आग नहीं आलू उगल रही पराली, न हल चलाने की जरूरत और न ही सिंचाई का झंझट; पंजाब व हरियाणा के लिए अहम होगी तकनीक
हिमाचल प्रदेश के ऊना में तीन साल के शोध के बाद पराली जलाने की समस्या का समाधान मिला है, जहाँ ...और पढ़ें

ऊना में पराली में उगाया गया आलू।
HighLights
ऊना में तीन साल का पराली-आलू खेती शोध सफल।
बिना जुताई, कम पानी में जैविक आलू की पैदावार।
पराली खाद बनेगी, पंजाब-हरियाणा के लिए उपयोगी।
सुरेश बसन, ऊना। धुएं से उत्तर भारत में सांसें थमा देने वाली पराली अब समस्या नहीं रहेगी। धान की फसल के बाद पराली में आलू की उपज ली जा सकेगी। हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना में तीन वर्ष पूर्व शुरू हुआ शोध सफल रहा है। सिरमौर जिला के पांवटा साहिब व नाहन के किसानों ने भी आलू का उत्पादन कर बेहतर पैदावार ली है। इस विधि से हल जोतने, अधिक मजदूरी, डीजल खपत, फसल तैयार होने पर आलू निकालने के लिए अधिक मेहनत भी नहीं करनी होगी। यह विधि पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में भी कारगर सिद्ध हो सकती है।
पराली से ढक दिया जाता है आलू बीज
धान की कटाई के बाद नमीयुक्त खेत में बिना जोते आलू बीज को जमीन पर रखा जाता है। इसके बाद पौने फीट तक पराली से ढक दिया जाता है। खेत में चलने के लिए बीच में रास्ता रख लिया जाता है। समय के साथ पराली गलकर खाद बन जाती है। अक्टूबर में बीजी आलू की फसल फरवरी तक तैयार हो जाएगी।
3 बार ही पानी देने की जरूरत
मिट्टी में की गई आलू की फसल को हर 10 दिन अंतराल में पानी देना पड़ता है जबकि इस विधि में जरूरत पड़ने तीन बार ही पानी देने से आर्गेनिक आलू तैयार हो जाएगा।
और पराली बन जाएगी खाद
विज्ञानी तर्क है कि खेत में जब धान के बाद पराली बचती है तो 40 प्रतिशत ही डिकंपोज हो पाती है। अगर आलू उगाने के लिए इसका उपयोग होगा तो पराली पूरे साल खाद का काम करेगी और आर्गेनिक कार्बन बढ़ेगा।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
चौधरी सरवन कुमार कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के एक्सटेंशन एजुकेशन डायरेक्टर डा. विनोद कुमार शर्मा ने बताया कि शोध के बाद इस तकनीक पर विश्वविद्यालय में ट्रायल हुआ। इसके बाद किसानों के खेतों में प्रयोग किया। अब इस तकनीक को पूरी तरह जमीन पर उतारने के लिए राज्य के कृषि निदेशक एवं अधिकारियों की वर्कशाप विश्वविद्यालय में होगी। इससे पूर्व रिसर्च इवेलुएशन कमेटी की बैठक में इसकी संस्तुति की जाएगी।
मजदूरी खर्च आ रहा कम
प्रोजेक्ट पर काम कर रहे कृषि अनुसंधान उप केंद्र अकरोट (ऊना) के सह विज्ञानी डा. सौरव शर्मा ने बताया कि पराली में आलू उगाने का शोध तीन साल से चल रहा है। इसमें मजदूरी खर्च कम आ रहा है। पराली जलानी नहीं पड़ती है। अगला अभ्यास अक्टूबर से शुरू होगा। इस तकनीक से हर किस्म का आलू तैयार होगा। किसानों को खेत में मेंढ, नाली और मिट्टी चढ़ाने की जरूरत नहीं रहेगी। खरपतवार नाशक का छिड़काव नहीं होगा, क्योंकि पराली से मल्चिंग के करण खरपतवार नहीं उग पाएंगे। नमीयुक्त खेत में आलू को जमीन के ऊपर और पौने फीट तक पराली से ढककर रखते हैं। सिंचाई के लिए इस विधि में मात्र तीन बार पानी देने से फसल तैयार हो जाएगी।
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क्या कहते हैं किसान
तीन साल से पराली में आलू उगा रही हूं। विज्ञानिकों के सहयोग से दो कनाल में आलू की नीलकंठ वेरायटी, पुखराज, लाल आलू लगाया था जिसकी अच्छी पैदावार ली।
-सुरेश कुमारी, चुरुड़ू, ऊना।
पराली में आलू उगाने की तकनीक वरदान है। करीब पांच बिस्वा में पराली में एक क्विंटल आलू लगाया था। पैदावार छह क्विंटल तक ली है। मिट्टी में आलू उगाने की बजाय पराली में उगाने में खर्च कम है। यह अच्छी तकनीक है।
-रणजीत सिंह, कांशीपुर, पांवटा साहिब।
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