'मेरिट में आए आरक्षित अभ्यर्थी को सामान्य माना जाए' हिमाचल हाई कोर्ट की TGT भर्ती पर आयोग को नसीहत
हिमाचल हाई कोर्ट ने टीजीटी भर्ती में आरक्षण नियमों और मेरिट सिद्धांत पर आयोग को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि मेरिट में आने वाले आरक्षित अभ्यर्थियों ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला परिसर। जागरण आर्काइव
HighLights
हाई कोर्ट ने TGT भर्ती में आरक्षण नियमों पर आयोग को फटकारा।
मेरिट वाले आरक्षित अभ्यर्थी सामान्य श्रेणी में गिने जाएं।
आयोग को जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय मिला।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने टीजीटी (आर्ट्स) भर्ती में आरक्षण नियमों और मेरिट के सिद्धांत को लेकर राज्य सरकार और राज्य चयन आयोग को नसीहत दी है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने कहा कि भर्ती एजेंसियां इस मामले में किसी गलतफहमी में जी रही हैं। राज्य चयन आयोग ने 25 मई 2025 को पोस्ट कोड-25001 के तहत टीजीटी (आर्ट्स) के 425 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। इसमें जनरल (अनारक्षित) के लिए 151 और एससी (बीपीएल) के लिए 17 पद आरक्षित थे।
याचिकाकर्ता ने दी यह दलील
याचिकाकर्ता ने एससी (बीपीएल) श्रेणी में आवेदन किया था और अंतिम परिणाम में 64 अंक प्राप्त कर वह इस श्रेणी की वेटिंग लिस्ट में पहले स्थान पर रहीं, जबकि आखिरी चयनित अभ्यर्थी के 64.58 अंक थे। इस भर्ती में सामान्य श्रेणी की कटआफ 71.31 रही। चयन आयोग के सचिव द्वारा कोर्ट में सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, एससी (बीपीएल) श्रेणी के तीन अभ्यर्थियों ने सामान्य वर्ग की कटआफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे। इसके बावजूद उन्हें सामान्य (ओपन) श्रेणी में शिफ्ट करने के बजाय एससी (बीपीएल) कोटे में ही रख लिया।
राज्य चयन आयोग का तर्क
आयोग ने तर्क दिया कि प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग के 12 नवंबर 2014 के निर्देशों के तहत हारिजांटल (क्षैतिज) आरक्षण (जैसे- बीपीएल, पूर्व सैनिक, दिव्यांग आदि) में आन मेरिट का सिद्धांत लागू नहीं होता है। कोर्ट ने आयोग के इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अधिकारी इस विषय पर गंभीर भ्रम में हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले आरके सभ्रवाल बनाम पंजाब राज्य (1995) का हवाला दिया।
आरक्षित श्रेणी का अभ्यर्थी ज्यादा नंबर लेता है तो सामान्य सूची में
अदालत ने साफ किया कि कानून के अनुसार यदि कोई आरक्षित श्रेणी का अभ्यर्थी अपने दम पर (मेरिट के आधार पर) सामान्य वर्ग के आखिरी चयनित अभ्यर्थी से अधिक या उसके बराबर अंक लाता है तो उसे सामान्य श्रेणी का माना जाना चाहिए। ऐसा करने से आरक्षित वर्ग की जो सीटें खाली होंगी, उन्हें उस श्रेणी के बाकी बचे मेरिट वाले अभ्यर्थियों (जैसे वेटिंग लिस्ट) से भरा जाना चाहिए।
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अदालत के इस कड़े रुख के बाद राज्य चयन आयोग ने मामले पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। हाई कोर्ट ने आयोग को अपना पक्ष रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। मामले की सुनवाई 12 अगस्त को होगी।