जम्मू-कश्मीर के 1371 स्कूलों में एक ही शिक्षक, 32 हजार बच्चों के भविष्य का सवाल, कौन देगा जवाब?
जम्मू-कश्मीर में 1371 सरकारी स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिससे 32,303 विद्यार्थियों की शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हो रही है। ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर के 1371 स्कूलों में एक शिक्षक, 32 हजार बच्चों के भविष्य पर संकट।
HighLights
जम्मू-कश्मीर के 1371 स्कूल एक शिक्षक के भरोसे।
32,303 छात्रों की शिक्षा गुणवत्ता पर बुरा असर।
शिक्षकों की कमी से बच्चों का भविष्य प्रभावित।
सुरेंद्र सिंह, जम्मू। देश में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों के बीच जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल अब भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
केंद्र सरकार के नवीनतम यू-डाइस प्लस आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 1,371 स्कूल सिंगल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और इन स्कूलों में 32,303 विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे हैं, जिनकी शिक्षा शिक्षकों की कमी के चलते बुरी तरह से प्रभावित हो रही है।इसके अलावा 146 जीरो एनरोलमेंट वाले स्कूल भी हैं, जिनमें एक भी बच्चा पढ़ने के लिए नहीं आता है।
रिपोर्ट के अनुसार इकलौते शिक्षक स्कूलों में एक ही शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं को पढ़ाने के साथ-साथ स्कूल का प्रशासनिक कार्य, रिकार्ड का रखरखाव, मिडे-डे-मील भोजन की निगरानी, अभिभावकों से समन्वय और अन्य सरकारी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को प्रत्येक कक्षा के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षण मिलना चुनौती बन जाता है।
बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा असर
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एक शिक्षक के लिए सभी कक्षाओं के बच्चों को समान समय देना संभव नहीं होता। इसका सबसे अधिक असर प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों पर पड़ता है। पढ़ने-लिखने और गणित जैसी बुनियादी दक्षताओं का विकास प्रभावित होता है। कई बार एक कक्षा को पढ़ाते समय दूसरी कक्षा के बच्चे बिना शिक्षक के बैठे रहते हैं। इससे उनकी सीखने की गति धीमी हो जाती है और पढ़ाई में रुचि भी कम होने लगती है।
ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर बच्चों में ड्रापआउट की आशंका बढ़ती है। ग्रामीण क्षेत्रों के जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगते हैं, जबकि गरीब परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों तक ही सीमित रह जाते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में असमानता और बढ़ जाती है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्रों में कई स्कूलों में मल्टीग्रेड शिक्षण व्यवस्था लागू है, जहां अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठकर पढ़ते हैं। इससे शिक्षक का ध्यान सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से नहीं जा पाता और सीखने के परिणाम प्रभावित होते हैं।
जल्द भरे जाएं रिक्त पद
शिक्षा विशेषज्ञ राजेंद्र खजूरिया का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जम्मू-कश्मीर सहित सभी राज्यों में शिक्षक रिक्तियां शीघ्र भरना, छोटे विद्यालयों का तर्कसंगत पुनर्गठन और दूर दराज क्षेत्रों में पर्याप्त शिक्षकों की तैनाती आवश्यक है।
उनका कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सिंगल शिक्षक स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।उनका मानना है कि प्राथमिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी भविष्य में विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास पर भी असर डाल सकती है।