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CAG Report: हिमाचल में सरकारी टेंडर्स में मिलीभगत, GST में भी गोलमाल; सरकारी उपक्रम घाटा 4985 करोड़ रुपये के पार

By Parkash Bhardwaj Edited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 03 Sep 2026 04:41 PM (GMT+05:30)

कैग की रिपोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में सरकारी खरीद, जीएसटी और सार्वजनिक उपक्रमों के वित्तीय प्रबंधन में गंभीर अनियमितताओं का ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में सीएम सुक्खू ने कैग रिपोर्ट पेश की।

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में सीएम सुक्खू ने कैग रिपोर्ट पेश की।

HighLights

  1. सरकारी खरीद में ई-टेंडरिंग में मिलीभगत और अनियमितताएं उजागर।

  2. जीएसटी और ई-वे बिल प्रणाली में करोड़ों की टैक्स चोरी।

  3. 14 सरकारी उपक्रमों का संचित घाटा ₹4,985 करोड़ पहुंचा।

राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार के विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में चल रही कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने कई बड़े खुलासे किए हैं। मार्च 2023 को समाप्त अवधि की इस संयुक्त लेखापरीक्षा रिपोर्ट में सरकारी खरीद में गंभीर अनियमितताओं, टैक्स चोरी और सरकारी कंपनियों के बढ़ते घाटे की पोल खोली गई है। 

कैग द्वारा प्रदेश सरकार को ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम में संदिग्ध बोलियों और एक ही आईपी एड्रेस के इस्तेमाल को पकड़ने के लिए अलर्ट एल्गोरिदम विकसित किए जाएं। ई-वे बिल पोर्टल पर एक ही चालान पर कई बिल बनने पर अधिकारियों को तुरंत अलर्ट भेजने की व्यवस्था हो। जीएसटी रिटर्न न भरने वालों पर सख्त निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने सदन में रिपोर्ट पेश की। 

ई-टेंडरिंग में मिलीभगत: एक ही आईपी एड्रेस से डाले गए टेंडर

सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने के लिए शुरू किया गया ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम खुद भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ गया है। कैग की जांच में सामने आया है कि टेंडरों में प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधियां चल रही हैं, जिसमें एक ही आईपी एड्रेस या विभागीय आईपी एड्रेस से कई बोलियां लगाई गईं। बोलियों में मामूली अंतर पाया गया जो ठेकेदारों की आपसी मिलीभगत (रोटेशनल कार्टेल) की ओर इशारा करता है।

2011 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के सात साल बाद भी केवल तीन माड्यूल (विक्रेता प्रबंधन, ई-आक्शन व ई-पेमेंट) ही आंशिक रूप से लागू हो पाए हैं। मांग, कैटलाग और संविदा प्रबंधन जैसे मॉड्यूल अब तक शुरू नहीं हुए हैं।

100 में से 16 खरीद इकाइयों, जिनमें डा. राजेन्द्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कालेज (टांडा), युवा सेवा एवं खेल निदेशालय और हिमाचल प्रदेश विधानसभा शामिल हैं, ने पोर्टल बनने के बाद से इसका उपयोग ही नहीं किया है।

ई-वे बिल में खामियां, राजकोष को करोड़ों की चपत

जीएसटी और ई-वे बिल प्रणाली में मौजूद तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर करदाता सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगा रहे हैं। पोर्टल पर एक ही चालान से कई ई-वे बिल बनाने की अनुमति दी गई। इसके कारण करदाताओं ने करों का भुगतान नहीं किया या कम किया, जिससे राजकोष को 4.43 करोड़ का नुकसान हुआ।

जांच में पाया गया कि 9 करदाताओं ने वास्तव में प्राप्त 314.92 करोड़ के बजाय 335.26 करोड़ का आईटीसी क्लेम कर लिया। इस 20.34 करोड़ के अतिरिक्त क्लेम से सीधा राजस्व का नुकसान हुआ। ऐसे करदाताओं ने भी ई-वे बिल जेनरेट किए, जिनका पंजीकरण बिना टैक्स चुकाए ही रद कर दिया गया था। 

10 सर्कलों में 256 मामलों में 49.56 करोड़ की मांग के नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन तीन साल बीतने के बाद भी विभाग केवल 2.09 करोड़ ही वसूल सका। 323 करदाताओं ने 2.43 करोड़ का टीडीएस स्वीकार किया, लेकिन अपना करयोग्य टर्नओवर शून्य दिखाया। इससे 121.33 करोड़ के टर्नओवर को छिपाने और लगभग 21.84 करोड़ की जीएसटी चोरी का अनुमान है।

सफेद हाथी साबित हो रहे सरकारी उपक्रम, संचित घाटा 4,985 करोड़ पार

राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की वित्तीय स्थिति बेहद चिंताजनक है और राज्य की जीडीपी में इनका योगदान लगातार गिर रहा है। घाटे में चल रहे उपक्रमों का कुल नुकसान वर्ष 2021-22 के 498.55 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 604.94 करोड़ हो गया है। इस भारी भरकम घाटे के लिए मुख्य रूप से राज्य के विद्युत क्षेत्र के उपक्रम (हिमाचल प्रदेश पावर कार्पोरेशन, पावर ट्रांसमिशन कार्पोरेशन, स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड) और हिमाचल पथ परिवहन निगम जिम्मेदार हैं।

31 मार्च 2023 तक राज्य के 14 सरकारी उपक्रमों का कुल संचित घाटा ₹4,985.18 करोड़ तक पहुंच गया है। इनमें से 9 उपक्रमों की नेटवर्थ (शुद्ध संपत्ति) पूरी तरह से खत्म होकर ऋणात्मक हो चुकी है। 30 सितंबर 2023 तक 27 सरकारी कंपनियों ने अपने 2022-23 के लेखे ऑडिट के लिए कैग को प्रस्तुत ही नहीं किए। इसके अलावा, स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति, वार्षिक आम बैठकें बुलाने और ऑडिट कमेटी बनाने जैसे अनिवार्य कार्पोरेट गवर्नेंस नियमों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

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