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हिमाचल पंचायत चुनाव: सरकारी जमीन पर ससुर का कब्जा तो बहू भी नहीं लड़ पाएगी इलेक्शन, सरकार का क्या है तर्क?

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 07 May 2026 01:10 PM (IST)

हिमाचल प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनाव के नियमों को सख्त किया है, जिसके तहत सरकारी जमीन पर सास-ससुर के अतिक्रमण ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रत्याशियों के लिए नियम तय किए हैं।

हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रत्याशियों के लिए नियम तय किए हैं।

HighLights

  1. सरकारी जमीन पर अतिक्रमण होने पर बहू चुनाव नहीं लड़ पाएगी।

  2. हिमाचल पंचायतीराज अधिनियम की धारा 122 में संशोधन को मंजूरी।

  3. कई महिला प्रत्याशियों की चुनाव लड़ने की उम्मीदों को झटका लगा।

राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामले में राज्य सरकार ने और सख्त कदम उठाया है। यदि किसी महिला के सास-ससुर ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है तो वह पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेगी। पंचायत चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से एक दिन पहले नियम को लागू करने की स्वीकृति दी गई है।

बुधवार देर सायं राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने हिमाचल में पंचायतीराज अधिनियम में संशोधन को स्वीकृति दी। अधिनियम की धारा 122 में संशोधन के निर्णय से प्रदेश में चुनाव लड़ने की इच्छुक कई महिला प्रत्याशियों को झटका लगा है।

कई महिलाएं चुनाव लड़ने के लिए पूरी तैयारी कर चुकी थीं और आवश्यक औपचारिकताएं भी पूरी कर ली थीं, लेकिन अधिसूचना के बाद उनके चुनाव लड़ने की इच्छा पर पानी फिर गया है।

पहले क्या थी व्यवस्था

पहले की व्यवस्था के अनुसार, पंचायती राज एक्ट 1994 की धारा 122 में परिवार की परिभाषा में दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटा-बेटी और अविवाहित बेटी का उल्लेख था। बहू का इसमें जिक्र नहीं था। इस कारण बहू चुनाव लड़ने के लिए योग्य मानी जाती थी। सूत्रों के अनुसार, विभाग ने इसका प्रस्ताव तैयार करके सरकार को मंजूरी के लिए भेजा था, लेकिन कई दिनों तक इसकी फाइल सामान्य प्रशासन विभाग के पास ही घूमती रही, जिससे मंजूरी में देरी हुई।

वर्ष 2020 के चुनाव में भी एक्ट बदलने की मांग उठी

वर्ष 2020 के पंचायत चुनाव में भी चुनाव आयोग ने राज्य सरकार से परिवार की परिभाषा में बदलाव की मांग की थी, ताकि अतिक्रमण करने वाले परिवार की बहू भी चुनाव न लड़ सके। उस समय कोरोना महामारी और समय की कमी के कारण यह बदलाव नहीं हो सका। 

1.60 लाख लोगों ने किए हैं कब्जे

अवैध कब्जों के मामले में 1.60 लाख लोग और उनके परिवार शामिल हैं। नियमों के अनुसार, ये पहले से ही चुनाव लड़ने के लिए अपात्र माने जाते हैं। वर्ष 2003 में अवैध कब्जों को नियमित करने के लिए इन परिवारों ने सरकार को स्वघोषणा के साथ अपने दस्तावेज दिए थे और इनकी मिसल काटी गई थी।

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