पराली से आलू उगाने का क्या है फार्मूला? हिमाचल का वेस्ट टू वेल्थ मॉडल करेगा पंजाब-हरियाणा की समस्या हल
हिमाचल प्रदेश के ऊना में पराली से आलू उगाने की शून्य जुताई तकनीक देश के लिए नया मॉडल बनेगी। यह ...और पढ़ें

ऊना में पराली से ढककर आलू उगाने का शोध सफल हो गया है।
HighLights
पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण पर रोक लगेगी।
शून्य जुताई से पानी, श्रम और मशीनरी का खर्च कम।
बिना रसायन के जैविक आलू का उत्पादन संभव होगा।
सुरेश बसन, ऊना। हिमाचल प्रदेश के ऊना सहित विभिन्न जिलों में पराली में आलू उगाने का शोध देश के लिए नया मॉडल बनेगा। यह केवल किसानों और आलू खाने वाले लोगों की सेहत के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण हितैषी भी साबित होगा। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुए यह तकनीक किसानों के लिए वेस्ट टू वेल्थ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
क्या है फार्मूला
शून्य जुताई वाली इस तकनीक में धान की बची हुई पराली का उपयोग आलू की फसल के लिए मल्चिंग (आच्छादन) के रूप में किया जाता है। इससे जहां पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण पर रोक लगाने में मदद मिलेगी, वहीं किसानों को खेत की जुताई, मिट्टी चढ़ाने और अधिक मजदूर लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
नालियां बनाने की भी नहीं जररूरत
कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट के कृषि वैज्ञानिक डा. सौरव शर्मा के अनुसार इस तकनीक से हर किस्म के आलू का उत्पादन किया जा सकता है। इसमें खेत में मेड़ और नालियां बनाने की आवश्यकता नहीं होती।
आलू बीज को पौने फीट पराली से ढकें
नमीयुक्त खेत में आलू के बीज जमीन के ऊपर रखकर करीब पौने फीट पराली से ढक दिए जाते हैं। पराली की मल्चिंग के कारण खरपतवार भी नहीं उगते, जिससे खरपतवारनाशी रसायनों के छिड़काव की जरूरत नहीं रहती। इससे मृदा शक्ति बढ़ेगी और कीटनाशक छिड़काव न होने से किसान के लिए वेस्ट टू वेल्थ लाभ व आलू खरीद कर लोगों की हेल्थ से वेल्थ लाभ आर्गेनिक आलू के रूप में मिलेंगे।
पानी की भी बचत
इस तकनीक की खासियत कम पानी की खपत भी है। सामान्य आलू की फसल को तैयार होने तक हर 10-12 दिन बाद सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि शून्य जुताई तकनीक में केवल तीन बार सिंचाई से फसल तैयार होने की संभावना है। इससे पानी, समय, मजदूरी और मशीनरी का खर्च कम होगा।
फसल निकालना भी आसान
आलू निकालने के लिए खेत की गहरी खुदाई की भी आवश्यकता नहीं होगी। पराली की मल्चिंग जमीन की सतह से पानी के वाष्पीकरण को कम करती है। इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और फसल को बार-बार सिंचाई देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस प्रकार शून्य जुताई तकनीक जल संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा सकती है। कम पानी में फसल तैयार होने से किसानों की सिंचाई लागत घटने के साथ जल संसाधनों पर दबाव भी कम होगा।
आग से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं नष्ट
विज्ञानियों का मानना है कि फसल अवशेषों को जलाने से वायु गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ मिट्टी के लाभकारी जीव-जंतुओं और सूक्ष्मजीवों को भी नुकसान पहुंचता है तथा पोषक तत्व नष्ट होते हैं। ऐसे में पराली का खेत में ही उपयोग करने से प्रदूषण कम करने के साथ संसाधनों का पुर्नचक्रण भी संभव होगा।
रसायन का भी नहीं होगा इस्तेमाल
विधि से तैयार आलू में खरपतवारनाशी रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिससे उत्पादन को स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक बनाने में मदद मिल सकती है। कम लागत और कम श्रम के कारण किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं भी हैं।
कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट की तकनीक
बता दें कि जलवायु संरक्षण के साथ किसानों की लागत कम करने और पराली प्रबंधन की समस्या का समाधान करने की दिशा में कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट ऊना में आलू उत्पादन की नई तकनीक पर काम किया जा रहा है।
