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    हिमाचल प्रदेश में चरमराएगी 108 और 102 एंबुलेंस सेवा, 7 दिन की प्रदेशव्यापी हड़ताल पर जाएंगे कर्मचारी

    By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Sun, 08 Feb 2026 12:23 PM (IST)

    हिमाचल प्रदेश में 108 और 102 एंबुलेंस कर्मचारी प्रदेशव्यापी हड़ताल पर जाएंगे। मंडी एंबुलेंस यूनियन ने न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम भुगतान और ठेका प्रथा समाप् ...और पढ़ें

    हिमाचल प्रदेश में एंबुलेंस सेवा के कर्मचारी हड़ताल पर जाएंगे।

    हिमाचल प्रदेश में एंबुलेंस सेवा के कर्मचारी हड़ताल पर जाएंगे।

    HighLights

    1. एंबुलेंस कर्मचारी 12 से 17 फरवरी तक हड़ताल पर जाएंगे।

    2. न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम भुगतान, ठेका प्रथा समाप्ति मुख्य मांगें।

    3. मांगें न मानी तो आपातकालीन सेवाएं होंगी बाधित।

    जागरण टीम, लडभड़ोल (मंडी)। हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ 108 और 102 एंबुलेंस सेवा पर फिर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। लंबित मांगों की सुनवाई न होने से आक्रोशित एंबुलेंस कर्मचारियों ने अब फिर प्रदेशव्यापी हड़ताल की चेतावनी दे दी है। एंबुलेंस यूनियन मंडी के जिला प्रधान सुमित कपूर और महासचिव पंकज कुमार ने कहा कि यह हड़ताल 12 फरवरी सुबह आठ बजे से शुरू होकर 17 फरवरी सुबह आठ बजे तक जारी रहेगी।

    यदि निर्धारित समय से पहले उनकी मांगें नहीं मानी गई तो प्रदेशभर में आपातकालीन सेवाएं पूरी तरह बाधित हो जाएंगी, जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी सरकार और संबंधित प्रबंधन कंपनी की होगी।

    क्या हैं मुख्य मांगें

    यूनियन की मुख्य मांगों में हाई कोर्ट और लेबर कोर्ट की ओर से निर्धारित न्यूनतम वेतन को तत्काल लागू करना, 12 घंटे की ड्यूटी के बदले आठ घंटे के बाद के अतिरिक्त समय का दोगुना ओवरटाइम भुगतान करना और ठेका प्रथा को समाप्त कर कर्मचारियों के लिए एक स्थायी राजकीय नीति बनाना शामिल है।

    इसके अलावा, कर्मचारियों ने हड़ताल के कारण पूर्व में निकाले गए साथियों की तत्काल बहाली, वेतन में प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत की अनिवार्य वृद्धि, पीएफ, ग्रेच्युटी और छुट्टियों के उचित प्रविधान की भी मांग की है। 

    शोषण बंद होगा तभी सेवाएं सुचारू होंगी

    उन्होंने स्पष्ट किया कि जो कंपनियां श्रम कानूनों और अदालती आदेशों की अवहेलना कर रही हैं उन्हें टेंडर प्रक्रिया से बाहर किया जाना चाहिए। कर्मचारियों ने जनता से अपील की है कि उनका यह संघर्ष केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बचाने के लिए भी है, क्योंकि जब शोषण बंद होगा तभी सेवाएं सुचारू रह सकेंगी।

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