मानसून में सड़कें नहीं टूटेंगी! हिमाचल सरकार का बड़ा एक्शन, अब हर सड़क का होगा ड्रेनेज ऑडिट
हिमाचल सरकार ने मानसून में सड़कों को बार-बार टूटने से रोकने के लिए नई रोड ड्रेनेज पॉलिसी जारी की है। अब सड़क निर्माण और सुधार में पानी की निकासी पर वि ...और पढ़ें
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हिमाचल सरकार का बड़ा कदम, मानसून में सड़कों को बचाने के लिए नई ड्रेनेज पॉलिसी लागू।
HighLights
सड़क निर्माण में जल निकासी पर विशेष जोर दिया जाएगा
आबादी वाले क्षेत्रों में यू-शेप ड्रेन और आरसीसी कवर अनिवार्य
प्रत्येक सड़क का ड्रेनेज ऑडिट और वैज्ञानिक सर्वे होगा
राज्य ब्यूरो, शिमला। मानसून के दौरान बार-बार टूटने वाली सड़कों और हर साल करोड़ों रुपये की मरम्मत पर लगने वाले खर्च को रोकने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। लोक निर्माण विभाग (एचपीपीडब्ल्यूडी) ने रोड ड्रेनेज पॉलिसी के तहत ड्रेनेज-इम्प्रूवमेंट कार्यों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।
अब सड़क निर्माण और सुधार में सबसे अधिक जोर पानी की निकासी पर रहेगा, ताकि बारिश का पानी सड़क और ढलानों को नुकसान न पहुंचा सके। प्रधान सचिव देवेश कुमार की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि वर्ष 2023 और 2025 के भीषण मानसून में प्रदेश भर में सड़कें टूटने, पुलियां जाम होने, भूस्खलन और सड़क धंसने की बड़ी वजह कमजोर और अपर्याप्त ड्रेनेज व्यवस्था रही।
इसी कारण अब मरम्मत आधारित व्यवस्था छोड़कर वैज्ञानिक और स्थायी समाधान अपनाया जाएगा। नई व्यवस्था के तहत आबादी वाले क्षेत्रों में यू-शेप ड्रेन बनाना और उन्हें आरसीसी कवर से ढंकना अनिवार्य होगा। बार-बार जाम होने वाली पाइप पुलियों की जगह अधिक क्षमता वाले आरसीसी बाक्स कल्वर्ट लगाए जाएंगे।
जहां जरूरत होगी वहां नए क्रास ड्रेनेज ढांचे, कैच-वाटर ड्रेन, चैनलाइजेशन, स्कार प्रोटेक्शन और एनर्जी डिसिपेशन जैसी व्यवस्थाएं भी विकसित की जाएंगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस बजट मद के तहत सामान्य टारिंग, री-कार्पेटिंग या बिटुमिनस लेयर के कार्य नहीं किए जाएंगे। केवल जल निकासी सुधार से जुड़े कार्य ही स्वीकृत होंगे। यदि निजी भूमि पर पानी की निकासी ले जानी होगी तो पहले संबंधित भू-स्वामियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना अनिवार्य होगा।
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हर सड़क का होगा ड्रेनेज ऑडिट
नई गाइड लाइन के तहत पहले चरण में मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड (एमडीआर) का चयन किया जाएगा। सड़कों का ड्रेनेज ऑडिट होगा और उन स्थानों की पहचान की जाएगी जहां पानी जमा होता है, पुलियां जाम रहती हैं, ढलानों से मलबा आता है या हर साल सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं। प्रत्येक प्रस्ताव 10 से 25 किलोमीटर लंबे सड़क कॉरिडोर के लिए तैयार होगा। छोटे-छोटे टुकड़ों में काम करने की अनुमति नहीं होगी।
डीपीआर से पहले अनिवार्य होगा वैज्ञानिक सर्वे
सड़क चयन के बाद विस्तृत हाइड्रोलाजिकल सर्वे कराया जाएगा। इसमें वर्षा की तीव्रता, जलग्रहण क्षेत्र, पानी के बहाव, ढलान और मौजूदा ड्रेनेज क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। इसी आधार पर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार होगी।
पक्के शोल्डर और जलभराव खत्म करने पर फोकस
सड़कों के किनारे पक्के शोल्डर बनाए जाएंगे ताकि पानी सड़क में न समाए और नालियों में गाद कम पहुंचे। जहां सड़क की ढाल या कैम्बर खराब होने से पानी जमा होता है, वहां प्रोफाइल सुधार भी किया जाएगा। भूजल रिसाव वाले क्षेत्रों में सब-सर्फेस ड्रेनेज सिस्टम लगाने का भी प्रावधान रखा गया है।
तीन स्तर पर होगी निगरानी
प्रत्येक सड़क के लिए जूनियर इंजीनियर, सहायक अभियंता और अधिशासी अभियंता संयुक्त रूप से ड्रेनेज ऑडिट करेंगे। विभाग ने इसके लिए विस्तृत चेकलिस्ट जारी की है, जिसमें सड़क, नालियों, पुलियों, जलभराव, कटाव, शोल्डर, भूस्खलन और जल निकासी से जुड़े दर्जनों बिंदुओं का निरीक्षण अनिवार्य किया गया है।