं, वीकेंड पर्यटन केंद्र बन गया है, जहां पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर से दिल्ली की ओर जाते हुए लोग अपनी थकान मिटाने और विश्व प्रसिद्ध परांठों का स्वाद लेने के लिए जरूर ब्रेक लगाते हैं। दिल्ली सहित एनसीआर के ज्यादातर लोगों को तो हर माह में एक वीकेंड यहां की आउटिंग, पार्टी चाहिए ही चाहिए :
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बाबा की कथनी और लोगों की करनी
50 साल पहले बाबा कलीनाथ ने कहा था कि यदि यहां कोई भी मांस बेचेगा तो वह बर्बाद हो जाएगा। स्थानीय लोगों और ढाबा संचालकों का कहना है कि जिन्होंने भी इस चेतावनी को अनसुना कर नॉन-वेज बेचने का प्रयास किया, उनका कारोबार बंद हो गया। आज यह स्थान 100 प्रतिशत शुद्ध शाकाहारी भोजन के लिए जाना जाता है। यहां तक कि यहां के अमरिक सुखदेव जैसे बड़े ढावों पर भी लोग बाबा की कृपा मानकर पूरी तरह वैष्णव खाना ही परोसते हैं।

मुरथल के ढाबे क्यों हैं खास?
मुरथल के आकर्षण का मुख्य कारण इसका एडेप्टिव (अनुकूल) होना है। इसने अपनी जड़ों (परांठा और मक्खन) को नहीं छोड़ा, लेकिन दुनिया के साथ तालमेल बिठाते हुए खुद को 'हाई-टेक' वना लिया। यहां शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है, ताजा बनाते हैं और ताजा ही परोसते हैं, जिससे खाना पौष्टिक और स्वादिष्ट रहता है।
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यहां एक ही छत के नीचे आपको राजस्थानी, हरियाणवी और पंजावी संस्कृति का मेल मिलता है। शापिंग के लिए आपको यहां वड़े ब्रांड्स के शोरूम मिल जाएंगे।
सुरक्षा के लिए विशाल पार्किंग और 24 घंटे की उपलब्धता, इसे सुरक्षित और सुलभ बनाती है। मुरथल आज केवल सोनीपत का एक छोटा गांव नहीं, बल्कि हरियाणा के गौरव और आधुनिक व्यापार का एक शानदार माडल वन चुका है।
स्वाद और नयापन यहां आने को करता है मजबूर
कुरुक्षेत्र से अक्सर दिल्ली आने वाले कारोवारी साहव सिंह अपने अनुवभ साझा करते हैं, कि जव भी दिल्ली आते हैं तो मुरथल के ढावे पर रुककर खाना जरूर खाते हैं। इस वार पत्नी और वच्चों के साथ दिल्ली आया तो पहली वार रेशम ढावे पर रुके। यहां टाय ट्रेन से खाना सर्व करने का कान्सेप्ट वेहद निराला लगा।

खाने के स्वाद की तो जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। उन्होंने कहा कि यहां का स्वाद और नयापन उन्हें वार-वार यहां आने पर मजबूर करता है। वहीं दिल्ली के महरौली की रहने वाली आरती, रजनी, वताती हैं कि मुरथल के परांठों का स्वाद उन्हें यहां तक खींच लाता है। परांठे तो दिल्ली में भी हैं, लेकिन जो स्वाद यहां के पराठों में है, वह और कहीं नहीं। यहां का तंदूरी परांठा उनकी पहली पसंद है।
अमरीक सुखदेव- जहां ट्रकों के हिसाब से आता है राशन
मुरथल की सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक अमरीक सुखदेव ढावा है। यहां की भीड़ किसी वड़े मेले जैसी होती है। वीकेंड या त्योहारों पर एक दिन में यहां 10 हजार से अधिक लोग खाना खाते हैं।

सामान्य दिनों में भी यह संख्या 5 हजार से ऊपर रहती है। यहां रसोई की खपत इतनी है कि आटा, दालें, सब्जियां और दूध वोरियों या कट्टों में नहीं, वल्कि सीधे ट्रकों में भरकर लाया जाता है। यहां 24 घंटे खाना मिलता है और सर्विस इतनी तेज है कि हजारों की भीड़ के बावजूद ग्राहक को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता।
बच्चों के लिए क्या है खास?
थीम-बेस्ड ढाबे
यहां 'मेरा गांव मेरा देश' में हरियाणवी संस्कृति, घास-फूस और मिट्टी के कमरे देखने को मिलते हैं। वहीं 'चौखी ढाणी' में राजस्थानी और 'मन्नत' ढाबे में पंजाबी स्टाइल का अनुभव मिलता है।

कूल वाइब्स
नीलकंठ और सुखदेव जैसे ढाबों में आकर्षक वाटर फाउंटेन और एयर कंडीशनिंग हाल हैं। 'नवग्रामीण' में जूट के पर्दों के साथ देसी लुक दिया गया है।
बच्चों के लिए आकर्षण
मन्नत पर बंजी जंपिंग और टॉय ट्रेन में बच्चे खूब मस्ती करते हैं, तो रेशम में कैमल राइड (ऊंट की सवारी) का मजा लिया जा सकता है। इसके साथ ही आकर्षक झूले बच्चों को आकर्षित करते हैं।
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