मणिमहेश कैलाश का आखिर क्या है रहस्य? जिसने भी चढ़ने का प्रयास किया हो गई अनहोनी; गडरिया बन गया था पत्थर
उत्तर भारत की प्रसिद्ध श्री मणिमहेश कैलाश यात्रा शुरू हो गई है, जहाँ शिवभक्त पवित्र डल झील में डुबकी लगाने ...और पढ़ें

श्रीमणिमहेश कैलाश पर्वत और पवित्र डल झील। जागरण आर्काइव
HighLights
मणिमहेश कैलाश यात्रा आरंभ, शिवभक्तों की आस्था का केंद्र।
अजेय पर्वत पर चढ़ने के प्रयास रहे विफल, कई अनहोनी।
ब्रह्ममुहूर्त में मणि दर्शन, शिव के मुकुट की दिव्य चमक।
जागरण टीम, चंबा। उत्तर भारत की प्रसिद्ध श्री मणिमहेश कैलाश यात्रा आरंभ हो गई है। शिवभक्त जयकारे लगाते हुए मणिमहेश कैलाश के दर्शन और पवित्र डल झील यानी शिव कुंड में डुबकी लगाने के लिए 13 किलोमीटर का पैदल ट्रैक तय कर पहुंच रहे हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र मणिमहेश कैलाश पर्वत पर्वतारोहियों के लिए आज भी रहस्य ही है। कई लोग आए और आम पहाड़ समझकर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन कोई सफल नहीं हो पाया। जिसने भी चढ़ने की कोशिश की, उसके साथ कुछ न कुछ अनहोनी हो गई।
विदेशी पर्वतारोहियों की टीम भी एक बार यहां पहुंची थी, लेकिन इस पर्वत के रहस्य के आगे नतमस्तक होकर भाग निकली। किसी ने बताया एक ऊंचाई पर जाने के बाद उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था तो कोई रास्ता भटक कर नीचे पहुंच गया।
कइयों की चली गई थी जान
1965 में इटली के दल ने मणिमहेश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी। लेकिन अचानक मौसम बहुत खराब हो गया और दल रास्ता भटक गया। 1968 में भारत व जापानी महिलाओं के एक संयुक्त दल ने पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन अचानक भूस्खलन होने लगा और कुछ की मौत हो गई। मणिमहेश कैलाश के ऊपर से कोई हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर भी उड़ान नहीं भरता है।
मणिमहेश की पौराणिक कथा व मान्यता
चौरासी मंदिर भरमौर के प्रमुख पुजारी पंडित छज्जू राम शर्मा का कहना है कि मणिमहेश यात्रा प्राचीन काल से निरंतर चली आ रही है, इसका एक निश्चित समय अंकित नहीं है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह करने के उपरांत इस पावन कैलाश पर्वत को अपनी तपस्थली व निवास बनाया था।
यात्रा की परंपरा के अनुसार, महिलाएं पहले माता पार्वती के पावन स्नान स्थल गौरीकुंड में जाती हैं, जबकि पुरुष सीधे पवित्र डल झील यानी शिव कुंड में आस्था की डुबकी लगाते हैं।
क्या है मणिमहेश का रहस्य और कब चमकती है मणि?
करीब 18,564 फीट ऊंचे मणिमहेश कैलाश को अजेय पर्वत कहा जाता है, जिस पर आज तक कोई इंसान नहीं चढ़ सका। पर्वत का सबसे बड़ा आकर्षण मणि दर्शन है। यह दिव्य प्रकाश सूर्य निकलने से काफी पहले ब्रह्ममुहूर्त (भोर) के समय शिखर के ठीक ऊपर एक नीली व अलौकिक चमक के रूप में दिखाई देता है। धूप खिलने से पहले दिखने वाली इस दिव्य ज्योति को भगवान शिव के मुकुट की मणि का साक्षात चमत्कार माना जाता है।

चरवाहे के पत्थर बनने की कथा
लोककथा के अनुसार, एक गद्दी चरवाहे ने अपनी भेड़ों के साथ मणिमहेश कैलाश की चोटी पर चढ़ने का प्रयास किया था। लेकिन वह और उसकी भेड़ें पर्वत पर ही पाषाण (पत्थर) बन गईं, जिनके निशान आज भी पर्वत में दिखाई देते हैं।
किसने बनवाया था भरमौर का चौरासी मंदिर?
मणिमहेश यात्रा का मुख्य आधार पड़ाव भरमौर है। ऐतिहासिक चौरासी मंदिर परिसर का निर्माण 6वीं से 8वीं शताब्दी के दौरान राजा मेरु वर्मन के शासनकाल में हुआ था। भरमौर में ही माता भरमाणी का मंदिर भी है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, मणिमहेश की चढ़ाई शुरू करने से पहले चौरासी मंदिर सहित माता भरमाणी के दर में हाजिरी लगाना अनिवार्य माना जाता है।
किस तरह पहुंचें मणिमहेश
मणिमहेश पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सबसे पहले जिला मुख्यालय चंबा पहुंचना पड़ता है। पठानकोट से चंबा की दूरी 120 किलोमीटर है। यहां से आगे भरमौर तक 64 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है। भरमौर से हड़सर तक 11 किलोमीटर जीप या बस के माध्यम से पहुंच सकते हैं। हड़सर से मणिमहेश डल झील की दूरी 13 किलोमीटर है।
मनोकामना होती है पूरी
कहा जाता है मणिमहेश कैलाश के दर्शन कर पवित्र शिवकुंड में डुबकी लगाने वालों की मनोकामना जरूरी पूरी होती है। यह भी कहा जाता है भोलेनाथ का अचानक बुलावा आता है, भगवान का हुकम होने पर ही कोई यात्रा पूरी कर पाता है।
महास्नान की तिथि
जन्माष्टमी पर्व 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:26 बजे आरंभ होगा और 5 सितंबर को सुबह 12:14 बजे तक रहेगा। यह अवधि कृष्ण पक्ष होने के साथ-साथ इसमें रोहिणी नक्षत्र का भी संयोग होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस अवधि में किए जाने वाले शुभ कार्यों के साथ मणिमहेश झील में स्नान भी फलदायी माना गया है।
18 सितंबर से राधाष्टमी स्नान
राधाष्टमी पर्व पर मणिमहेश यात्रा के दौरान शिव चेले मणिमहेश झील पार करके राधाष्टमी स्नान आरंभ करने की परंपरा निभाते हैं। इसी परंपरा के अनुसार शिव चेले सप्तमी के दिन ही मणिमहेश झील पार कर स्नान की प्रक्रिया शुरू करते हैं।
सप्तमी 17 सितंबर को सुबह 10:49 बजे आरंभ होगी और 18 सितंबर को दोपहर 1:00 बजे तक रहेगी। इस अवधि में शिव चेले डल झील में स्नान कर सकते हैं। इसके बाद 18 सितंबर को दोपहर 1:00 बजे राधाष्टमी पर्व आरंभ होगा, जो 19 सितंबर 2026 को शाम 3:28 बजे तक रहेगा। इस अवधि में श्रद्धालु मणिमहेश झील में स्नान कर सकेंगे।
