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5-10 हजार से सीधा एक लाख रुपये... यह तो जुल्म है, घूसखोरी के लिए बदनाम हो रहे हिमाचल के ये 4 विभाग

By Navneet SharmaEdited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 03 Sep 2026 06:29 AM (IST)Updated: Thu, 03 Sep 2026 11:05 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश में सरकारी सेवाओं के लिए रिश्वत की दरें 5-10 हजार से बढ़कर सीधे एक लाख रुपये तक पहुंच ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश में घूसखोरी का प्रदूषण बढ़ गया है। प्रतीकात्मक फोटो

हिमाचल प्रदेश में घूसखोरी का प्रदूषण बढ़ गया है। प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. हिमाचल में रिश्वत की दरें एक लाख तक बढ़ीं।

  2. राजस्व, लोक निर्माण, पंचायती राज, पुलिस विभाग बदनाम।

  3. सोलन में पटवारी एक लाख की घूस लेते पकड़ी गई।

नवनीत शर्मा, धर्मशाला। आपको क्या लगता है कि सरकारी सेवाओं के लिए घूस या रिश्वत (आगे केवल 'अतिरिक्त पारिश्रमिक' पढ़ें) के लिए मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या झारखंड जैसे राज्य ही आगे हैं जहां एक चपरासी के घर से भी नकदी ही नकदी सनसनी पैदा करती रही है? अब हिमाचल प्रदेश में भी अतिरिक्त पारिश्रमिक के लिए ऐसे वर्ग के लोग महत्वाकांक्षी होकर अपनी दरें बढ़ा रहे हैं, जो पहले कम (दो, पांच या दस हजार) में भी संतुष्ट हो जाते थे। 

प्रदेश के औद्योगिक जिले सोलन में एक पटवारी महोदया को एक लाख रुपये की घूस लेते हुए पकड़ा गया है। इससे पहले कि आगे बढ़ें, अतिरिक्त पारिश्रमिक के संस्थायन की एक सत्य घटना अवश्य देखें।

प्रसंग पुराना है लेकिन इतना भी पुराना नहीं कि संदर्भ ही सो गए हों। हिमाचल प्रदेश कैडर के एक ईमानदार आइएएस अधिकारी की पत्नी अपनी प्रोफेशनल शिक्षा के कारण लंबे अर्से से प्रैक्टिस कर रही थीं। कुछ समय के बाद अपना भवन बना कर काम को शहर में ही अन्यत्र ले गईं तो कुछ आवश्यक संबद्ध सेवाओं की भी आवश्यकता थी। स्वाभाविक है कि एक सरकारी विभाग की अनुमति अनिवार्य थी। 

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आवश्यक कागजों का काम पूरा हुआ तो एक निरीक्षक साहब दौरा करने आए ताकि विभाग के 'उच्च अधिकारीगण की सेवा में आवश्यक रिपोर्ट प्रेषित' की जा सके। निरीक्षक महोदय इतने सुलझे हुए और शांत थे कि कहा, 'मैडम! सब ठीक है। बस आप 30000 रुपये दे दीजिए!' मैडम ने पूछा कि किस बात के? 

निरीक्षक महोदय ने अविचलित होते हुए जवाब दिया,"यहां ऐसे ही चलता है मैम...आपके पति क्योंकि उच्च अधिकारी रहे हैं इसलिए, आपसे तीस हजार ही ले रहे हैं, अन्यथा सामान्य अनुमति के तो 50,000 रुपये तय हैं। उन्होंने इस भ्रष्टाचार को ऊपर तक प्राप्त अघोषित/अलिखित स्वीकृति से पुष्ट आत्मविश्वासी मुस्कान के साथ पुन: कहा, 'ऐसा ही है मैम!' उक्त कथा वह खिड़की खोलती है जहां से रिश्वत के संस्थायन या अघोषित नियम बन जाने के दृश्य दिखते हैं। 

