भूकंप के झटकों ने याद दिला दी 1905 की त्रासदी, कांगड़ा में 121 साल पहले आज ही के दिन हजारों लोगों की गई थी जान
हिमाचल प्रदेश में हाल ही में आए भूकंप के झटकों ने 1905 की कांगड़ा त्रासदी की यादें ताजा कर दी हैं। 4 अप्रैल 1905 को 7.8 तीव्रता के भूकंप ने कांगड़ा मे ...और पढ़ें

कांगड़ा में 4 अप्रैल 1905 में आए भूकंप से हुआ नुकसान।
HighLights
हाल के भूकंप ने 1905 की कांगड़ा त्रासदी याद दिलाई।
कांगड़ा जोन पांच में अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र है।
टेक्टोनिक प्लेटों की निगरानी को जीपीएस सिस्टम स्थापित।
जागरण टीम, धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश में गत रात को आए भूकंप के झटकों ने 1905 की त्रासदी की याद दिला दी है। 121 साल पहले आज ही के दिन 4 अप्रैल 1905 को कांगड़ा में भयानक भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.8 मापी गई थी। उस समय मरने वालों का आंकड़ा 19,800 पहुंचा था और एक लाख भवन तबाह हो गए थे। रात को महसूस हुए झटकों से लोगों में दहशत का माहौल है।
रात को हुए भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान में था व इसकी तीव्रता 5.8 थी, जिसके झटके हिमाचल सहित उत्तरी भारत में महसूस किए गए। अफगानिस्तान में कई लोगों की जान भी गई है।
हिमाचल का कांगड़ा बेहद संवेदनशील
भूकंप की दृष्टि से हिमालयन रेंज का सबसे संवेदनशील क्षेत्र जिला कांगड़ा जोन पांच में आता है। साधारण शब्दों में कहें तो अगर पांच की तीव्रता से अधिक का भूकंप आया तो तबाही निश्चित है। पिछले कुछ साल से लगातार भूकंप के झटके महसूस किए जा रहे हैं। ये झटके 1905 की उस काली सुबह की याद दिला देते हैं, जिसके बारे में शायद ही कांगड़ा के किसी व्यक्ति को पता न हो।
आखिर क्यों आता है भूकंप
टेक्टोनिक प्लेटें पृथ्वी की बाहरी सतह और ऊपर की ओर के टुकड़े होते हैं और इन्हें लिथोस्फीयर कहा जाता है। प्लेटें करीब 100 किलोमीटर मोटी होती हैं और ये दो प्रकार की होती हैं। पहली समुद्री क्रस्ट और दूसरी कॉन्टिनेंटल क्रस्ट। प्लेटें स्थलमंडल के नीचे स्थित दुर्बलतामंडल के ऊपर तैर रही हैं। इनके घूमने की गति और टूटने की प्रवृति से ही भूंकप होता है। जिस क्षेत्र में प्लेटों की गति कम होती है वहां भूंकप की आशंका बढ़ जाती है।

भूकंप की दृष्टि से ये संवदेनशील क्षेत्र
हिमाचल का कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, मंडी, कुल्लू, चंबा, सोलन, जम्मू-कश्मीर का सांबा, उत्तराखंड व नेपाल भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र हैं।
क्या है निपटने की तैयारियां
भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार है। इसके लिए स्कूल स्तर से समय-समय पर आपदा प्रबंधन के शिविर लगाकर सुरक्षित रहने के तरीके बताए जाते हैं। कई बार मॉक ड्रिल का भी आयोजन होता है।
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तकनीकी प्रबंध की क्या है स्थिति
कश्मीर से लेकर नेपाल तक हिमालयन रेंज की टेक्टोनिक प्लेटों में क्या बदलाव आ रहे हैं। कहां इनकी हलचल ज्यादा या कम हुई है। प्लेटों की गति में कमी से भी हिमालयन रेंज में बड़ा भूकंप आ सकता है। इसके लिए हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस व इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग (आइआइआरएस) देहरादून, नूरपुर और पालमपुर के जिया गांव में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम स्थापित किया है। मशीनें लगाने का उद्देश्य टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल का पता लगाना है।