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कुल्लू में कमजोर ढलानों पर जलविद्युत परियोजनाएं लगाने पर NGT ने लिया संज्ञान, 8 सप्ताह में मांगा जवाब

By Hansraj Saini Edited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 10 Sep 2026 06:39 AM (IST)Updated: Thu, 10 Sep 2026 11:08 AM (IST)

एनजीटी ने कुल्लू के थूंजा गांव में दो लघु जलविद्युत परियोजनाओं के कारण पहाड़ियों और प्राकृतिक जलस्रोतों को खतरे पर सुनवाई की। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

कुल्लू में कमजोर ढलानों पर जल विद्युत परियोजनाएं लगाने के मामले में एनजीटी ने संज्ञान लिया है। प्रतीकात्मक फोटो

कुल्लू में कमजोर ढलानों पर जल विद्युत परियोजनाएं लगाने के मामले में एनजीटी ने संज्ञान लिया है। प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. एनजीटी ने कुल्लू जलविद्युत परियोजनाओं से पर्यावरण खतरे पर सुनवाई की।

  2. ग्रामीणों ने ब्लास्टिंग और कमजोर ढलानों पर परियोजनाओं पर आपत्ति जताई।

  3. ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह दिए।

जागरण संवाददाता, मंडी। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू जिले की भुंतर तहसील स्थित थूंजा गांव के समीप गड़बड़ाती पहाड़ियों और प्राकृतिक जलस्रोतों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे के विरुद्ध दायर याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सुनवाई हुई। जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली प्रधान पीठ ने मामले में सभी पक्षों को अपनी याचिकाएं और जवाब (प्लीडिंग्स) पूरे करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है।

ट्रिब्यूनल अब इस मामले पर 17 नवंबर को अगली सुनवाई करेगा। सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल के समक्ष दो अंतरिम आवेदनों (आइए संख्या 545/2026 और 579/2026) को निष्प्रभावी मानते हुए का निपटारा कर दिया गया, क्योंकि मामले में हुए नए घटनाक्रमों के बाद इनकी प्रासंगिकता नहीं बची थी।

ग्रामीणों ने जताया ऐतराज

इससे पूर्व दर्ज की गई मूल याचिका (ओए संख्या 98/2026) में ग्रामीणों ने थूंजा गांव की ढलान पर स्थापित किए जा रहे पांच-पांच मेगावाट के दो लघु जलविद्युत प्रोजेक्टों कसोल और ग्राहण कसोल के निर्माण पर कड़ा ऐतराज जताया है।

ब्लास्टिंग से नाले पर पड़ा प्रभाव

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन प्रोजेक्ट के लिए की जा रही टलनिंग, पाइपलाइन बिछाने और अनियंत्रित ब्लास्टिंग से ग्राहण नाले पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यह नाला ही गांव के पेयजल का एकमात्र जरिया है। 

धमाकों से लोग असुरक्षित

ग्रामीणों का कहना है कि बिना किसी ढलान-स्थिरता आकलन, कंपन प्रभाव अध्ययन या आपदा-जोखिम जांच के ही पहाड़ियों पर ब्लास्टिंग शुरू कर दी गई। धमाकों से हो रहे कंपन के कारण पूरे गांव के लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। 

ईको-सेंसिटिव जोन में 

वर्ष 2016 की संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया कि इस क्षेत्र की ढलानें बेहद कमजोर हैं। इसके अलावा, दोनों प्रोजेक्ट कनावर वन्यजीव अभ्यारण्य के अधिसूचित ईको-सेंसिटिव जोन में आते हैं और इनका मुख्य हिस्सा अभ्यारण्य की सीमा के भीतर पड़ता है। 

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एनजीटी ने सभी संबंधित उत्तरदाताओं को नोटिस जारी कर पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

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