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    'गवाह को परेशान करने के लिए बार-बार बुलाने की अनुमति नहीं', हिमाचल हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

    By Rohit Nagpal Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Tue, 21 Jul 2026 05:31 PM (IST)

    हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों में गवाहों के अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिरह का अधिकार गवाहों को पर ...और पढ़ें

    हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

    हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

    HighLights

    1. हाई कोर्ट ने गवाहों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

    2. जिरह का अधिकार गवाहों को प्रताड़ित करने का हथियार नहीं।

    3. विस्तृत पूछताछ के बाद गवाह को दोबारा नहीं बुलाया जाएगा।

    विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने आपराधिक मुकदमों में गवाहों के अधिकारों और जिरह की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिरह का अधिकार गवाहों को परेशान करने या प्रताड़ित करने का हथियार नहीं बन सकता। यदि किसी गवाह से पहले ही विस्तृत पूछताछ की जा चुकी है, तो महज केस को लंबा खींचने या परेशान करने के लिए उसे दोबारा अदालत में बुलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    न्यायाधीश राकेश कैंथला ने दिनेश चंद्र शर्मा द्वारा दायर एक आपराधिक याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ऊना की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में लंबित एक आपराधिक मामले में आरोपित हैं। इस मामले में अभियोजन पक्ष ने एक व्यक्ति को मुख्य गवाह के तौर पर पेश किया था। 

    3 दिन तक की लंबी जिरह

    आरोपित ने निचली अदालत में इस गवाह से लगातार 3 दिनों तक लंबी जिरह की, जो अदालत के रिकॉर्ड में कुल 35 पन्नों में दर्ज हुई थी। इसके बाद 20 जून 2025 को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने गवाह से जिरह करने के आरोपित के अधिकार को बंद कर दिया था। बाद में आरोपित ने निचली अदालत में दोबारा एक अर्जी लगाई कि वह उसी गवाह को फिर से बुलाना चाहता है।

    आरोपित की दलील थी कि गवाह एक प्रबुद्ध वर्ग से संबंध रखता है, जिससे आसानी से सच उगलवाना संभव नहीं था। निचली अदालत ने 6 मार्च 2026 को इस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ आरोपित ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

    दलीलों को आधारहीन माना

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अदालत का मुख्य काम सच को सामने लाना है, न कि गवाहों को अपमानित या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना। बार-बार एक ही सवाल पूछने और अदालती फाइलों का आकार बढ़ाने की प्रवृत्ति को कड़ाई से रोका जाना चाहिए।

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