'शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं', हिमाचल हाई कोर्ट का फैसला; युवक के खिलाफ दर्ज FIR रद
हिमाचल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है, जब तक ...और पढ़ें

हिमाचल हाई कोर्ट ने शादी से इनकार करने को आत्महत्या के उकसाना नहीं बताया है।
HighLights
शादी से इनकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: हाई कोर्ट।
धारा 306 के लिए प्रत्यक्ष उकसावा होना अनिवार्य।
बिलासपुर मामले में युवक विवेक शर्मा बरी हुए।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कानूनी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शादी करने से महज इनकार करना, भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। न्यायालय ने कहा कि धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए आरोपित की ओर से किसी ऐसे सकारात्मक या प्रत्यक्ष कृत्य का होना अनिवार्य है, जिससे पीड़ित के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचे।
न्यायाधीश संदीप शर्मा ने बिलासपुर जिले के सदर थाने में वर्ष 2022 में दर्ज एक मामले की सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने आरोपित विवेक शर्मा के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उसके बाद निचली अदालत में शुरू हुई सभी आपराधिक कार्यवाहियों को खारिज कर दिया।
20 साल की युवती ने दे दी थी जान
यह मामला अगस्त 2022 का है, जब बिलासपुर की रहने वाली एक 20 वर्षीय युवती (बीए प्रथम वर्ष की छात्रा) ने फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। युवती के भाई (शिकायतकर्ता) ने आरोप लगाया था कि विवेक शर्मा नाम के युवक के उसकी बहन के साथ संबंध थे। आरोपित ने शादी का झांसा दिया था, लेकिन बाद में शादी करने से इनकार कर दिया, जिससे उसकी बहन गहरे तनाव में थी और उसने जान दे दी।
घर में शगुन के कपड़े देखने के बाद उठाया था कदम
हाई कोर्ट ने पुलिस रिकॉर्ड और मृतका के पास से मिले सुसाइड नोट का बारीकी से अध्ययन किया। सुसाइड नोट से पता चला कि युवती जब बिलासपुर में विवेक के घर गई, तो वहां कमरे में रखे कुछ सामान (शगुन के कपड़े और चूड़ियां) देखकर उसे संदेह हुआ कि विवेक ने किसी दूसरी लड़की से शादी कर ली है। इस गलतफहमी और विवेक के पिता द्वारा अलग समुदाय होने के कारण शादी से इनकार करने के बाद, उसने यह आत्मघाती कदम उठाया। हालांकि, रिकॉर्ड के अनुसार विवेक ने किसी अन्य से शादी नहीं की थी।
उकसाने के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा होना जरूरी
कोर्ट ने कहा कि भले ही शादी से इनकार करने की बात सच हो, लेकिन इसे आत्महत्या के लिए 'उकसाना' नहीं माना जा सकता। उकसाने के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा और सीधा प्रोत्साहन होना जरूरी है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मामले में ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपित ने मृतका को गाली-गलौज की या उसे जानबूझकर प्रताड़ित किया, ताकि वह आत्महत्या करे।
अदालत ने माना कि आरोपित के दोषी पाए जाने की संभावना बेहद कम और धुंधली है, ऐसे में आरोपित को एक लंबी अदालती प्रक्रिया से गुजारना न्याय का मजाक होगा, जिसके अंत में अंततः उसकी रिहाई ही होनी है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