मंडी में दो लाख की डिमांड

हाल में, प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी मंडी में पटवारी और कानूनगो भी दो लाख की मांग के सिलसिले में धरे जाने पर जूझ रहे हैं। विजिलेंस ब्यूरो की वेबसाइट देखें तो प्राथमिकी दर प्राथमिकी दर्ज है। कहीं भूमि का पंजीकरण होना था, कहीं निशानदेही में जरेब ठीक से चलवानी थी, कहीं इंतकाल चढ़वाना था, कहीं सरकारी सीमेंट को अहसास की तरह पत्थर कर दिया गया तो कहीं सरकारी सीमेंट से स्थानीय जनप्रतिनिधि की दीवारें सशक्त हो गईं। 

कहीं कागजों पर लहलहाता पौधारोपण, भूमि पर दिखा ही नहीं। कहीं झील के चारों ओर बनाई कंक्रीट की दीवार सरकारी कार्यसंस्कृति का पानी पी लेने से रेत में बदल गई। 

विपक्ष को विजिलेंस पर रहता है संदेह

यह और बात है कि सरकार किसी भी दल की हो, विजिलेंस सरकार के साथ ही होती है और प्रतिपक्ष में कोई भी दल हो, उसे विजिलेंस पर कतिपय कारणों से संदेह ही रहता है। इसके बावजूद यह मानना होगा कि उगाही में लिप्त अधिकारियों-कर्मचारियों पर उसकी निगाह विशेषरूप से रहती है। 

दुर्गम जिलों में पहुंचा भ्रष्टाचार का प्रदूषण

हिमाचल प्रदेश में उत्तर, मध्य और दक्षिण रेंज में बंटे जिलों में कोई ऐसा नहीं है जिसमें भ्रष्टाचार के मामले दर्ज न हुए हों। यहां तक कि भ्रष्टाचार का प्रदूषण लाहुल स्पीति और किन्नौर जैसे जनजातीय और सांस्कृतिक रूप से स्वस्थ जिलों में भी पहुंच गया है। और यह तब है, जब विजिलेंस की साइट में 2020 से लेकर कहीं 2023 तो कहीं 2024 तक के मामले हैं। 2025 और लगभग पौना बीत चुके 2026 के आंकड़े अभी चढ़े नहीं हैं। डिजिटाइजेशन की गति तो बढ़नी चाहिए सर क्योंकि कागज से पर्दा हटता है तो सब साफ साफ दिखता है।

राजस्व विभाग ही बढ़त बनाए हुए

यह भी दिलचस्प है कि लोक निर्माण, पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास, पुलिस के लोग भी पकड़े जाते हैं लेकिन सामान्य धारणा यह है कि राजस्व विभाग यानी पटवारी, कानूनगो आदि अलग ही बढ़त बनाए हुए हैं। क्या इसका कारण यह है कि 'भारत की आत्मा गांवों में और कृषि आदिक कार्यों में बसती है?' यह जानकार ही बता सकते हैं।

दोषसिद्धि दर अधिकतम 30 प्रतिशत 

फिर विषय आता है कि दंड कितनों को मिलता है। कोई सटीक आंकड़ा नहीं लेकिन अनुमान यही है कि दोषसिद्धि दर अधिकतम 30 प्रतिशत रहती है और अतिरिक्त पारिश्रमिक के लिए ऐसा नवोन्मेष और नवाचार करने वाले अधिकारी, कर्मचारी पुन: दनदनाने लगते हैं और खिल्ली उड़ाते हैं कि आखिर किसी ने उनका क्या बिगाड़ लिया। पर ऐसा होता क्यों है? 

विजिलेंस से जुड़े एक उच्च अधिकारी कहते हैं, ' मामला ही इतना लंबा खिंचता है कि गवाह तब तक पट जाता है, पिघल जाता है...उसे सब देखा-दिखाया भूल जाता है।' अब यहां व्यवस्थागत विलंब, भ्र्रष्टाचार के संस्थायन को एक साथ रख कर सुदर्शन फाकिर का शे'र देखें : 

अपनी नजरों में गुनहगार न होते क्योंकर

दिल ही दुश्मन था मुखालिफ के गवाहों की तरह


क्या यह संभव नहीं कि ऐसे विषयों के अन्वेषणाधीन या न्यायाधीन रहने की भी एक अवधि हो...। बहुत अनिवार्य है कि यह सवाल भी ढाल न बनता रहे, 'ऊपर वाले क्या-क्या कर रहे हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहता लेकिन हमारी छोटी सी रिश्वत पर सबकी निगाहें रहती हैं।' 

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